संत कबीर दास 15वीं सदी में हिंदी साहित्य के भक्तिकाल के सबसे प्रसिद्ध कवि एवं विचारक माने जाते हैं। उनका संबंध भक्तिकाल की निर्गुण शाखा ‘ज्ञानमार्गी उपशाखा’ से था। इनकी रचनाओं और गंभीर विचारों ने भक्तिकाल आंदोलन को गहरे स्तर तक प्रभावित किया था। इसके साथ ही उन्होंने उस समय समाज में फैली कुरीतियों, कर्मकांडों, अंधविश्वास की निंदा की और सामाजिक बुराइयों की कड़ी आलोचना की। उनकी रचनाओं के कुछ अंश सिक्खों के ‘आदि ग्रंथ’ में भी सम्मिलित किए गए हैं। इस लेख में संत कबीर दास का जीवन परिचय और उनकी साहित्यिक रचनाओं की जानकारी दी गई है।
| नाम | संत कबीर दास |
| जन्म स्थान | वाराणसी, उत्तर प्रदेश |
| पिता का नाम | नीरू |
| माता का नाम | नीमा |
| पत्नी का नाम | लोई |
| संतान | कमाल (पुत्र), कमाली (पुत्री) |
| मुख्य रचनाएं | साखी, सबद, रमैनी |
| काल | भक्तिकाल |
| शाखा | ज्ञानमार्गी शाखा |
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कबीरदास का जन्म एवं प्रारंभिक जीवन
संत कबीर दास का जन्म कब हुआ, यह ठीक-ठीक ज्ञात नहीं है। परन्तु ऐसा माना जाता है कि उनका जन्म 14वीं-15वीं शताब्दी में काशी (वर्तमान वाराणसी) में हुआ था। कबीर के जन्म के बारे में कई किवदंतियाँ हैं, जिनमें एक प्रसिद्ध कथा के अनुसार उनका जन्म एक विधवा ब्राह्मणी के गर्भ से हुआ था, जिसने उन्हें जन्म के तुरंत बाद ही नदी में बहा दिया था।
नीरू और नीमा नामक एक जुलाहा दंपति को वे नदी किनारे मिले, जिन्होंने उनका पालन-पोषण किया। कबीर जी ने कोई औपचारिक शिक्षा नहीं ली थी और न ही वे बुनकरी के काम में पूरी तरह प्रशिक्षित थे। उनकी कविताओं में बुनाई से जुड़े कई उदाहरण मिलते हैं, लेकिन उनका झुकाव इस पेशे से अधिक सत्य और आत्मिक ज्ञान की खोज की ओर था। उनका पूरा जीवन एक आध्यात्मिक खोज रहा, जिसकी झलक उनकी रचनाओं में साफ दिखाई देती है।
संत स्वामी रामानंद से प्राप्त की शिक्षा
कबीर के प्रथम गुरु का नाम ‘संत स्वामी रामानंद’ था। मुफ़्ती ग़ुलाम सरवर लाहोरी की पुस्तक ‘ख़जीनत अल-असफ़िया’ से यह जानकारी मिलती है कि सूफ़ी संत शेख तक्की भी कबीर के गुरु थे। इसी कारण कबीर की शिक्षा और उनके विचारों में सूफ़ी परंपरा का प्रभाव स्पष्ट रूप से दिखाई देता है।
वैवाहिक जीवन
ऐसा माना जाता है कि कबीर वाराणसी के ‘कबीर चौरा’ इलाके में पले-बढ़े थे। बाद में उनका विवाह ‘लोई’ नामक महिला से हुआ था, जिनसे उन्हें ‘कमाल’ और ‘कमाली’ नामक दो संतानें प्राप्त हुईं। कुछ स्रोत यह भी मानते हैं कि उन्होंने विवाह नहीं किया था, लेकिन इन बातों की पुष्टि के लिए विश्वसनीय प्रमाण उपलब्ध नहीं हैं।
कबीरदास की साहित्यिक रचनाएं
कबीर पढ़े-लिखे नहीं थे। उन्होंने अपनी वाणी से स्वयं ही कहा है “मसि कागद छूयो नहीं, कलम गह्यो नहिं हाथ”। इससे स्पष्ट होता है कि उन्होंने अपनी रचनाएँ स्वयं नहीं लिखीं। इसके बावजूद, उनके वचनों का संकलन कई प्रमुख ग्रंथों में मिलता है। ऐसा माना जाता है कि बाद में उनके शिष्यों ने उनके वचनों को संकलित कर ‘बीजक’ नामक ग्रंथ की रचना की।
आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी ने भी स्पष्ट कहा है कि, “कविता करना कबीर का लक्ष्य नहीं था, कविता तो उन्हें संत-मेंत में मिली वस्तु थी, उनका लक्ष्य लोकहित था।” भले ही कबीर की कविताएं शुरू में मौखिक रूप से प्रचलित रहीं, फिर भी वे आज तक अपनी सरल भाषा और गहन आध्यात्मिक भावों के कारण पहचानी जाती हैं। उनकी की कुछ प्रसिद्ध रचनाएं इस प्रकार हैं:-
| रचना | अर्थ | प्रयुक्त छंद | भाषा |
| साखी | साक्षी | दोहा | राजस्थानी पंजाबी मिली खड़ी बोली |
| सबद | शब्द | गेय पद | ब्रजभाषा और पूर्वी बोली |
| रमैनी | रामायण | चौपाई और दोहा | ब्रजभाषा और पूर्वी बोली |
कबीर की भाषा शैली
संत कबीर दास जी को कई भाषाओं का ज्ञान था वे साधु-संतों के साथ कई जगह भ्रमण पर जाते रहते थे इसलिए उन्हें कई भाषाओं का ज्ञान हो गया था। इसके साथ ही कबीरदास अपने विचारो और अनुभवों को व्यक्त करने के लिए स्थानीय भाषा के शब्दों का इस्तेमाल करते थे। जिसे स्थानीय लोग उनकी वचनो को भली भांति समझ जाते थे। उनकी भाषा को ‘सधुक्कड़ी’ भी कहा जाता है। यह भाषा मध्यकालीन उत्तर भारत की आम बोली का मिश्रण थी।
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कबीरदास जी के प्रसिद्ध दोहे
संत कबीरदास ने अपने जीवनभर लोककल्याण के लिए उपदेश दिए और समाज में व्याप्त कुरीतियों तथा आडंबरों का निर्भीकता से विरोध किया। हिंदी साहित्य में उन्हें एक महान कवि का स्थान प्राप्त है। उनके अनमोल विचार आज भी पढ़े जाते हैं। उनके कुछ शिक्षाप्रद दोहे निम्नलिखित हैं:-
“माटी कहे कुमार से, तू क्या रोंदे मोहे । एक दिन ऐसा आएगा, मैं रोंदुंगी तोहे।”

“पाथर पूजे हरी मिले, तो मै पूजू पहाड़ ! घर की चक्की कोई न पूजे, जाको पीस खाए संसार !!”
“गुरु गोविंद दोऊ खड़े ,काके लागू पाय । बलिहारी गुरु आपने , गोविंद दियो मिलाय।।”
“यह तन विष की बेलरी, गुरु अमृत की खान। शीश दियो जो गुरु मिले, तो भी सस्ता जान।”
“उजला कपड़ा पहरि करि, पान सुपारी खाहिं । एकै हरि के नाव बिन, बाँधे जमपुरि जाहिं॥”
“निंदक नियेरे राखिये, आँगन कुटी छावायें । बिन पानी साबुन बिना, निर्मल करे सुहाए।”
“प्रेम न बारी उपजे, प्रेम न हाट बिकाए । राजा प्रजा जो ही रुचे, सिस दे ही ले जाए।”

“जो घट प्रेम न संचारे, जो घट जान सामान । जैसे खाल लुहार की, सांस लेत बिनु प्राण।”
“मैं-मैं बड़ी बलाइ है, सकै तो निकसो भाजि । कब लग राखौ हे सखी, रूई लपेटी आगि॥”
“चलती चक्की देख के, दिया कबीरा रोये । दो पाटन के बीच में, साबुत बचा न कोए।”
“तीरथ गए से एक फल, संत मिले फल चार । सतगुरु मिले अनेक फल, कहे कबीर विचार।”

“जिनके नौबति बाजती, मैंगल बंधते बारि । एकै हरि के नाव बिन, गए जनम सब हारि॥”
“कबीर’ नौबत आपणी, दिन दस लेहु बजाइ । ए पुर पाटन, ए गली, बहुरि न देखै आइ॥”
“जहाँ दया तहा धर्म है, जहाँ लोभ वहां पाप । जहाँ क्रोध तहा काल है, जहाँ क्षमा वहां आप।”
“ऐसी वाणी बोलिए मन का आप खोये । औरन को शीतल करे, आपहुं शीतल होए।”
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कबीरदास की मृत्यु
कबीर ने अपने जीवन में कई स्थानों की यात्रा की। वहीं जीवन के अंतिम समय में वे उत्तर प्रदेश के मगहर नगर चले गए, जहां अधिकांश विद्वानों के अनुसार लगभग 1575 ईस्वी में उनका निधन हुआ। मगहर में कबीर की समाधि और मज़ार दोनों स्थित हैं। आज यह स्थान दुनिया भर के कबीरपंथियों के लिए श्रद्धा का प्रमुख केंद्र माना जाता है।
संत कबीरदास की जयंती 2026
संत कबीर दास जी की जयंती प्रतिवर्ष जेयष्ठ शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा तिथि को मनाई जाती है। इस वर्ष यह तिथि सोमवार 29 जून, 2026 को पड़ रही है। इसलिए आज पूरे देशभर में कबीर दास जी की जयंती बड़े हर्षोल्लास के साथ मनाई जा रही है। इस अवसर पर लोग अपने प्रियजनों, सगे-संबंधियों और मित्रों को शुभकामना संदेश भेजते हैं। इस दिन को विशेष बनाने के लिए लोग सत्संग, कीर्तन और विचार गोष्ठियों का आयोजन भी करते हैं। वहीं कई स्थानों पर शोभायात्रा भी निकाली जाती है जो कबीर मंदिरों तक जाती है।
FAQs
माना जाता है कि संत कबीर दास का जन्म वाराणसी, उत्तर प्रदेश में हुआ था।
कबीर दास की माता ‘नीमा’ और पिता का नाम ‘नीरू’ था।
कबीर दास भक्तिकाल में ‘ज्ञानमार्गी शाखा’ के कवि थे।
कबीर दास की मुख्य रचनाएँ ‘साखी’, ‘सबद’ और ‘रमैनी’ हैं।
कबीर दास ने मुख्य रूप से अवधी और सधुक्कड़ी भाषा में रचना की थी। कबीर की सधुक्कड़ी भाषा, जो मध्यकालीन उत्तर भारत की लोकभाषाओं-ब्रज, अवधी, ख़ड़ी बोली और भोजपुरी के मेल से बनी थी, उनकी भक्ति‑कविताओं में व्यक्त हुई।
आशा है कि आपको संत कबीर दास का जीवन परिचय पर हमारा यह ब्लॉग पसंद आया होगा। ऐसे ही अन्य प्रसिद्ध कवियों और महान व्यक्तियों के जीवन परिचय को पढ़ने के लिए Leverage Edu के साथ बने रहें।
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