विदाई एक ऐसा पल होता है, जब आँखें नम हो जाती हैं और दिल में अनकही भावनाएँ उमड़ने लगती हैं। यह जीवन का वह पड़ाव है, जहाँ एक ओर नए सफर की उम्मीदें होती हैं, तो दूसरी ओर पीछे छूट रहे रिश्तों की कसक भी होती है। विदाई सिर्फ एक औपचारिकता नहीं, बल्कि वह एहसास है जो किसी अपने से बिछड़ने की पीड़ा और यादों की गहराई को दर्शाता है। हिंदी साहित्य में कई प्रसिद्ध कवियों ने इस विदाई के भाव को अपनी कविताओं में जीवंत किया है। चाहे वह स्कूल-कॉलेज की विदाई हो, किसी प्रियजन की यात्रा या शादी के बाद बेटी की बिदाई – हर अवसर पर कविताएँ हमें भावनात्मक रूप से जोड़ती हैं। इस ब्लॉग में कुछ बेहतरीन विदाई पर कविता (Vidai Par Kavita) दी गई हैं, जो इस एहसास को संजोकर आपके दिल को छू जाएँगी।
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विदाई पर कविता (Vidai Par Kavita) की सूची
विदाई पर कविता (Vidai Par Kavita) की सूची इस प्रकार है:
विदाई पर कविता | कवि का नाम |
कोई कहे या न कहे | अज्ञेय |
तुम कदाचित् न भी जानो | अज्ञेय |
विदा | सर्गेई येसेनिन |
बिदाई | सुभद्राकुमारी चौहान |
कोई कहे या न कहे – अज्ञेय
यह व्यथा की बात कोई कहे या न कहे।
सपने अपने झर जाने दे, झुलसाती लू को आने दो
पर उस अक्षोभ्य तक केवल मलय समीर बहे।
यह विदा का गीत कोई सुने या न सुने।
मेरा पथ अगर अँधेरा हो, अनुभव का कटु फल मेरा हो
वह अक्षत केवल स्मृति के फूल चुने!
– अज्ञेय
तुम कदाचित् न भी जानो – अज्ञेय
मंजरी की गंध भारी हो गई है
अलस है गुँजार भौरे की—अलस और उदास।
क्लांत पिक रह-रह तड़प कर कूकता है। जो रहा मधु-मास।
मुस्कुराते रूप!
तुम कदाचित् न भी जानो—यह विदा है।
ओस-मधुकण : वस्त्र सारे सीझ कर शलथ हो गए हैं।
रात के सहमे चिहुँकते बाल-खग अब निडर हो चुप हो गए हैं।
अटपटी लाली उषा की हुई प्रगल्भ, विभोर।
उमड़ती है लौ दिए की जा रहा है भोर।
ओ विहँसते रूप!
तुम कदाचित् न भी जानो—यह विदा है।
– अज्ञेय
विदा – सर्गेई येसेनिन
विदा
मेरे मित्र विदा
मित्र प्यारे
तुम हृदय में बसे मेरे
इस पूर्व निश्चित विदा-वेला में
छिपा है वायदा भावी मिलन का
बिना कुछ बोले
बिना हाथों को मिलाए
ले रहा तुमसे विदाई
मित्र मेरे
मायूस मत होना
न आँखों में व्यथा ढोना
मृत्यु का आना
न कोई बात होती है नई
ज़िंदगी तो मित्र
इससे भी गई बीती।
– सर्गेई येसेनिन
बिदाई – सुभद्राकुमारी चौहान
कृष्ण-मंदिर में प्यारे बंधु
पधारो निर्भयता के साथ।
तुम्हारे मस्तक पर हो सदा
कृष्ण का वह शुभचिंतक हाथ।।
तुम्हारी दृढ़ता से जग पड़े
देश का सोया हुआ समाज।
तुम्हारी भव्य मूर्ति से मिले
शक्ति वह विकट त्याग की आज।।
तुम्हारे देश-बंधु यदि कभी
डरें, कायर हो पीछे हटें,
बंधु! दो बहनों को वरदान
युद्ध में वे निर्भय मर मिटें।।
हजारों हृदय बिदा दे रहे,
उन्हें संदेशा दो बस एक।
कटें तीसों करोड़ ये शीश,
न तजना तुम स्वराज्य की टेक।।
– सुभद्राकुमारी चौहान
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