Beti Par Kavita: बेटी के प्यार और त्याग पर लिखी गईं मार्मिक कविताएं

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Beti Par Kavita

Beti Par Kavita: बेटी पर कविता पढ़कर आप अपने जीवन में बेटियों के महत्व और परिवार में उनके होने से आने वाली खुशियों के बारे में जान पाएंगे। बेटियों पर कविता सही मायनों में उनके त्याग और संघर्षों को सम्मानित करेंगी, साथ ही समाज में उनके अतुल्नीय योगदान की सरहाना करेंगी। समय-समय पर ऐसे कई कवि/कवियित्री हुई हैं, जिन्होंने बेटियों पर अनुपम काव्य कृतियों का सृजन किया है। इस लेख में, हम बेटी पर कविता (Beti Par Kavita) प्रस्तुत कर रहे हैं, जो आपको नारी शक्ति के महत्व के बारे में बताएंगी। 

बेटी पर कविता – Beti Par Kavita

बेटी पर कविता (Beti Par Kavita) और उनकी सूची इस प्रकार हैं:-

कविता का नामकवि/कवियत्री का नाम
बेटी को जन्म मिलेबाबा बैद्यनाथ झा
बेटी की बिदामाखनलाल चतुर्वेदी
बेटी के पितारुचि बहुगुणा उनियाल
ब्याही बेटीमनोज चौहान
बेटी की किलकारीताराप्रकाश जोशी
बेटी की मुस्कानमयंक विश्नोई
बेटी-तीन मुक्तकमाधवी चौधरी

बेटी को जन्म मिले

मैं बेटी बनकर आऊँगी, फिर यह विस्तृत संसार मिले।
मैं भी आऊँ जग में पापा, मुझको भी माँ का प्यार मिले॥

मुझको आने दें बाहर अब, मैं घर में खुशियाँ लाऊँगी,
किलकारी मेरी गूँजेगी, सबके मन में छा जाऊँगी।
कुछ बड़ी बनूँगी उस दिन से, कामों में हाथ बटाऊँगी,
जब नाम लिखा देंगे मेरा, उसदिन से पढ़ने जाऊँगी।

भैया को राखी बाधूँगी, तो उनसे कुछ उपहार मिले।
मैं भी आऊँ जग में पापा, मुझको भी माँ का प्यार मिले॥

गर्भस्थ बालिका हूँ पापा, मारें मत बाहर आने दें,
कर्तव्य सलोनी बिटिया का, मुझको भी आप निभाने दें।
सब काम करूँगी अच्छे मैं, तब नाम वंश का बढ़ जाए,
फिर गर्व आपको भी होगा, जब कीर्ति पताका लहराए।

तब आप कहेंगे खुश होकर, यह बेटी बारम्बार मिले।
मैं भी आऊँ जग में पापा, मुझको भी माँ का प्यार मिले॥

बेटी ही सृष्टि चलाती है, सन्तति की वह माता बनकर,
सर्वस्व लुटाती रहती है, वह त्यागमयी दाता बनकर।
बन बहन बहू पुत्री पत्नी, सबका वह धर्म निभाती है,
प्रारब्ध दिलाकर पति को वह, भवसागर पार कराती है।

वह एक माँग ही करती है, बस जीने का अधिकार मिले।
मैं भी आऊँ जग में पापा, मुझको भी माँ का प्यार मिले॥
बाबा बैद्यनाथ झा

बेटी की बिदा

आज बेटी जा रही है,
मिलन और वियोग की दुनिया नवीन बसा रही है।

मिलन यह जीवन प्रकाश
वियोग यह युग का अँधेरा,
उभय दिशि कादम्बिनी, अपना अमृत बरसा रही है।

यह क्या, कि उस घर में बजे थे, वे तुम्हारे प्रथम पैंजन,
यह क्या, कि इस आँगन सुने थे, वे सजीले मृदुल रुनझुन,
यह क्या, कि इस वीथी तुम्हारे तोतले से बोल फूटे,
यह क्या, कि इस वैभव बने थे, चित्र हँसते और रूठे,

आज यादों का खजाना, याद भर रह जायगा क्या?
यह मधुर प्रत्यक्ष, सपनों के बहाने जायगा क्या?

गोदी के बरसों को धीरे-धीरे भूल चली हो रानी,
बचपन की मधुरीली कूकों के प्रतिकूल चली हो रानी,
छोड़ जाह्नवी कूल, नेहधारा के कूल चली चली हो रानी,
मैंने झूला बाँधा है, अपने घर झूल चली हो रानी,

मेरा गर्व, समय के चरणों पर कितना बेबस लोटा है,
मेरा वैभव, प्रभु की आज्ञा पर कितना, कितना छोटा है?
आज उसाँस मधुर लगती है, और साँस कटु है, भारी है,
तेरे बिदा दिवस पर, हिम्मत ने कैसी हिम्मत हारी है।

कैसा पागलपन है, मैं बेटी को भी कहता हूँ बेटा,
कड़ुवे-मीठे स्वाद विश्व के स्वागत कर, सहता हूँ बेटा,
तुझे बिदाकर एकाकी अपमानित-सा रहता हूँ बेटा,
दो आँसू आ गये, समझता हूँ उनमें बहता हूँ बेटा,

बेटा आज बिदा है तेरी, बेटी आत्मसमर्पण है यह,
जो बेबस है, जो ताड़ित है, उस मानव ही का प्रण है यह।
सावन आवेगा, क्या बोलूँगा हरियाली से कल्याणी?
भाई-बहिन मचल जायेंगे, ला दो घर की, जीजी रानी,
मेंहदी और महावर मानो सिसक सिसक मनुहार करेंगी,
बूढ़ी सिसक रही सपनों में, यादें किसको प्यार करेंगी?

दीवाली आवेगी, होली आवेगी, आवेंगे उत्सव,
’जीजी रानी साथ रहेंगी’ बच्चों के? यह कैसे सम्भव?

भाई के जी में उट्ठेगी कसक, सखी सिसकार उठेगी,
माँ के जी में ज्वार उठेगी, बहिन कहीं पुकार उठेगी!

तब क्या होगा झूमझूम जब बादल बरस उठेंगे रानी?
कौन कहेगा उठो अरुण तुम सुनो, और मैं कहूँ कहानी,

कैसे चाचाजी बहलावें, चाची कैसे बाट निहारें?
कैसे अंडे मिलें लौटकर, चिडियाँ कैसे पंख पसारे?

आज वासन्ती दृगों बरसात जैसे छा रही है।
मिलन और वियोग की दुनियाँ नवीन बसा रही है।
आज बेटी जा रही है।
माखनलाल चतुर्वेदी

बेटी के पिता

जिनके पास था
बेटियों का प्यार
उन पिताओं ने
प्रेम कविताओं से भी
अच्छा प्रेम लिखा ।

जिन पिताओं ने
विदा की बेटियाँ ब्याह के
उन्होंने विरह को किया
जीवंत अपनी कविताओं में।

बेटियों का ख़याल रखते हुए
दुनिया के पिताओं ने
जीया अपने अंदर
एक माँ की ममता को।

बेटियों के पिताओं ने
कविता का समीकरण
और कविता का व्याकरण
न समझते हुए भी
लिखीं दुनिया की
सबसे अच्छी कविताएँ।
रुचि बहुगुणा उनियाल

ब्याही बेटी

वर्षों पहले
पास के गाँव में
ब्याही बेटी
रहती है फिक्रमंद आज भी
बूढी माँ के लिए
जबकि वह खुद भी
बन चुकी है अब
दादी और नानी।

अक्सर गुजरती
मायके के साथ लगती सड़क से
खिंची चली आती है
आँगन में बैठी
बूढी माँ के पास।

वह चुरा लेती है कुछ पल
माँ की सेवा के लिए
अपने भरे-पूरे परिवार की
जिम्मेदारियों के बीच भी।

पानी गर्म कर
नहलाती है माँ को
धोती है उसके कपड़े – लत्ते
संवारती है सलीके से
सिर पर उलझी हुई चांदी को
शायद वैसे ही
जैसे करती होगी माँ
जब वह छोटी थी।

बूढी माँ देखती रहती है
टुकुर-टुकुर
विस्मृत हुई स्मृतियाँ
बेटी के बचपन की
लगाती हैं छलांग अवचेतन से।

फेरती है हाथ प्यार से
बेटी के सिर पर
भावनाएं छलक पड़ती हैं
जीर्ण नेत्रों से
न चाहकर भी।

द्रवित हुई बेटी चाहती है दिखाना
मजबूत खुद को
बंधाती है ढाढस माँ को
उम्र की इस अवस्था में
अब बेटी
हो जाना चाहती है ‘माँ’!
– मनोज चौहान

बेटी की किलकारी

कन्या भ्रूण अगर मारोगे
माँ दुर्गा का शाप लगेगा,
बेटी की किलकारी के बिन
आँगन-आँगन नहीं रहेगा ।

जिस घर बेटी जन्म न लेती
वह घर सभ्य नहीं होता है।
बेटी के आरतिए के बिन
पावन यज्ञ नहीं होता है।
यज्ञ बिना बादल रूठेंगे
सूखेगी वर्षा की रिमझिम ।

बेटी की पायल के स्वर बिन
सावन-सावन नहीं रहेगा।
आँगन-आँगन नहीं रहेगा।

जिस घर बेटी जन्म न लेती
उस घर कलियाँ झर जाती हैं।
ख़ुशबू निर्वासित हो जाती
गोपी गीत नहीं गाती है ।
गीत बिना वंशी चुप होगी
कान्हा नाच नहीं पाएगा ।

बिन राधा के रास न होगा
मधुबन-मधुबन नहीं रहेगा।
आँगन-आँगन नहीं रहेगा।

जिस घर बेटी जन्म न लेती
उस घर घड़े रीत जाते हैं,
अन्नपूरणा अन्न न देती
दुर्भिक्षों के दिन आते हैं।
बिन बेटी के भोर अलूणी
थका-थका दिन साँझ बिहूणी ।

बेटी बिना न रोटी होगी
प्राशन – प्राशन नहीं रहेगा।
आँगन-आँगन नहीं रहेगा।

जिस घर बेटी जन्म न लेती
उसको लक्ष्मी कभी न वरती।
भव सागर के भँवर-जाल में
उसकी नौका कभी न तरती।
बेटी की आशीषों में ही
बैकुण्ठों का वासा होता ।

बेटी के बिन किसी भाई का
चंदन-चंदन नहीं रहेगा।
आँगन-आँगन नहीं रहेगा।

जिस घर बेटी जन्म न लेती
वहाँ शारदा कभी न आती,
बेटी की तुतली बोली बिन
सारी कला विकल हो जाती,
बेटी ही सुलझा सकती है,
माता की उलझी पहेलियाँ ।

बेटी के बिन माँ की आँखों
अँजन-अँजन नहीं रहेगा।
आँगन-आँगन नहीं रहेगा।

जिस घर बेटी जन्म न लेगी
राखी का त्यौहार न होगा,
बिना रक्षाबन्धन भैया का
ममतामय संसार न होगा,
भाषा का पहला स्वर बेटी
शब्द-शब्द में आखर बेटी ।

बिन बेटी के जगत न होगा,
सजन-सजन नहीं रहेगा।
आँगन-आँगन नहीं रहेगा।

जिस घर बेटी जन्म न लेती
उसका निष्फल हर आयोजन,
सब रिश्ते नीरस हो जाते
अर्थहीन सारे सम्बोधन,
मिलना-जुलना, आना-जाना
यह समाज का ताना-बाना ।

बिन बेटी रूखे अभिवादन
वन्दन-वन्दन नहीं रहेगा।
आँगन-आँगन नहीं रहेगा।
– ताराप्रकाश जोशी

बेटी की मुस्कान

 संघर्षों की धार पर
 जीवन के कठिन समय में
 सकारात्मक परिवर्तन के समान
 निराशा से घिर जाने पर,
 मुझे आशावादी बनाती है
 मेरी बेटी की मुस्कान

 मेरे शब्दों, मेरी भावनाओं पर
 मेरी लिखी कविताओं पर
 उसकी मासूमियत के हैं अमिट निशान
 मेरी खुशियों, मेरे निर्णयों
 मेरी हिम्मत, मेरी जीत के पीछे है
 मेरी बेटी की मुस्कान

 सहनशीलता का सही मायनों में
 वही है प्रत्यक्ष प्रमाण
 उसके अस्तित्व से होता यक़ीनन
 मेरे सपनों का निर्माण
 मेरा मुझमें कुछ शेष नहीं,
 जो कुछ है, सब है उसकी पहचान
 मेरी जीवन भर की पूंजी है
 मेरी बेटी की मुस्कान

 मेरी ज़िंदगी के
 सुनहरे लम्हें
 उसी से शुरू होकर,
 उसी पर हो जाते कुर्बान
 जीवन की शेष साँसों
 आज़ाद ख्यालों
 और मेरे सम्मान के पीछे
 है मेरी बेटी की मुस्कान…”
– मयंक विश्नोई

बेटी पर कुछ सुंदर कविता – Daughters Day Poems

बेटी पर कुछ सुंदर कविताएं (Beti Par Kavita) पढ़कर आप समाज में नारी के अस्तित्व के महत्व को जान पाएंगे। 

बेटी-तीन मुक्तक

बेटी के रूप में मुझे तन्हाईयाँ मिली।
अपनों से भी मुझे यहाँ रुस्वाइयाँ मिली।
इतना ही काफी था कि मुझे जन्म मिल गया-
लाखों सुताओं को जहाँ खामोशियाँ मिली।

बेटी को जन्म दीजिए, उर से लगाइए।
ममता की छाँव दीजिए, उसको पढ़ाइए।
बेटी भी फर्ज सारे खुशी से निभाएगी-
बेटी को सबल बेटों के जैसा बनाइए।

बागों में खिल रही जो वो कली हैं बेटियाँ।
कल वृक्ष जो बनेंगी वो फली हैं बेटियाँ।
बेटी के दान से बड़ा है पुण्य कुछ नहीं-
जो स्वर्ग को ले जाएँ वो गली हैं बेटियाँ।
– माधवी चौधरी

बेटी पर कविता कुमार विश्वास

विदा लाडो!
तुम्हे कभी देखा नहीं गुड़िया,
तुमसे कभी मिला नहीं लाडो!
मेरी अपनी दुनिया की अनोखी उलझनों में
और तुम्हारी ख़ुद की थपकियों से गढ़ रही
तुम्हारी अपनी दुनिया की
छोटी-छोटी सी घटत-बढ़त में,
कभी वक़्त लाया ही नहीं हमें आमने-सामने।
फिर ये क्या है कि नामर्द हथेलियों में पिसीं
तुम्हारी घुटी-घटी चीख़ें, मेरी थकी नींदों में
हाहाकार मचाकर मुझे सोने नहीं देतीं?
फिर ये क्या है कि तुम्हारा ‘मैं जीना चाहतीं हूँ माँ‘ का
अनसुना विहाग मेरे अन्दर के पिता को धिक्कारता रहता है?
तुमसे माफी नहीं माँगता चिरैया!
बस, हो सके तो अगले जनम
मेरी बिटिया बन कर मेरे आँगन में हुलसना बच्चे!
विधाता से छीन कर अपना सारा पुरुषार्थ लगा दूंगा
तुम्हें भरोसा दिलाने में कि
‘मर्द‘ होने से पहले ‘इंसान‘ होता है असली ‘पुरुष‘!
– कुमार विश्वास

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