Poem on Poverty in Hindi: गरीबी केवल एक आर्थिक स्थिति नहीं, बल्कि एक गहरी संवेदना है जो हर दिन असंख्य लोगों के जीवन को प्रभावित करती है। यह केवल पेट की भूख, फटे हुए कपड़े या टूटी झोपड़ी तक सीमित नहीं है, बल्कि सपनों के टूटने, उम्मीदों के बिखरने और समाज में हाशिए पर चले जाने की करुण कहानी भी कहती है। गरीब का संघर्ष केवल दो वक्त की रोटी तक सीमित नहीं होता, बल्कि सम्मान, शिक्षा और मूलभूत सुविधाओं की लड़ाई भी इसके साथ चलती है। गरीबी पर कविता (Garibi Par Kavita) एक ऐसा विषय है जो न केवल हमारे समाज की हकीकत को उजागर करता है, बल्कि यह हमारे भीतर संवेदनशीलता और सहानुभूति भी जगाता है।
गरीब पर कविता, गरीबों के संघर्ष की गाथा कहती हैं, तो कभी उनकी उम्मीदों की लौ जलाकर नए सवेरे की आशा जगाती हैं। इसलिए, समय-समय पर हिंदी साहित्य में गरीबी पर अनेकों कविताएँ लिखी गई हैं, जो हमें गरीबों की पीड़ाओं और उनके दुःख से परिहित करवाते हैं। इस लेख में गरीबी पर कविता (Poem on Poverty in Hindi) दी गई हैं, जो समाज के सामने गरीबों के संघर्ष, दर्द और उनकी उम्मीद की आवाज बनने का प्रयास करेंगी।
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गरीबी पर कविता – Garibi Par Kavita
गरीबी पर कविता (Garibi Par Kavita) की सूची इस प्रकार है;-
कविता का नाम | कवि/कवियत्री का नाम |
---|---|
गरीबी | केदारनाथ अग्रवाल |
गरीबी ! तू न यहाँ से जा… | कोदूराम दलित |
पहाड़ पर लालटेन | मंगलेश डबराल |
गरीबी में बशर एक एक करके बेच देता है | रामप्रकाश ‘बेखुद’ लखनवी |
हम तो मिट्टी के खिलौने थे गरीबों में रहे | जयकृष्ण राय तुषार |
गरीबदास का शून्य | अशोक चक्रधर |
गरीब और मौसम | बाल गंगाधर ‘बागी’ |
गीत गरीबी के | मयंक विश्नोई |
गरीबी
लघुत्तम है उसका नाम
महत्तम है उसकी गरीबी
शाम की लंबी छायाओं के समान
जो उसके चलने से
जमीन पर पड़ती है
उसका पुल टूट गया है
इस पार
बचपन है
उस पार
यौवन
बीच में
नदी है
पाँव पकड़कर
गड़प जाने वाली
– केदारनाथ अग्रवाल
साभार – कविताकोश
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गरीबी ! तू न यहाँ से जा…
गरीबी ! तू न यहाँ से जा
एक बात मेरी सुन, पगली
बैठ यहाँ पर आ,
गरीबी तू न यहाँ से जा…
चली जाएगी तू यदि तो दीनों के दिन फिर जाएँगे
मजदूर-किसान सुखी बनकर गुलछर्रे खूब उड़ाएँगे
फिर कौन करेगा पूँजीपतियों ,की इतनी परवाह
गरीबी तू न यहाँ से जा…
बेमौत मरेंगे बेचारे ये सेठ, महाजन, जमीनदार
धुल जाएगी यह चमक-दमक, ठंडा होगा सब कारबार
रक्षक बनकर, भक्षक मत बन, तू इन पर जुलुम न ढा
गरीबी तू न यहाँ से जा…
सारे गरीब नंगे रहकर दुख पाते हों तो पाने दे
दाने-दाने के लिए तरस मर जाते हों, मर जाने दे
यदि मरे–जिए कोई तो इसमें तेरी गलती क्या
गरीबी तू न यहाँ से जा…
यदि सुबह-शाम कुछ लोग व्यर्थ चिल्लाते हों, चिल्लाने दे
’हो पूँजीवाद विनाश’ आदि के नारे इन्हें लगाने दे
है अपना ही अब राज-काज, तू गीत खुशी के गा
गरीबी तू न यहाँ से जा…
यह अन्य देश नहीं, भारत है, समझाता हूँ मैं बार-बार
कर मौज यहीं रह करके तू, हिम्मत न हार, हिम्मत न हार
मैं नेक सलाह दे रहा हूँ, तू बिल्कुल मत घबरा
गरीबी तू न यहाँ से जा…
केवल धनिकों को छोड़ यहाँ पर सभी पुजारी तेरे हैं
तू भी तो कहते आई है ’ये मेरे हैं, ये मेरे हैं’
सदियों से जिनको अपनाया है, उन्हें न अब ठुकरा
गरीबी तू न यहाँ से जा…
लाखों कुटियों के बीच खड़े आबाद रहें ये रंगमहल
आबाद रहें ये रंगरलियाँ, आबाद रहे यह चहल-पहल
तू जा के पूंजीपतियों पर, आफ़त नई न ला
गरीबी तू न यहाँ से जा…
ये धनिक और निर्धन तेरे जाने से सम हो जाएँगे
तब तो परमेश्वर भी केवल समदर्शी ही कहलाएँगे
फिर कौन कहेगा ’दीनबंधु’, उनको तू बतला
गरीबी तू न यहाँ से जा…
– कोदूराम दलित
साभार – कविताकोश
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पहाड़ पर लालटेन
जंगल में औरतें हैं
लकड़ियों के गट्ठर के नीचे बेहोश
जंगल में बच्चे हैं
असमय दफ़नाए जाते हए
जंगल में नंगे पैर चलते बूढ़े हैं
डरते-खाँसते अंत में ग़ायब हो जाते हुए
जंगल में लगातार कुल्हाड़ियाँ चल रही हैं
जंगल में सोया है रक्त
धूप में तपती हुई चट्टानों के पीछे
वर्षों के आर्तनाद हैं
और थोड़ी-सी घास है बहुत प्राचीन
पानी में हिलती हुई
अगले मौसम के जबड़े तक पहुँचते पेड़
रातोंरात नंगे होते हैं
सूई की नोक जैसे सन्नाटे में
जली हुई धरती करवट लेती है
और एक विशाल चक्के की तरह घूमता है आसमान
जिसे तुम्हारे पूर्वज लाए थे यहाँ तक
वह पहाड़ दुख की तरह टूटता आता है हर साल
सारे वर्ष सारी सदियाँ
बर्फ़ की तरह जमती जाती हैं निःस्वप्न आँखों में
तुम्हारी आत्मा में
चूल्हों के पास पारिवारिक अंधकार में
बिखरे हैं तुम्हारे लाचार शब्द
अकाल में बटोरे गए दानों जैसे शब्द
दूर एक लालटेन जलती है पहाड़ पर
एक तेज़ आँख की तरह
टिमटिमाती धीरे-धीरे आग बनती हुई
देखो अपने गिरवी रखे हुए खेत
बिलखती स्त्रियों के उतारे गए गहने
देखो भूख से बाढ़ से महामारी से मरे हुए
सारे लोग उभर आए हैं चट्टानों से
दोनों हाथों से बेशुमार बर्फ़ झाड़कर
अपनी भूख को देखो
जो एक मुस्तैद पंजे में बदल रही है
जंगल से लगातार एक दहाड़ आ रही है
और इच्छाएँ दाँत पैने कर रही हैं
पत्थरों पर।
– मंगलेश डबराल
साभार – कविताकोश
गरीबी में बशर एक एक करके बेच देता है
गरीबी में बशर एक एक करके बेच देता है
वो अपने घर के बरतन और गहने बेच देता है
लहू से जिनको सींचा है वो पौधे बेच देता है
जरूरत के लिए इन्सान बच्चे बेच देता है
शिकं की भूख उसको इस कदर मजबूर करती है
बदन का खून क्या इन्सान गुर्दे बेच देता है
तआज्जुब ये नहीं इस दौर में इन्सान बिकते हैं
तआज्जुब ये है कि इन्सान मुर्दे बेच देता है
दूकान उसकी भी लुट जाती है अक्सर हमने देखा है
जो दिन भर न जाने कितने ताले बेच देता है
मयस्सर जब नहीं होती किसी फनकार को रोटी
तो वो झुंझला के अपने सारे तमगे बेच देता है
हमारी दास्ताँ खुद तो नहीं पढता कभी लेकिन
हमारे नाम पर कितने रिसाले बेच देता है
अमीरे शहर भी जब वक्त की गर्दिश में आता है
करोड़ों की हवेली औने-पौने बेच देता है
पडा जब वक्त तब जाके हुआ एहसास ये ‘बेखुद’
कि इक मुफलिस यहाँ ईमां कैसे बेच देता है
– रामप्रकाश ‘बेखुद’ लखनवी
साभार – कविताकोश
हम तो मिट्टी के खिलौने थे गरीबों में रहे
कोई पूजा में रहे कोई अजानों में रहे
हर कोई अपने इबादत के ठिकानों में रहे
अब फिजाओं में न दहशत हो, न चीखें, न लहू
अम्न का जलता दिया सबके मकानों में रहे
ऐ मेरे मुल्क मेरा ईमां बचाये रखना
कोई अफवाह की आवाज न कानों में रहे
मेरे अशआर मेरे मुल्क की पहचान बनें
कोई रहमान मेरे कौमी तरानें में रहे
बाज के पंजों न ही जाल, बहेलियों से डरे
ये परिन्दे तो हमेशा ही उड़ानों में रहे
हम तो मिट्टी के खिलौने थे गरीबों में रहे
चाभियों वाले बहुत ऊंचे घरानों में रहे
वो तो इक शेर था जंगल से खुले में आया
ये शिकारी तो हमेशा ही मचानों में रहे।
– जयकृष्ण राय तुषार
साभार – कविताकोश
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गरीबी पर उत्कृष्ट कविताएँ – Poem on Poverty in Hindi
यहाँ गरीबी पर प्रसिद्ध कविताएं (Poem on Poverty in Hindi) दी गई हैं:-
गरीबदास का शून्य
घास काटकर नहर के पास,
कुछ उदास-उदास सा
चला जा रहा था
गरीबदास।
कि क्या हुआ अनायास...
दिखाई दिए सामने
दो मुस्टंडे,
जो अमीरों के लिए शरीफ़ थे
पर ग़रीबों के लिए गुंडे।
उनके हाथों में
तेल पिए हुए डंडे थे,
और खोपड़ियों में
हज़ारों हथकण्डे थे।
बोले-
ओ गरीबदास सुन !
अच्छा मुहूरत है
अच्छा सगुन।
हम तेरे दलिद्दर मिटाएंगे,
ग़रीबी की रेखा से
ऊपर उठाएंगे।
गरीबदास डर गया बिचारा,
उसने मन में विचारा-
इन्होंने गांव की
कितनी ही लड़कियां उठा दीं।
कितने ही लोग
ज़िंदगी से उठा दिए
अब मुझे उठाने वाले हैं,
आज तो
भगवान ही रखवाले हैं।
-हां भई गरीबदास
चुप क्यों है ?
देख मामला यों है
कि हम तुझे
ग़रीबी की रेखा से
ऊपर उठाएंगे,
रेखा नीचे रह जाएगी
तुझे ऊपर ले जाएंगे।
गरीबदास ने पूछा-
कित्ता ऊपर ?
-एक बित्ता ऊपर
पर घबराता क्यों है
ये तो ख़ुशी की बात है,
वरना क्या तू
और क्या तेरी औक़ात है ?
जानता है ग़रीबी की रेखा ?
-हजूर हमने तो
कभी नहीं देखा।
-हं हं, पगले,
घास पहले
नीचे रख ले।
गरीबदास !
तू आदमी मज़े का है,
देख सामने देख
वो ग़रीबी की रेखा है।
-कहां है हजूर ?
-वो कहां है हजूर ?
-वो देख,
सामने बहुत दूर।
-सामने तो
बंजर धरती है बेहिसाब,
यहां तो कोई
हेमामालिनी
या रेखा नईं है साब।
-वाह भई वाह,
सुभानल्लाह।
गरीबदास
तू बंदा शौकीन है,
और पसंद भी तेरी
बड़ी नमकीन है।
हेमामालिनी
और रेखा को
जानता है
ग़रीबी की रेखा को
नहीं जानता,
भई, मैं नहीं मानता।
-सच्ची मेरे उस्तादो !
मैं नईं जानता
आपई बता दो।
-अच्छा सामने देख
आसमान दिखता है ?
-दिखता है।
-धरती दिखती है ?
-ये दोनों जहां मिलते हैं
वो लाइन दिखती है ?
-दिखती है साब
इसे तो बहुत बार देखा है।
-बस गरीबदास
यही ग़रीबी की रेखा है।
सात जनम बीत जाएंगे
तू दौड़ता जाएगा,
दौड़ता जाएगा,
लेकिन वहां तक
कभी नहीं पहुंच पाएगा।
और जब
पहुंच ही नहीं पाएगा
तो उठ कैसे पाएगा ?
जहां है
वहीं-का-वहीं रह जाएगा।
लेकिन
तू अपना बच्चा है,
और मुहूरत भी
अच्छा है !
आधे से थोड़ा ज्यादा
कमीशन लेंगे
और तुझे
ग़रीबी की रेखा से
ऊपर उठा देंगे।
ग़रीबदास !
क्षितिज का ये नज़ारा
हट सकता है
पर क्षितिज की रेखा
नहीं हट सकती,
हमारे देश में
रेखा की ग़रीबी तो
मिट सकती है,
पर ग़रीबी की रेखा
नहीं मिट सकती।
तू अभी तक
इस बात से
आंखें मींचे है,
कि रेखा तेरे ऊपर है
और तू उसके नीचे है।
हम इसका उल्टा कर देंगे
तू ज़िंदगी के
लुफ्त उठाएगा,
रेखा नीचे होगी
तू रेखा से
ऊपर आ जाएगा।
गरीब भोला तो था ही
थोड़ा और भोला बन के,
बोला सहम के-
क्या गरीबी की रेखा
हमारे जमींदार साब के
चबूतरे जित्ती ऊंची होती है ?
-हां, क्यों नहीं बेटा।
ज़मींदार का चबूतरा तो
तेरा बाप की बपौती है
अबे इतनी ऊंची नहीं होती
रेखा ग़रीबी की,
वो तो समझ
सिर्फ़ इतनी ऊंची है
जितनी ऊंची है
पैर की एड़ी तेरी बीवी की।
जितना ऊंचा है
तेरी भैंस का खूंटा,
या जितना ऊंचा होता है
खेत में ठूंठा,
जितनी ऊंची होती है
परात में पिट्ठी,
या जितनी ऊंची होती है
तसले में मिट्टी
बस इतनी ही ऊंची होती है
ग़रीबी की रेखा,
पर इतना भी
ज़रा उठ के दिखा !
कूदेगा
पर धम्म से गिर जाएगा
एक सैकिण्ड भी
ग़रीबी की रेखा से
ऊपर नहीं रह पाएगा।
लेकिन हम तुझे
पूरे एक महीने के लिए
उठा देंगे,
खूंटे की
ऊंचाई पे बिठा देंगे।
बाद में कहेगा
अहा क्या सुख भोगा...।
गरीबदास बोला-
लेकिन करना क्या होगा ?
-बताते हैं
बताते हैं,
अभी असली मुद्दे पर आते हैं।
पहले बता
क्यों लाया है
ये घास ?
-हजूर,
एक भैंस है हमारे पास।
तेरी अपनी कमाई की है ?
नईं हजूर !
जोरू के भाई की है।
सीधे क्यों नहीं बोलता कि
साले की है,
मतलब ये कि
तेरे ही कसाले की है।
अच्छा,
उसका एक कान ले आ
काट के,
पैसे मिलेंगे
तो मौज करेंगे बांट के।
भैंस के कान से पैसे,
हजूर ऐसा कैसे ?
ये एक अलग कहानी है,
तुझे क्या बतानी है !
आई.आर.डी.पी. का लोन मिलता है
उससे तो भैंस को
ख़रीदा हुआ दिखाएंगे
फिर कान काट के ले जाएंगे
और भैंस को मरा बताएंगे
बीमे की रकम ले आएंगे
आधा अधिकारी खाएंगे
आधे में से
कुछ हम पचाएंगे,
बाक़ी से
तुझे
और तेरे साले को
ग़रीबी की रेखा से
ऊपर उठाएंगे।
साला बोला-
जान दे दूंगा
पर कान ना देने का।
क्यों ना देने का ?
-पहले तो वो
काटने ई ना देगी
अड़ जाएगी,
दूसरी बात ये कि
कान कटने से
मेरी भैंस की
सो बिगड़ जाएगी।
अच्छा, तो...
शो के चक्कर में
कान ना देगा,
तो क्या अपनी भैंस को
ब्यूटी कम्पीटीशन में
जापान भेजेगा ?
कौन से लड़के वाले आ रहे हैं
तेरी भैंस को देखने
कि शादी नहीं हो पाएगी ?
अरे भैंस तो
तेरे घर में ही रहेगी
बाहर थोड़े ही जाएगी।
और कौन सी
कुंआरी है तेरी भैंस
कि मरा ही जा रहा है,
अबे कान मांगा है
मकान थोड़े ही मांगा है
जो घबरा रहा है।
कान कटने से
क्या दूध देना
बंद कर देगी,
या सुनना बंद कर देगी ?
अरे ओ करम के छाते !
हज़ारों साल हो गए
भैंस के आगे बीन बजाते।
आज तक तो उसने
डिस्को नहीं दिखाया,
तेरी समझ में
आया कि नहीं आया ?
अरे कोई पर थोड़े ही
काट रहे हैं
कि उड़ नहीं पाएगा परिन्दा,
सिर्फ़ कान काटेंगे
भैंस तेरी
ज्यों की त्यों ज़िंदा।
ख़ैर,
जब गरीबदास ने
साले को
कान के बारे में
कान में समझाया,
और एक मुस्टंडे ने
तेल पिया डंडा दिखाया,
तो साला मान गया,
और भैंस का
एक कान गया।
इसका हुआ अच्छा नतीजा,
ग़रीबी की रेखा से
ऊपर आ गए
साले और जीजा।
चार हज़ार में से
चार सौ पा गए,
मज़े आ गए।
एक-एक धोती का जोड़ा
दाल आटा थोड़ा-थोड़ा
एक एक गुड़ की भेली
और एक एक बनियान ले ली।
बचे-खुचे रुपयों की
ताड़ी चढ़ा गए,
और दसवें ही दिन
ग़रीबी की रेखा के
नीचे आ गए।
- अशोक चक्रधर
साभार - कविताकोश
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गरीब और मौसम
गरीब से मौसम, कितना हिसाब लेता है
सब्र का सावन, गर्म बरसात बना देता है।
आंहों से भले अपने तूफान उमड़ते हैं
मगर दर्द को भंवर सैलाब बना देता है
हर छंद का आयाम मेरा लाचार होकर
हंसी नग्मों को कैसे श्मशान बना देता है
अहले सियासत को आया तरस हम पर
ये सियासी हथकंडा बेकार बना देता है
मेरा इम्तिहान होता न, गर मैदान में होता
हजार साल का तसद्दुद लाचार बना देता है
– बाल गंगाधर ‘बागी’
साभार – कविताकोश
गीत गरीबी के
“बेधड़क बनाते हैं
सोई चेतना जगाते हैं
पूंजवाद को ललकारते हैं
गीत गरीबी के, गीत गरीबी के…
संघर्षों की स्याही से
कोहरे काग़ज़ पर लिखे होते हैं
दुखों के छाया के पीछे
एकांत में कहीं छिपे होते हैं
गीत गरीबी के
जज़ब्बतों को समेटे खुद में
उतर जाते है किसी गहरे कुए में
झेलते है मार मौसम की
बढ़ते रहते है निरंतर बिना धुन के
गीत गरीबी के, गीत गरीबी के…
हर शब्द में अपने
पीड़ाओं की गाथाएं गाते हैं
जिसे जग ने ठुकराया है
उसको भी अपनाते हैं
गीत गरीबी के, गीत गरीबी के…
पतझड़ को सुहाना,
सावन को पराया
बसंत की बहार को कल्पना कहते हैं
सर्द मौसम में ठिठुरते हैं अक्सर,
गीत गरीबी के, गीत गरीबी के…
श्रम का सम्मान करते हैं
नयनों में सागर भरते हैं
किसी गरीब की झोपड़ी में जले
दीपक की अंतिम लौ हैं
गीत गरीबी के, गीत गरीबी के…
तमस की तन्हाई से मिलकर
सब खोकर, सपनों में उलझकर
सुनसान सन्नाटों में मौन रहकर
भूखे पेट की गाथाएं गाते हैं,
गीत गरीबी के, गीत गरीबी के…”
– मयंक विश्नोई
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