क्यों भारत के लिए नाक का सवाल था Khanwa ka Yudh

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Khanwa ka Yudh

भारत के इतिहास में अपनी ज़मीन बचाने के लिए बहुत युद्ध हुए हैं। इनमें से एक युद्ध ऐसा था जिसने अपने आप को भारत के इतिहास में हमेशा के लिए अमर करा लिया था। यह युद्ध भारत के इतिहास के लिए बहुत महत्वपूर्ण था। इस युद्ध को लड़ रहे थे चित्तौड़ के महान राजपूत वीर योद्धा राणा सांगा और उनसे लड़ रहे थे मुगल बादशाह बाबर। वर्चस्व की लड़ाई इतनी बड़ी थी इसमें बहुत मारकाट हुई। इस युद्ध का इतना गहरा प्रभाव रहा कि इसने मुगलों को भारत पर राज करने का मौका दे दिया। आइए, जानते हैं इस ब्लॉग में कि Khanwa ka Yudh कैसे लड़ा गया। 

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युद्ध से पहले तैयारी

Khanwa ka Yudh राजस्थान के भरतपुर के पास ‘खानवा’ नामक एक गांव में लड़ा गया था। इसके शुरू होने से पहले राणा सांगा के साथ हसन खां मेवाती, महमूद लोदी और अनेक राजपूत सरदार अपनी-अपनी सेना को ले साथ हो गए। वह हौसले के साथ एक विशाल सेना के साथ बयाना और आगरा पर अधिकार करने के लिए बढ़े। बयाना के शासक ने बाबर से सहायता मांगी। बाबर ने ख्वाजा मेंहदी को भेजा पर राणा सांगा ने उसे परास्त कर बयाना पर अधिकार कर लिया। सीकरी के पास भी मुग़ल सेना को करारी हार झेलनी पड़ी। लगातार मिल रही पराजय से मुग़ल सैनिक डर चुके थे।

अपनी सेना का मनोबल गिरते देखकर बाबर ने मुसलामानों पर से तमगा (एक प्रकार का सीमा टैक्स) भी उठा लिया और अपनी सेना को कई तरह के लालच दिए। उसने अपने-अपने सैनिकों से निष्ठापूर्वक युद्ध करने और प्रतिष्ठा की सुरक्षा करने का हुकुम दिया। इससे उसकी सैनकों में युद्ध करने को तैयार हो गई।

बाबर राणा सांगा का मुकाबला करने के लिए फतेहपुर सिकरी के निकट खानवा नामक जगह पर पहुँचा। राणा सांगा उसकी प्रतीक्षा में ही थे। बाबर ने पानीपत में जैसे चाल चली थी उसने वैसे ही खानवा में चाल चली। बाबर को यह अच्छे से पता था कि राणा सांगा से उसकी लड़ाई बहुत टक्कर की होने वाली है।

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युद्ध का महत्वपूर्ण दिन

Khanwa ka Yudh
Source: Wikipedia

Khanwa ka Yudh 16 मार्च, 1527 राणा सांगा और मुग़ल बादशाह बाबर के बीच हुआ था। खानवा के मैदान में दोनों सेनाओं के बीच जबरदस्त खूनी मुठभेड़ हुई। बाबर 2 लाख मुग़ल सैनिक थे, और ऐसा कहा जाता है कि राणा सांगा के पास भी बाबर जितनी सेना थी। राणा सांगा के राजपूतों के पास वीरता का भंडार था और वे बिलकुल घमासानी से लड़े पर बाबर के पास गोला-बारूद का बड़ा जखीरा था। युद्ध में बाबर ने सांगा की सेना के लोदी सेनापति को प्रलोभन दिया तो, वो सांगा को धोखा देकर सेना सहित बाबर से जा मिला। लड़ते हुए राणा सांगा की एक आँख में तीर भी लगा था, लेकिन उन्होंने इसकी नहीं की और युद्ध में डटे रहे। इस युद्ध में उन्हें कुल 80 घाव आए थे। उनकी लड़ाई में दिखी वीरता से बाबर के होश उड़ गए थे। यह लड़ाई पूरे दिन चली थी।

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Khanwa ka Yudh परिणाम

वीरता का परिचय देते हुए राणा सांगा की सेना को बाबर की सेना को अपने से नीचे ही रखा। Khanwa ka Yudh इसलिए भी महत्वपूर्ण था क्योंकि अपनों की गद्दारी ने युद्ध बदल डाला था। लोदी के गद्दारी करने की वजह से राणा सांगा की सेना शाम होते-होते लड़ाई हार गई थी, लेकिन राणा सांगा को उनकी सेना युद्ध खत्म होने से पहले किसी सुरक्षित स्थान पर ले गई थी। हालांकि, कुछ दिन बाद अपनी ही सेना में से किसी ने राणा सांगा को जहर दे दिया था और 1528 में उनकी मृत्यु हो गई थी। बाबर यह युद्ध अपने सैनिकों की वीरता से नहीं बल्कि अपने आधुनिक तोपखानों और हथियारों से जीता था. कुछ महत्वपूर्ण परिणाम यह भी थे – 

  • Khanwa ka Yudh बाबर के लिए बहुत महत्त्वपूर्ण इसलिए था कि क्योंकि उसने एक वीर शासक को हराया और यह बात पूरे भारत में फ़ैल गई। इस युद्ध ने उसे भारत में पाँव फैलाने का अवसर प्रदान किया।
  • इस युद्ध के बाद राजपूत-अफगानों का संयुक्त “राष्ट्रीय मोर्चा” ख़त्म हो गया।
  • खानवा युद्ध के बाद बाबर की शक्ति का आकर्षण केंद्र अब काबुल नहीं रहा, बल्कि आगरा-दिल्ली बन गया।

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युद्ध के बाद बाबर की ताजपोशी

Khanwa ka Yudh बाबर के लिए नया अध्याय लाया। जीतने के बाद बाबर ने ‘ग़ाज़ी’ की उपाधि धारण की। इस जीत से दिल्ली-आगरा में बाबर की स्थिति ठोस हो गई। इसके बाद बाबर ने हसन ख़ान मेवाती से अलवर का बहुत बड़ा भाग भी छीन लिया। इसके बाद उसने मालवा स्थित चन्देरी के मेदिनी राय के विरुद्ध अभियान छेड़ा। इस दौरान राजपूत सैनिकों ने बाबर के ख़िलाफ़ ख़ून की अंतिम बूंद तक जंग लड़ी, लेकिन वह हार गए।

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Khanwa ka Yudh और उसके कारण

Khanwa ka Yudh
Source : India Old Days
  • राणा सांगा भी अफगानों की सत्ता समाप्त कर अपना राज्य स्थापित करना चाहते थे। उन्होंने अपनी शक्ति बहुत बढ़ा ली थी। उनके राज्य की सीमा आगरा के निकट तक पहुँच गई थी। बाबर को लगता था कि अगर कोई उसे हरा सकता है तो वह हैं राणा सांगा।
  • राणा सांगा समझते थे कि बाबर भी अन्य मध्य एशियाई लूटेरों की तरह लूट-पाट करके भाग जाएगा। फिर उसके जाने के बाद वह दिल्ली अपने अधिकार में ले लेंगे।
  • सिंधु-गंगा घाटी में बाबर के वर्चस्व ने सांगा के लिए खतरा बढ़ा दिया। उन्होंने उसे देश से भगाने का निर्णय लिया।
  • इसी बीच जब बाबर ने अफगान विद्रोहियों को कुचलने का निर्णय लिया तब अनेक अफगान सरदार राणा सांगा के शरण में जा पहुँचे। इनमें प्रमुख थे इब्राहीम लोदी का भाई महमूद लोदी और मेवात का सूबेदार हसन खां मेवाती। इन लोगों ने राणा सांगा को बाबर के विरुद्ध युद्ध करने के लिए प्रेरित किया और अपनी सहायता का वचन भी दिया।
  • राणा सांगा बाबर द्वारा कालपी, बयाना, आगरा और धौलपुर पर अधिकार किए जाने से गुस्से में थे क्योंकि वह इन क्षेत्रों को अपने साम्राज्य के अंदर मानते थे।

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इस ब्लॉग में अपने जाना Khanwa ka Yudh कैसे हुआ। हमें आशा है कि आप को Khanwa ka Yudh के इस ब्लॉग से वीर योद्धा राणा सांगा और राजपूत सेना की दिलेरी का पता चला होगा, इस ब्लॉग को आप शेयर करें जिससे बाकी लोगों को भी उनकी बहादुरी के किस्से पहुंचें। अन्य प्रकार के ब्लॉग पढ़ने के लिए आप Leverage Edu पर जा सकते हैं।

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