क्यों आकर्षित करती है Nehru Trophy Boat Race

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Nehru Trophy Boat Race

भारत के कोने-कोने में कोई न कोई रेस चलती रहती हैं। यह एक अनोखी रेस होती है और उसे कहते हैं Nehru Trophy Boat Race, यह रेस अपने आप में एक त्यौहार की तरह है। यह सिर्फ एक रेस है नहीं बल्कि इसके पीछे लोगों की भावनाएं भी हैं। केरल में होने वाली यह रेस भारत के पहले प्रधानमंत्री से भी जुड़ी है। इस ब्लॉग में आप जानेंगे इस रेस का हर एक पहलु जानेंगे। चलिए जानते है Nehru Trophy Boat Race के बारे में विस्तार से –

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Nehru Trophy Boat Race क्या है?

Nehru Trophy Boat Race
Source: YouTube

हर वर्ष अगस्त महीने के दूसरे शनिवार को आलप्पुष़ा ‘पुन्नमडाकायल्’ में चलाए जानेवाला ‘नेहरू ट्रॉफी बोट-रेस’, नौका-दौड़ प्रतियोगिताओं में सबसे लोकप्रिय प्रतियोगिता है। अत्यंत जोश एवं उत्साह से भरी इस प्रतियोगिता के दिन ‘पुन्नमडा-झील’ का प्रशांत वातावरण, एक ‘जनमहासमुद्र’ (महा समुद्र) बन जाता है | देश-विदेश से करीब दो लाख पर्यटक इसको देखने आते हैं। कुट्टनाड् के प्रत्येक गाँव के लोगों के लिए यह प्रतियोगिता किसे मेले से कम तो नहीं होती। जो यह प्रतियोगिता जीतते हैं उनके दिलों में महीनों तक भरी रहती है। 

इस नौका-दौड़ प्रतियोगिता का सबसे बड़ा आकर्षण का केंद्र ‘चुण्डन वल्लम’ यानी ‘स्नेक बोट’ है। सौ फीट से ज़्यादा लंबाई और उभरे हुए पोताग्र (नाव का नुकीला हिस्सा) से युक्त चुण्डनवल्लों का आकार अत्यंत प्रभाव वाला है। केरल के चुण्डनवल्लों का यूरोपिय नामराशियों के साथ कोई नाता नहीं है, फिर भी नॉरवे की देशी-नाव के आधार पर पुराने शासकों ने इनको ‘स्नेक-बोट्स’ की संज्ञा दी थी।

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Nehru Trophy Boat Race का रोचक इतिहास

Nehru Trophy Boat Race
Source: Wikipedia

Nehru Trophy Boat Race का इतिहास पूर्व प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के ‘आलप्पुष़ा-पर्यटन’ से जुड़ा है, जो उस समय भारत के प्रधानमंत्री थे। इस यात्रा के दौरान, चारों ओर पानी से घिरे कुट्टनाड् में कोट्टयम से आलप्पुषा तक एक नाव में जाने का मौका उन्हें मिला। उनके पीछे अनेक बेहतरीन नाव थी। 1952 में चुण्डनवल्लों की पहली प्रतियोगिता बिलकुल अलग थी जो नेहरूजी को सम्मान देने को आयोजित की थी। इसमें ‘नडुभागम् चुण्डन’ ने पहला स्थान प्राप्त किया। नाव खेनेवालों के प्रदर्शन देखकर नेहरू जी बहुत खुश हो गए। नेहरू जी ने उनकी खूब तारीफ की थी. आगे, प्रधानमंत्री को लेकर नाव पोतघाट (Boat Jetty) की ओर बढ़ी। दिल्ली पहूँचकर दिसंबर 1952 में नेहरू जी ने चाँदी की एक ट्रॉफी को उपहार के रूप में दिया। इस ट्रॉफी में उनके साइन के ऊपर लिखा हुआ है-

“‘नौका -दौड़ प्रतियोगिता’ जो त्रवंकूर -कोच्चि के जीवन की अनोखी खासियत है,उसके विजेताओं के लिए:-“

पहला इसका नाम ‘प्राइम मिनिस्टर ट्रॉफी’ था। 1969 से यह ‘नेहरू-ट्रॉफी’ नाम से जानी गई और तब से लेकर हर साल आलप्पुषा-निवासियों के द्वारा नेहरू जी की याद में ‘नेहरू ट्रॉफी बोट-रेस’ मनाया जा रहा है। इसको ‘कुट्टनाड के ओलिंपिक की संज्ञा दी जा सकती है।

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रेस की तैयारियां कैसे होती हैं?

Nehru Trophy Boat Race की तैयारियां एक महीने पहले से शुरू हो जाती हैं। इसके लिए इंतजाम भी ख़ास होते हैं और यह रेस अपने आप में ही बहुत ख़ास होती है। जानते हैं, तैयारियों के बारे में – 

  • चुन्नी मछली (सारडाइन) का तेल पूरी नौका को लगाया जाता है, इससे वह पानी में बड़ी आसानी से आगे बढ़ती है।
  • अलग-अलग गांवों का प्रतिनिधित्व करने के लिए 150 मल्लाहों (नाव चलाने वाले) का चुना जाता है।
  • यह मल्लाह रेस पूरी होने तक ब्रह्मचर्य और मासांहार न करने का व्रत लेते हैं।
  • इन मल्लाहों को पुराने और अनुभवी मल्लाह प्रशिक्षण देते हैं।
  • ट्रेनिंग सेशन के दौरान नदी के किनारे हर दिन सामूहिक भोज होता है। गांव के समृद्ध परिवार आगे आकर मल्लाहों को खाना खिलाते हैं।

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आकर्षण का खेल है Nehru Trophy Boat Race 

Nehru Trophy Boat Race
Source: Hello Travel

Nehru Trophy Boat Race के कुछ स्टार अट्रेक्शन भी हैं, जिनसे यह दर्शकों का मन मोह लेते हैं और उन्हें इस रेस में खूब आनंद दिलाते हैं. बताते हैं आपको –

  • चंदन वल्लम या स्नेक बोट – 100 फीट लंबी इस नौका को देखना ही आनंद दे देता है।
  • हर सर्प नौका में 100 से ज्यादा मल्लाह, खैवनहार और 25 चीयर लीडर्स आ सकते हैं।
  • स्नैक बोट, यह नाम ब्रिटिश काल में दिया गया था। दरअसल, नॉर्वे में इस तरह की बोट्स को स्नैक बोट्स ही कहते थे, जबकि केरल में इन्हें चंदन वल्लम कहा जाता था।
  • इस रेस में भाग लेने वाली केरल की अन्य नौकाओं में चुरुलन, वेप्पू और ओदी शामिल है।
  • रेस के दौरान झील का समूचा किनारा ही किसी बहुरूपदर्शी खिलौने की शक्ल ले लेता है। बहुरंगी और खूबसूरत छतरियां इन बोट्स पर लगी होती हैं। यह नजारा अनोखा होता है। केरल की सांस्कृतिक विरासत को लेकर कथकली, थेय्यम, पंचवध्यम, और पदयानी कलाकार अपनी कला पेश करते हैं।
  • पतवार का एक मिनट में 100 से 120 बार चलना और मल्लाह का एक-दूसरे को प्रेरित करते हुए उत्साह भरी आवाज में शोर मचाना कभी न भूलने वाला अनुभव है।
  • अलग-अलग बोट्स के लिए मल्टीपल ट्रैक्स बने होते हैं।
  • रेस की शुरुआत होती है जब मल्लाह एक साथ होकर ड्रम बीट करते हैं।
  • कुल आठ ट्रैक; 30 मीटर की चौड़ाई के साथ प्रत्येक झील में चिह्नित होता है।
  • इस रेस को देखने के लिए इसकी टिकट 100 रूपये से शुरू होकर 3000 रूपये तक है।

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भाईचारे का भी ध्यान 

एक गाँव से करीब 150 लोग व्रत के साथ इस प्रशिक्षण में भाग लेते हैं। इनके लिए भोजन का प्रबंध गाँव के संपन्न लोगों और हितैषियों के द्वारा किया जाता है। जब देश में छुआछूत की जैसी कूप्रथा थी, तब भी कुट्टनाडु के लोग जलोत्सव के दिनों में सभी भेदभावों को भूलकर एक साथ भोजन (वल्लसद्या) लेते थे और खुशियाँ बाँटते थे। आज भी यही अवस्था ज़ारी रही है। वास्तव में, कुट्टनाडु के सांप्रदायिक-सौहार्द का सच्चा प्रतीक है ‘ Nehru Trophy Boat Race। 

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नियमों का रखते हैं ध्यान

Nehru Trophy Boat Race
Source: Pinterest

Nehru Trophy Boat Race में यह हैं नियम और उनसे जुड़ी कुछ जानकारी इस प्रकार है।

ट्रैक्स –
लंबाई – 1370 मीटर (4110 फुट) 
4 ट्रैक्स – 10 मीटर (30 फुट) विस्तार

चुण्डन –
अमरक्कार ( नाव के पिछले भाग में बैठने वाले ) – पाँच लोग
निलक्कार ( नाव के बीच में खडे लोग जो जोर से ताल देकर, प्रयाण-गीत गाकर नाव खेनेवालों का उत्साह बढ़ाते हैं)-पांच लोग
टीम के सदस्यों की कुल-संख्या – 111

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Nehru Trophy Boat Race के इस ब्लॉग में आपने इस रेस प्रतियोगिता के बारे में जाना। हमेशा आशा है कि Nehru Trophy Boat Race का यह ब्लॉग आपको अच्छा लगा होगा, इसे ज्यादा से ज्यादा शेयर करें ताकि और लोगों को भी इस बारे में जानकारी मिले। इसी तरह के और आकर्षक ब्लॉग पढ़ने के लिए Leverage Edu वेबसाइट पर जाकर पढ़ सकते हैं। 

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