उत्तर: “ऊधो, तुम हौ अति बड़भागी” — इस कथन के माध्यम से सूरदास ने उन लोगों पर व्यंग्य किया है जो कृष्ण-प्रेम से वंचित हैं और केवल ज्ञान या तर्क के आधार पर जीवन जीते हैं। गोपियाँ उद्धव से कहती हैं कि तुम बड़े भाग्यशाली हो जो कृष्ण के साथ रहते हो, परंतु उनके प्रेम से वंचित हो। यह व्यंग्य उन लोगों पर है जो ईश्वर के समीप रहकर भी प्रेम-भाव को नहीं समझते।
सूरदास इसके माध्यम से यह संदेश देते हैं कि प्रभु-प्रेम ही जीवन की सच्ची पूँजी है। चाहे उसमें तड़प और वेदना हो, फिर भी वही जीवन को सार्थकता प्रदान करता है। जो व्यक्ति ईश्वरीय प्रेम से दूर हैं, वे वास्तव में अभागे और अधूरे हैं।
अन्य प्रश्न
- गोपियाँ किस आशा पर विरह के कष्ट को सहन कर रही थीं?
- गोपियों द्वारा उद्धव को भाग्यवान कहने में क्या व्यंग्य निहित है?
- उद्धव के व्यवहार की तुलना किस-किस से की गई है?
- गोपियों ने किन-किन उदाहरणों के माध्यम से उद्धव को उलहाने दिए हैं?
- ‘नाहीं परत कही’ में गोपियाँ अपनी व्यथा क्यों नहीं कह पा रही हैं?
- गोपियों को उद्धव द्वारा दिया गया योग संदेश कैसा लगता है और क्यों?
- ‘यह तौ ‘सूर’ तिनहिं लै सौंपौ, जिनके मन चकरी’ इस पंक्ति का आशय स्पष्ट कीजिए।
- ‘हरि हैं राजनीति पढ़ि आए’ इस पद में गोपियाँ कृष्ण के किस रूप का वर्णन कर रही हैं?
- गोपियों के अनुसार अनीति क्या है?
- उपर्युक्त पद में गोपियों की कौन-सी विशेषता प्रकट हो रही है?
- पहले के भले लोगों का कैसा स्वभाव होता था?
- सूरदास जी ने उद्धव एवं कमल-पत्र में क्या समानता बताई है?
- गोपियों ने अपनी तुलना किससे की है और क्यों?
- ‘प्रीति-नदी में पाउँ न बोर्यो’ के माध्यम से गोपियाँ उद्धव से क्या कहना चाहती हैं?
- कृष्ण द्वारा भेजा गया योग-संदेश सुन गोपियाँ हताश और कातर क्यों हो उठीं?
- गोपियाँ अब धैर्य क्यों नहीं रख पा रही हैं?
- सु तौ ब्याधि हमकों लै आए यहाँ गोपियों ने ‘व्याधि’ किसे माना है और क्यों?
- “ते क्यों अनीति करें आपुन, जे और अनीति छुड़ाए” – गोपियों ने इससे किस पर व्यंग्य किया है?
- “राजधरम तौ यहै” इस कथन के माध्यम से सूरदास ने किस जीवन-सत्य का बोध कराया है?

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