Guru Par Kavita: शिक्षा के महत्व को समझाने वाली गुरु पर लोकप्रिय कविताएं

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Guru Par Kavita

Guru Par Kavita: गुरु ही हम सभी के जीवन में एक मार्गदर्शक, प्रेरक और सच्चे साथी होते हैं, उनकी महिमा को शब्दों में पिरोना इतना आसान नहीं है। गुरु ही हमें अंधकार से प्रकाश की ओर ले जाते हैं, इसके साथ ही उनके सानिध्य में हम हमारी जीवन की हर चुनौती का सामना करने के लिए दृढ़ संकल्पित हो पाते हैं। गुरु पर कविताएं गुरु की महिमा को समर्पित हैं, जो हमने उनके ज्ञान और अपने जीवन में उनके महत्व के बारे में जान पाएंगे। इस लेख में आपके लिए गुरु पर कविता (Guru Par Kavita) दी गई हैं। यहां पढ़ें गुरु पर चुनिंदा लोकप्रिय कविताएं।

गुरु पर कविता – Guru Par Kavita

कई लेखकों और कवियों द्वारा लिखी गई गुरु पर कविता (Guru Par Kavita) की सूची नीचे दी है, जो गुरु की उपमा, उनकी शिक्षाओं और उनके अद्वितीय योगदान को सम्मानित करती है।

कविता का नामकवि/कवियत्री का नाम
गुरु है सकल गुणों की खानकोदूराम दलित
गुरु महिमा दोहेपद्मजा बाजपेयी
गुरुवे नम:गोपाल कृष्‍ण भट्ट
एक गुरु के शिष्यश्रीनाथ सिंह
गुरु को प्रणाम हैसुरेश कुमार शुक्ल ‘संदेश’
शिक्षकतरुणा खुराना
गुरु की वाणीसुजाता मिश्रा
गुरु और चेलासोहनलाल द्विवेदी

गुरु है सकल गुणों की खान

गुरु, पितु, मातु, सुजन, भगवान,
ये पाँचों हैं पूज्य महान।
गुरु का है सर्वोच्च स्थान,
गुरु है सकल गुणों की खान।

कर अज्ञान तिमिर का नाश,
दिखलाता यह ज्ञान-प्रकाश।
रखता गुरु को सदा प्रसन्न,
बनता वही देश सम्पन्न।

कबिरा, तुलसी, संत-गुसाईं,
सबने गुरु की महिमा गाई।
बड़ा चतुर है यह कारीगर,
गढ़ता गाँधी और जवाहर।

आया पावन पाँच-सितम्बर,
श्रद्धापूर्वक हम सब मिलकर।
गुरु की महिमा गावें आज,
शिक्षक-दिवस मनावें आज।

एकलव्य-आरुणि की नाईं,
गुरु के शिष्य बने हम भाई।
देता है गुरु विद्या-दान,
करें सदा इसका सम्मान।

अन्न-वस्त्र-धन दें भरपूर,
गुरु के कष्ट करें हम दूर।
मिल-जुलकर हम शिष्य-सुजान,
करें राष्ट्र का नवनिर्माण।

– कोदूराम दलित

गुरु महिमा दोहे

गुरु की महिमा बहुत है,
मिल जाए यदि नेक
मंजिल समझो, मिल गई
बिन नौका बिन टेक।

सच्चा गुरु दिखाएगा
हर अच्छी ही राह,
कलुष तुम्हारा घुल गया,
कंचन हो गयी चाह।
ज्ञान बिना खुलते नहीं,
मोहपाश के बन्ध,
गुरु प्रकाश से ही कटे,
हर विपदा के फंद।

प्रभु को पाना है अगर,
गुरु का कर सत्संग,
मूल मंत्र मिल जाएगा,
सद्ग्रंथों के संग।

कठिन तपस्या-साधना,
मोह-मान का त्याग,
सत्कर्मों से ही मिटे,
जन्म-मरण का राग।

जहाँ गुरु वहाँ स्वर्ग है,
पावन है सब पर्व।
सतगुरु की कृपा से
जीवन हो गया धन्य।

– पद्मजा बाजपेयी

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गुरुवे नम:

अक्षर ज्ञान दि‍वाय कै, उँगली पकड़ चलाय।
पार लगावै गुरु ही या, केवट पार लगाय।।

बन गुरुत्‍व धरती नहीं, धुर बि‍न चलै न काक।
गुरुजल बि‍न संयंत्र परम, गुरु बि‍न से न धाक।।

सर्वोपरि‍ स्‍थान है, गुरु कौ यह इति‍हास।
देव अदेव चराचर प्राणी, करैं सभी अरदास।।

‘आकुल’ जग में गुरु से, धर्म-ज्ञान-प्रताप।
आश्रय जो गुरु कौ रहै, दूर रहै संताप।।

गुरु कौ सर पै हाथ होय, भवसागर तर जाय।
श्रद्धा, नि‍ष्‍ठा, प्रेम, यश, लक्षमी सुरसती आय।।

गुरु कौ तोल कराय जो, वो मूरख कहवाय।
तोल मोल क फेर में, यूँ ही जीवन जाय।।

ज्ञान गुरु, दीक्षा गुरु, धर्म गुरु बेजोड़।
चलै संस्‍कृति‍ इन्‍हीं सूँ, इनकौ न कोई तोड़।।

मात-पि‍ता-गुरु-राष्‍ट्र ऋण, कोई न सक्‍यौ उतार।
जब भी जैसे भी मि‍लैं इन कूँ कभी न तार।।

गुरु बि‍न समरथ जानि‍ये, दो दि‍न भलै न खास।
‘आकुल’ पड़ै अकाल अकेलौ पड़ै खोय बि‍सवास।।

‘आकुल’ वो बड़भाग हैं, ऐसौ कहैं बतायँ।
गुरु और मात-पि‍ता जब जावैं, वाके काँधे जायँ।।

– गोपाल कृष्‍ण भट्ट

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एक गुरु के शिष्य

शिष्य एक गुरु के हैं हम सब,
एक पाठ पढ़ने वाले।
एक फ़ौज के वीर सिपाही,
एक साथ बढ़ने वाले।
धनी निर्धनी ऊँच नीच का,
हममे कोई भेद नहीं।
एक साथ हम सदा रहे,
तो हो सकता कुछ खेद नहीं।
हर सहपाठी के दुःख को,
हम अपना ही दुःख जानेंगे।
हर सहपाठी को अपने से,
सदा अधिक प्रिय मानेंगे।
अगर एक पर पड़ी मुसीबत,
दे देंगे सब मिल कर जान।
सदा एक स्वर से सब भाई,
गायेंगे स्वदेश का गान।

– श्रीनाथ सिंह

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गुरु को प्रणाम है

कण-कण में समान चेतन स्वरूप बसा,
एकमात्र सत्य रूप दिव्य अभिराम है।
जीवन का पथ जो दिखाता तम-तोम मध्य,
लक्ष्य की कराता पहचान शिवधाम है।
धर्म समझाता कर्म-प्रेरणा जगाता और
प्रेम का पढ़ाता पाठ नित्य अविराम है।
जग से वियोग योग ईश्वर से करवाता
ऐसे शिवरूप सन्त गुरु को प्रणाम है।

जड़ता मिटाता चित्त चेतन बनाता और
शान्ति की सुधा को बरसाता चला जाता है।
तमकूप से निकाल मन को सम्हाल गुरु
ज्ञान रश्मियों से नहलाता चला जाता है।
पग-पग पर करता है सावधान नित्य
पन्थ सत्य का ही दिखलाता चला जाता है।
आता है अचानक ही जीवन में घटना-सा
दिव्य ज्योति उर की जगाता चला जाता है।

भंग करता है अन्धकार का अनन्त रूप
ज्ञान गंग धार से सुपावन बनाता है।
स्वार्थ सिद्धियों से दूर परमार्थ का स्वरूप
लोकहित जीवन को अपने तपाता है।
दूर करता है ढूँढ़-ढूँढ के विकार सभी
पावन प्रदीप गुरु मन में जगाता है।
तत्व का महत्व समझाता अपनत्व सत्व
दिव्य आत्मतत्व से एकत्व करवाता है।

जिनके पदाम्बुजों के कृपा मकरन्द बिना
मंभ्रिंग मत्त हो न भव भूल पाता है।
काम क्रोध लोभ मोह छल छद्म द्वेष दम्भ
जगत प्रपंच नहीं रंच विसराता है।
पाता नहीं नेक सुख जग देख मन्दिर में,
दुःख पर दुःख स्वयं जाता उपजाता है।
गुरु बिना ज्ञान कहाँ, ज्ञान बिना राम कहाँ,
राम बिना जीवन सकाम रह जाता है।

अभिमान सैकताद्रि होता नहीं ध्वस्त और
मान अपमान सुख, दुख को मिटाता कौन?
युग-युग से भरा हुआ था द्वेष भाव पुष्ट
तन-मन से निकाल उसको भगाता कौन?
कागदेश में फँसा था मन हंस पन्थ भूल,
दिव्य मानसर तक उसे पहुँचाता कौन?
गुरुबिन कौन पुण्य पाप समझाता यहाँ
जीवन के बुझते प्रदीप को जगाता कौन?

– सुरेश कुमार शुक्ल ‘संदेश’

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शिक्षक

आदर्शों की मिसाल बनकर
बाल जीवन संवारता शिक्षक,
सदाबहार फूल-सा खिलकर
महकता और महकाता शिक्षक,
नित नए प्रेरक आयाम लेकर
हर पल भव्य बनाता शिक्षक,
संचित ज्ञान का धन हमें देकर
खुशियां खूब मनाता शिक्षक,
पाप व लालच से डरने की
धर्मीय सीख सिखाता शिक्षक,
देश के लिए मर मिटने की
बलिदानी राह दिखाता शिक्षक,
प्रकाशपुंज का आधार बनकर
कर्तव्य अपना निभाता शिक्षक,
प्रेम सरिता की बनकर धारा
नैया पार लगाता शिक्षक।

– तरुणा खुराना

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गुरु की वाणी

गुरु आपकी ये अमृत वाणी
हमेशा मुझको याद रहे
जो अच्छा है जो बुरा है
उसकी हम पहचान करें
मार्ग मिले चाहे जैसा भी
उसका हम सम्मान करें
दीप जले या अंगारे हों
पाठ तुम्हारा याद रहे
अच्छाई और बुराई का
जब भी हम चुनाव करें
गुरु आपकी ये अमृत वाणी
हमेशा मुझको याद रहे

– सुजाता मिश्रा

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गुरु पर कविता हिंदी में

गुरु पर कविता हिंदी में निम्नलिखित हैं, जिन्हें पढ़कर आप अपने जीवन में गुरु के महत्व और उनके ज्ञान की महिमा के बारे में जान पाएंगे :

गुरु और चेला

गुरु एक थे और था एक चेला,
चले घूमने पास में था न धेला।

चले चलते-चलते मिली एक नगरी,
चमाचम थी सड़कें चमाचम थी डगरी।

मिली एक ग्वालिन धरे शीश गगरी,
गुरु ने कहा तेज़ ग्वालिन न भग री।

बता कौन नगरी, बता कौन राजा,
कि जिसके सुयश का यहाँ बजता बाजा।

कहा बढ़के ग्वालिन ने महाराज पंडित,
पधारे भले हो यहाँ आज पंडित।

यह अँधेर नगरी है अनबूझ राजा,
टके सेर भाजी, टके सेर खाजा।

गुरु ने कहा-जान देना नहीं है,
मुसीबत मुझे मोल लेना नहीं है।

न जाने की अँधेर हो कौन छन में?
यहाँ ठीक रहना समझता न मन में।

गुरु ने कहा किंतु चेला न माना,
गुरु को विवश हो पड़ा लौट जाना।

गुरुजी गए, रह गया किंतु चेला,
यही सोचता हूँगा मोटा अकेला।

चला हाट को देखने आज चेला,
तो देखा वहाँ पर अजब रेल-पेला।

टके सेर हल्दी, टके सेर जीरा,
टके सेर ककड़ी टके सेर खीरा।

टके सेर मिलती थी रबड़ी मलाई,
बहुत रोज़ उसने मलाई उड़ाई।

सुनो और आगे का सिर हाल ताज़ा।
थी अँधेर नगरी, था अनबूझ राजा।

बरसता था पानी, चमकती थी बिजली,
थी बरसात आई, दमकती थी बिजली।

गरजते थे बादल, झमकती थी बिजली,
थी बरसात गहरी, धमकती थी बिजली।

गिरी राज्य की एक दीवार भारी,
जहाँ राजा पहुँचे तुरत ले सवारी।

झपट संतरी को डपटकर बुलाया,
गिरी क्यों यह दीवार, किसने गिराया?

कहा संतरी ने-महाराज साहब,
न इसमें ख़ता मेरी, ना मेरा करतब!

यह दीवार कमज़ोर पहले बनी थी,
इसी से गिरी, यह न मोटी घनी थी।

ख़ता कारीगर की महाराज साहब,
न इसमें ख़ता मेरी, या मेरा करतब!

बुलाया गया, कारीगर झट वहाँ पर,
बिठाया गया, कारीगर झट वहाँ पर।

कहा राजा ने-कारीगर को सज़ा दो
ख़ता इसकी है आज इसको कज़ा दो।

कहा कारीगर ने, ज़रा की न देरी,
महाराज! इसमें ख़ता कुछ न मेरी।

यह भिश्ती की ग़लती यह उसकी शरारत,
किया गारा गीला उसी की यह ग़फ़लत।

कहा राजा ने-जल्द भिश्ती बुलाओ।
पकड़कर उसे जल्द फाँसी चढ़ाओ।

चला आया भिश्ती, हुई कुछ न देरी,
कहा उसने-इसमें ख़ता कुछ न मेरी।

यह ग़लती है जिसने मशक़ को बनाया,
कि ज़्यादा ही जिसमें था पानी समाया।

मशकवाला आया, हुई कुछ न देरी,
कहा उसने इसमें ख़ता कुछ न मेरी।

यह मंत्री की ग़लती, है मंत्री की ग़फ़लत,
उन्हीं की शरारत, उन्हीं की है हिकमत।

बड़े जानवर का था चमड़ा दिलाया,
चुराया न चमड़ा मशक को बनाया।

बड़ी है मशक ख़ूब भरता है पानी,
ये ग़लती न मेरी, यह ग़लती बिरानी।

है मंत्री की ग़लती तो मंत्री को लाओ,
हुआ हुक्म मंत्री को फाँसी चढ़ाओ।

चले मंत्री को लेके जल्लाद फ़ौरन,
चढाने को फाँसी उसी दम उसी क्षण।

मगर मंत्री था इतना दुबला दिखाता,
न गर्दन में फाँसी का फंदा था आता।

कहा राजा ने जिसकी मोटी हो गर्दन,
पकड़कर उसे फाँसी दो तुम इसी क्षण।

चले संतरी ढूँढ़ने मोटी गर्दन,
मिला चेला खाता था हलुआ दनादन।

कहा संतरी ने चलें आप फ़ौरन,
महाराज ने भेजा न्यौता इसी क्षण।

बहुत मन में ख़ुश हो चला आज चेला,
कहा आज न्यौता छकूँगा अकेला!!

मगर आके पहुँचा तो देखा झमेला,
वहाँ तो जुड़ा था अजब एक मेला।

यह मोटी है गर्दन, इसे तुम बढ़ाओ,
कहा राजा ने इसको फाँसी चढ़ाओ!

कहा चेले ने-कुछ ख़ता तो बताओ,
कहा राजा ने-‘चुप’ न बकबक मचाओ।

मगर था न बुद्ध-था चालाक चेला,
मचाया बड़ा ही वहीं पर झमेला!!

कहा पहले गुरु जी के दर्शन कराओ,
मुझे बाद में चाहे फाँसी चढ़ाओ।

गुरुजी बुलाए गए झट वहाँ पर,
कि रोता था चेला खड़ा था जहाँ पर।

गुरु जी ने चेले को आकर बुलाया,
तुरत कान में मंत्र कुछ गुनगुनाया।

झगड़ने लगे फिर गुरु और चेला,
मचा उनमें धक्का रेल-पेला।

गुरु ने कहा-फाँसी पर मैं चढ़ूँगा,
कहा चेले ने-फाँसी पर मैं मरूँगा।

हटाए न हटते अड़े ऐसे दोनों,
छुटाए न छुटते लड़े ऐसे दोनों।

बढ़े राजा फ़ौरन कहा बात क्या है?
गुरु ने बताया करामात क्या है।

चढ़ेगा जो फाँसी महूरत है ऐसी,
न ऐसी महूरत बनी बढ़िया जैसी।

वह राजा नहीं, चक्रवर्ती बनेगा,
यह संसार का छत्र उस पर तनेगा।

कहा राजा ने बात सच गर यही
गुरु का कथन, झूठ होता नहीं है

कहा राजा ने फाँसी पर मैं चढ़ूँगा
इसी दम फाँसी पर मैं ही टँगूँगा।

चढ़ा फाँसी राजा बजा ख़ूब बाजा
प्रजा ख़ुश हुई जब मरा मूर्ख़ राजा

बजा ख़ूब घर-घर बधाई का बाजा।
थी अँधेर नगरी, था अनबूझ राजा

- सोहनलाल द्विवेदी

मेरे गुरुदेव

‘यह लोक ही मेरा कुटुम्ब है;
तृण-पल्लव कीट-पतंग ही मेरे परिजन हैं;

त्याग ही सम्पत्ति है; विनय ही उन्नति है-’
ऐसा मानने वाले योग के ज्ञाता मेरे गुरुदेव की जय हो!

तारक-रत्न-माल्य पहनाया जाए तो भी ठीक, और
काले मेघों से ढक दिया जाए तो भी ठीक!

वे हैं सर्वथा निःसंग, निर्लिप्त! सम स्वच्छ
आकाश जैसे हैं मेरे गुरुदेव!

मेरे गुरुदेव ऐसे दुर्लभ तीर्थ-हृदय हैं जो दुर्जन्तु-रहित हैं,
वे ऐसे हैं जिनसे कालिमा नहीं फैलती,

वे ऐसे माणिक्य महानिधि हैं
जिन पर सर्पों की छाया भी कभी नहीं पड़ी

मेरे गुरुदेव ऐसी चाँदनी हैं
जिसने कभी छाया नहीं डाली

बिना शस्त्र के धर्म-युद्ध करने वाले
बिना पुस्तक के पुण्याध्ययन करने वाले

बिना औषधि के रोग नष्ट करने वाले
बिना हिंसा-दोष के यज्ञ करने वाले हैं मेरे गुरुदेव!

शाश्वत अहिंसा है उन महात्मा का व्रत
शांति प्रारंभ से ही उनकी इष्ट देवी है

वे कहा करते हैं, ‘अहिंसा-रूपी कवच किस
तलवार की धार नहीं मोड़ देता?’

अहिंसा-रूपी पत्नी से मिले धर्म का सरस संलाप,
आर्य-सत्य की सभा का संगीत एवं

मुक्ति के रत्न-मंजरी की झनकार हैं
मेरे गरुवर्य के शोभन वचन!

प्रेम से लोक को जीतने वाले इस योद्धा के लिए
प्राण ही मनुष्य है, आत्मा ही बाण, और ब्रह्म ही लक्ष्य!

ओंकार को भी धीरे-धीरे पिघलाकर वे
उसका एक सूक्ष्मतम अंश ही अपने लिए लेते हैं

भगवान् ईसा का त्याग, साक्षात्
श्रीकृष्ण का धर्म-रक्षा-उपाय

बुद्धदेव की अहिंसा, शंकराचार्य की प्रतिभा
रन्तिदेव की करुणा, हरिश्चन्द्र का सत्य

मुहम्मद की स्थिरता सब एक साथ
एक व्यक्ति में देखना हो तो

आइए मेरे गुरु के पास
उनके चरणों का दर्शन कर लेने पर

एक बार कायर भी धीर बन जाता है; क्रूर भी कृपालु
कृपण भी दानवीर, परुषवादी भी प्रियवादी

अशुद्ध भी परिशुद्ध और आलसी भी परिश्रमी बन जाता है
चारों ओर शांति फैलाने वाले उस तपस्वी के सामने

आततायी की कटार नीलोत्पल-माला है
द्रष्टा-कराल केसरी, मृग-शावक और

भयंकर लहरें उठाने वाला सागर क्रीड़ा-पुष्करिणी है!
गंभीर कार्य-चिंतन के समय उस नेता के लिए

कानन-प्रदेश भी कांचन-सभा-मंडप है
निश्चल समाधि में स्थित होने पर उस योगी के लिए

नगर-मध्यस्थल भी पर्वत-गुहांतर है
उस धर्म-कर्षक का सत्कर्म, खेत-खेत में

शुद्ध स्वर्ण ही पैदा करता है
और उस सिद्ध की आँखें स्वर्ण को भी

इस भूमि की पीली मिट्टी-जैसा ही देखती हैं।
उस महा-विरक्त के लिए संपूज्य साम्राज्यश्री भी

चामर-चलन से दाँत दिखाने वाली पिशाचिनी है
किसी मृदुतम, कुसुम-कोमल चरण को भी पीड़ा न हो

इसलिए जो महात्मा स्वातंत्र्य के दुर्गम मार्ग पर रेशमी
पांवड़े बिछा रहे हैं

वह महानुभाव स्वयं वल्कल का टुकड़ा
पहनकर सदा अर्धनग्न रहते हैं!

गीता-जननी भारत-भूमि ही
ऐसे किसी कर्मयोगी को जन्म दे सकती है

हिमवत्-विंध्याचल, मध्य प्रदेश में ही
शम की साधना करने वाला ऐसा सिंह दिखाई देगा

गंगा नदी जिस प्रदेश में प्रवाहित होती है उसी में
मंगल-फल देने ऐसा कल्प-वृक्ष उग सकता है

नमस्ते गतवर्ष! नमस्ते दुराधर्ष।
नमस्ते सुमहात्मन्! नमस्ते जगद्गुरो!

- वल्लत्तोल

नए शिक्षक

मेरे पास
या तो चुप्पी बची है

या चीख़
लेकिन

उन्हें न तो चुप्पी समझ आती है
न चीख़

संवाद में
उसे सिर्फ़ वाद समझ आता है

प्रतिवाद नहीं
दुर्भाग्य से ये नए शिक्षक हैं

जो हमें नई सहमति की भाषा सिखा रहे हैं
जिसका संबंध सीधा रीढ़ से होता है।

– परमेंद्र सिंह

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