मानव श्वसन तंत्र क्या होता है?

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मानव श्वसन तंत्र

प्रत्येक जीव को जीवित रहने के लिए ऑक्सीजन की आवश्यकता होती है। यही ऑक्सीजन कोशिकाओं तक पहुँच कर भोज्य पदार्थों का ऑक्सीकरण कर ऊर्जा पैदा करती है। ऑक्सीजन हम साँस के साथ अन्दर लेते हैं तथा कार्बन डाइऑक्साइड को बाहर निकालते हें। ऑक्सीजन द्वारा भोज्य पदार्थों के ऑक्सीकरण के फलस्वरूप जल व CO2 का निर्माण होता है तथा ऊर्जा मुक्त होती है यही श्वसन कहलाता है। चलिए जानते हैं Respiratory System in Hindi के बारे में।

श्वसन क्या है?

Respiratory System in Hindi
Source – Knowledgekahub

श्वसन शब्द अंग्रेजी भाषा ‘Respiration’ का ही हिन्दी रूपान्तर है जो लैटिन भाषा के शब्द ‘respirate’ से बना है। respirate का अर्थ है ‘सांस लेना’। श्वसन (respiration) की क्रिया पौधों तथा जन्तुओं में अलग-अलग प्रकार से होती है। श्वसन के अन्तर्गत क्रमश: निःश्वसन (inspiration) तथा उच्छवसन (expiration) दो क्रियाएं आती हैं। श्वसन क्रिया में जो अंग भाग लेते हैं उन अंगों को श्वसन अंग तथा इस तन्त्र को श्वसन तन्त्र (respiratory system) कहते हैं।

ऊर्जा (ATP) = भोजन + O2

अंत:श्वसन व बहि श्वसन में अंतर

मानव श्वसन तंत्र में अंतर नीचे दिया गया है-

अंत:श्वसन बहि श्वसन
अंत:श्वसन में अन्तरापर्शुक पेशियाँ एवं डायाफ्राम में संकुचन होता है। बहिश्वसन में अन्तरापर्शुक पेशियाँ एवं डायाफ्राम में शिथिलन होता है
वक्ष गुहा बाहर की तरफ गति करती है। वक्ष गुहा अंदर की तरफ गति करती है।
वक्ष गुहा का आयतन बढ़ता है। वक्ष गुहा का आयतन घटता है।
वक्ष गुहा का दाब घटता है। वक्ष गुहा का दाब बढ़ता है।
सांद्रता घटती है। सांद्रता बढ़ती है।
विसरण के कारण गैस बाहर से शरीर के अंदर प्रवेश करती है। विसरण के कारण गैसे अंदर से शरीर के बाहर उत्सर्जित होती है।
इस प्रक्रिया में डायाफ्राम चपटा हो जाता है। इस प्रक्रिया में डायाफ्राम सीधी हो जाता है।
अन्त:श्वसन में 2 सेकंड का समय लगता है। बहि श्वसन में 3 सेकंड का समय लगता है।

जन्तुओं में श्वसन

Respiratory System in Hindi
Source – Aliscience

जन्तुओं में श्वसन ऑक्सीजन को लेने एवं इसका प्रयोग करने तथा कार्बन डाइ ऑक्साइड के निष्कासन की प्रक्रिया है। यह एक ऐसी प्रक्रिया है जिसके द्वारा मनुष्य वातावरण से ऑक्सीजन को लेते हैं तथा कोशिकाओं में कुछ रासायनिक परिवर्तनों के परिणाम स्वरुप उत्पन्न हुई कार्बन डाइऑक्साइड को बाहर निकालते हैं। एक स्वस्थ वयस्क व्यक्ति प्रति मिनट 250ml ऑक्सीजनग्रहण करता है तथा 200एमएल कार्बन डाइऑक्साइड छोड़ता है। 

श्वसन तन्त्र

इस क्रिया में जो अंग भाग लेते हैं उन अंगों को श्वसन अंग तथा इस तन्त्र को श्वसन तन्त्र कहते हैं। यह क्रिया जीवनपर्यन्त चलती है इसके रुकने के परिणाम स्वरुप मनुष्य की मृत्यु हो जाती है। श्वसन क्रिया वास्तविक रूप से दोहरी क्रिया होती है।

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श्वसन तन्त्र के अंग 

Respiratory System in Hindi
Source – vigyanam

मानव श्वसन तंत्र के अन्तर्गत निम्नलिखित अंगों का समावेश होता है

1)नाक/ नासिका

नाक पहला एवं सबसे महत्त्वपूर्ण श्वसन अंग है। इसमें एक बड़ी गुहा होती है जिसे नासिका गुहा कहा जाता है जो दो भागों में एक पट द्वारा विभाजित रहती है।

  • नासिका गुहा के आगे (बाहर की ओर) तथा पीछे दो-दो छिद्र या रन्ध्र होते हैं। 
  • आगे के या वाह्य छिद्रों को नथुने अथवा अग्रज नासा रन्ध्र कहा जाता है जो बाहर से अन्दर की ओर हवा ले जाते हैं तथा पीछे की ओर जो छिद्र होते हैं, उन्हें पश्वाज नासा रन्ध्र कहा जाता है जो नासिका गुहा से पीछे ग्रसनी में खुलते हैं।
  • नासिका गुहा का ढांचा अस्थियों एवं उपास्थियों से बना होता है। ह्म नासिका गुहा का ऊपरी भाग इथर्मयाद अस्थि की छिद्रित प्लेट जतुकाभ (स्फेनॉयड अस्थि) ललाटीय या फ्रन्टल अस्थि तथा नासिका अस्थियों से बनी होती है। नाक के दो भाग होते हैं।

बाहरी कवच

यह अस्थियों तथा cartilage का बना हुआ तिकोना frame होता है । त्वचा इसको ऊपर से ढंके हुए होती है। नाक के अन्दर की तरफ दो नथुने हौते हैं । 

आन्तरिक गुहिकाएँ

ये दोनों गुहिकाएँ दो भागों में बँटी होती हैं । प्रत्येक गुहिका में छोटे-छोटे बहुत से बाल होते हैं जिन्हें हम Coarse Hair कहते हैं।  ये बाल श्वास द्वारा हम जो oxygen लेते हैं उसको छानकर आगे भेजते हैं जिससे धूल के कण अन्दर नहीं जा पाते हैं। 

2) ग्रसनी (Pharynx)

Respiratory System in Hindi में वायु के लिए नासा गुहाओं के पीछे स्वरयन्त्र (larynx) तक तथा भोजन के लिए मुख से ग्रासनली तक का पेशी कलामय मार्ग ग्रसनी (Pharynx) कहलाता है। ग्रसनी का ऊपरी भाग स्फीनाइड अस्थि के मुख्य भाग द्वारा बनता है तथा नीचे का भाग esophagus के साथ मिला रहता है। यह कपाल के आधार के समीप तथा नासिका गुहा, मुख-गुहा एवं स्वरयन्त्र के पीछे स्थित 12 से 14 सेमी लम्बी एक पेशीयनली होती है जिसका ऊपरी सिरा चौड़ा होता है। 

ग्रसनी के निम्नलिखित तीन भाग होते हैं:

नासाग्रसनी (Nasopharynx)

यह ग्रसनी का वह भाग है जो तालु की रेखा के ऊपर नासिका के पीछे स्थित रहता है। इसकी पिछली दीवार पर लिम्फाइड ऊतक होते हैं। जिन्हें फैरिंजियल टॉन्सिल्स या एडिनॉइड्रस कहा जाता है। कभी-कभी यह ऊतक बढ़कर ग्रसनी में रूकावट पैदा कर देते हैं जिससे बच्चे मुंह से साँस लेने लगते हैं। श्रवण नलियों नासाग्रसनी की पार्श्विय दीवारों में खुलती हैं और इनमें से वायु मध्य कान तक पहुँचती है जो नाक के आन्तरिक के साथ मिली रहती है। 

मुखग्रसनी (Oropharynx)

यह ग्रसनी का मुँह वाला भाग होता है जो कोमल तालु के स्तर के नीचे से आरम्भ होकर तीसरी ग्रीवा कशेरूका के कार्य के ऊपरी भाग के स्तर तक पहुंचता हैं। ग्रसनी की भित्तियां कोमल तालु में विलीन होकर प्रत्येक ओर दो भाग बना लेती हैं। मुखग्रसनी की पार्श्वीय कोमल तालु के साथ मिली रहती है। इन भित्तियों के बीच लसीक ऊतक के उभार रहते हैं जिन्हें पैलेटो-ग्लॉसल आर्चज कहते हैं। इन्हें पैलेटाइन टॉन्सिल कहा जाता है । 

स्वरयन्त्रज ग्रसनी (Laryngio Pharynx) 

यह ग्रसनी की स्वरयन्त्र के पीछे वाला भाग होता है जो हाइड अस्थि के स्तर से स्वरयन्त्र के पीछे तक रहता है । ग्रसनी के इसी भाग से श्वासनीय एवं पाचन संस्थान अलग-अलग हो जाता है। आगे की ओर से वायु स्वरयन्त्र में जाती है तथा भोजन पीछे की ओर से इसोफेगस में जाता है ।

3) स्वरयन्त्र (Larynx)

स्वरयन्त्र ग्रसनी के निचले भाग एवं श्वास-नली के बीच एक पेशी उपस्थिमय वायु मार्ग होता है। जिसमें स्वर रज्जु होते हैं यह स्वरयन्त्र ग्रसनी को श्वास-नली से जोड़ता है। यह जिह्वा (जीभ) के नीचे से श्वास-नली तक फैला होता है। वयस्क पुरूष में यह तीसरे, चौथे, पाँचवे एवं छठे सरवाइकल वटीबरा के सामने तथा बच्चों तथा वयस्क स्त्रियों में यह इससे ऊँचे स्थान पर स्थित होता है। यौवन का प्रारम्भ होने पर पुरूषों में स्त्रियों की अपेक्षा स्वरयन्त्र अधिक तेजी से बढ़ता है।

4) श्वास-नली/श्वासप्रणाल (Trachea)

इसे सांस की नली भी कहते हैं। यह एक बेलनाकार नली होती है। इसकी लम्बाई 10 सेमी होती है तथा इसका व्यास 2 से 2.5 सेमी होता है। इसका विस्तार लैरिंग्स से पंचम वक्ष कशेरूका तक होता है, जहाँ यह दो श्वसनियों में विभाजित हो जाता है। इसमें 16-20 उपास्थि के अपूर्ण रिंग होते हैं। ये रिंग वलय पीछे की ओर अधूरे होते हैं जहाँ तन्तु ऊतक द्वारा रिंग के दोनों छोर जुड़े होते हैं। इस स्थिति में थोड़ा पेशी ऊतक भी होता है।

5) वायु नलियाँ (Bronchi Tubes)

दोनों वायु नलियों श्वास-नली से थोड़ा अलग होती है।  दांई ओर की वायु नली बांई ओर की वायु नली की अपेक्षा थोड़ी छोटी, चौड़ी और सीधी होती है। ये दाएँ और बाएँ फेफड़े तक पहुँचती हैं। उसके बाद बहुत सी छोटी-छोटी शाखाओं में बंट जाती हैं जिन्हें हम ब्रोन्कियल ट्यूबऔर ब्रोन्कियस कहते हैं।  

6) डायाफ्राम (Diaphragm)

डायाफ्राम आन्तरिक धारीदार माँसपेशियों की एक चादर होती है जो कि पसलियों की तली तक फैली हुई होती है। डायफ्राम वक्षीय गुहा (Thoracic Cavity) अर्थात् हृदय, फेफड़ों तथा पसलियों को उदरीय या खोड़ से अलग करता है तथा श्वसन में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता है। जब यह संकुचित होता है तो वक्षीय खोड़ का आयतन बढ़ जाता है तथा फेफड़ों में वायु खींची जाती है।

7) फेफड़े (Lungs)

मानव शरीर में दो फेफड़े होते हैं। श्वास-प्रक्रिया में इन अंगों का महत्त्वपूर्ण योगदान होता है। यह प्राणियों में एक जोड़े के रूप में उपस्थित होता है फेफड़े की दीवार असंख्य गुहिकाओं की उपस्थिति के कारण स्पन्जी होती है। यह वक्ष गुहा में स्थित होता है तथा इसमें रक्त का शुद्धीकरण होता है। रक्त में ऑक्सीजन का मिश्रण होता है और फेफड़ों का मुख्य कार्य वातावरण से ऑक्सीजन लेकर उसे रक्त परिसंचरण में प्रवाहित करना और रक्त से कार्बन डाई ऑक्साइड को अवशोषित कर उसे वातावरण में छोड़ना है। गैसों का यह विनियम असंख्य छोटी-छोटी पतली दीवारों वाली वायु पुटिकाओं जिन्हें ‘अल्वियोली ‘ कहा जाता है, में होता है। यह शुद्ध रक्त पल्मोनरी धमनी द्वारा ह्रदय में पहुँचता है, जहाँ से यह फिर से विभिन्न अवयवों में पहुँचाया जाता है।

श्वसन तन्त्र का कार्य

मानव श्वसन तंत्र में श्वसन तन्त्र के कार्य नीचे दिए गए हैं-

Respiratory System in Hindi
Source – Indipedagogue

श्वसन तन्त्र का महत्त्वपूर्ण कार्य शरीर की कोशिकाओं को निरन्तर रूप से ऑक्सीजन की आपूर्ति करना है। शरीर के सभी भागों में गैसों का आदान-प्रदान इस तन्त्र का मुख्य कार्य है। बिना ऑक्सीजन के मनुष्य जीवित नहीं रह सकता है क्योंकि यदि 4 मिनट से ज्यादा समय के लिए किसी मनुष्य में ऑक्सीजनकी पूर्ति रोक दी जाए तो प्राय: मनुष्य की मृत्यु हो जाएगी। अत: जीवित रहने हेतु ऑक्सीजन की निरन्तर आपूर्ति होना अत्यन्त आवश्यक है। 

श्वसन तंत्र का दूसरा महत्त्वपूर्ण कार्य शरीर से कार्बन डाइऑक्साइड जलवाष्पों व अन्य व्यय पदार्थों को बाहर निकालना है। ये दोनों कार्य आन्तरिक तथा बाहरी श्वसन के माध्यम से किए जाते हैं। 

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श्वसन की प्रक्रिया

मानव श्वसन तंत्र में श्वसन की प्रक्रिया की कुछ इस प्रकार है:

Respiratory System in Hindi
Source – Classnotes

यह श्वसन की प्रक्रिया एक ऐसी प्रक्रिया है जिसके माध्यम से फेफड़े ऑक्सीजन लेने हेतु फैलते हैं और उसके बाद वायु को बाहर की ओर निकालने हेतु सिकुड़ते हैं।  श्वसन की इस पूरी प्रक्रिया में सिर, गर्दन, वक्ष, उदर आदि की सभी माँसपेशियाँ शामिल होती हैं। हालाँकि सामान्य श्वास में श्वसन की प्रमुख माँसपेशियों, पसलियों की माँसपेशियाँ व डायाफ्राम ही होते हैं। श्वसन की प्रक्रिया में श्वसन या श्वास लेना व श्वसन छोड़ना या नि:श्वसन शामिल होते हैं । जिनका वर्णन निम्नलिखित हैं

श्वास लेना

जब हम श्वास लेते हैं तो पसलियों के मध्य की मासँपेशियाँ छाती की गुहिका (Cavity) को फैलाने हेतु सक्रिय रूप से संकुचन करती हैं। पसलियाँ व उरोस्थि (Sternum) ऊपर तथा बाहर की ओर गति करती हैं । डायाफ्राम भी संकुचित होता है तथा नीचे की ओर गति करता है एवं छाती की गहराई बढ़ती है। वक्ष की क्षमता भी बढ़ जाती है और फेफड़ों के मध्य दबाव कम हो जाता है। फेफड़े छाती की गुहिका को भरने हेतु फैलते हैं। वायुमण्डल के दबाव की अपेक्षा वायु कोशिकाओं में अब दबाव कम हो जाता है। अत: वायुमण्डल से वायु, वायु कोशिकाओं में खींच ली जाती है । 

निःश्वसन या श्वास छोड़ना

जब हम निःश्वसन करते हैं अर्थात श्वास छोड़ते हैं तो पसलियों की माँसपेशियाँ शिथिल (Relax) हो जाती हैं। पसलियाँ व उरोस्थि (Sternum) नीचे तथा अन्दर की ओर जाती हैं। डायाफ्राम ऊपर की ओर आता है । छाती की गहराई कम हो जाती है। वक्ष की क्षमता कम हो जाती है और दबाव बढ़ता है जो फेफड़ों की वायु को बाहर निकालने हेतु जोर लगाता है।

श्वसन तंत्र काम कैसे करता है?

Respiratory System in Hindi
Source – Wikipedia

Respiratory System in Hindi में श्वसन तंत्र के मुख्य रूप से दो चरण होते हैं पहला जिसमें हम सांस लेते हैं और दूसरा जब हम सांस छोड़ते हैं जब हम सांस लेते हैं तब हमारी सांस में सिर्फ ऑक्सीजन ही नहीं आता बल्कि ऑक्सीजन, कार्बन डाइऑक्साइड और नाइट्रोजन जैसी अन्य गैसे भी आती हैं। परंतु हमारा शरीर सिर्फ और सिर्फ ऑक्सीजन गैस का उपयोग करता है और बाकी सारी गैसों को बाहर निकाल देता है।

जैसे ही हम सांस लेते हैं तो हमारा डायाफ्राम (Diaphragm) नीचे की तरफ चला जाता है जिससे हमारे फेफड़ों को फैलने के लिए जगह मिल जाती है जैसे ही फेफड़े फैलते हैं तब हवा साइनस (Sinuses) से होती हुई ग्रसनी तक जाती है। साइनस हमारे सर में हड्डियों के बीच में एक क्षेत्र होता है जब हम सांस लेते हैं तब साइनस हवा के तापमान को संतुलन में रखता है और हवा में उपस्थित धूल के कणों को हमारे शरीर के अंदर जाने से रोकता है।

इसके बाद हवा विंड पाइप से होती हुई हमारे फेफड़ों तक पहुंचती है हर इंसान के दो फेफड़े होते हैं फेफड़े बाहरी हवा में से ऑक्सीजन सोखकर हमारे शरीर के रक्त में मिला देते हैं रक्त द्वारा यह ऑक्सीजन ऊतको तक पहुंचता और ऊतको द्वारा यह ऑक्सीजन कोशिकाओं तक पहुंचता है इसके बाद कोशिकाएं ऑक्सीजन का इस्तेमाल ऊर्जा बनाने के लिए करती हैं।

सांस छोड़ने से पहले शरीर में ऑक्सीजन कार्बन डाइऑक्साइड का आदान-प्रदान होता है जब कोई व्यक्ति सांस छोड़ता है तो डायाफ्राम (Diaphragm) सिकुड़ता है और फेफड़ों पर दबाव पड़ता है जिससे हवा बाहर निकल जाती है।

पौधों में श्वसन

पौधों में श्वसन, कार्बन डाइऑक्साइड को लेने तथा इसका प्रयोग करने व ऑक्सीजन निष्कासन की प्रक्रिया है। पादपों में सांस हेतु ऑक्सीजन की आवश्यकता होती है और तत्पश्चात वे कार्बन डाई ऑक्साइड को मुक्त करते हैं। इस कारण से पादपों में ऐसी व्यवस्था होती है, जिससे ऑक्सीजन की उपलब्धता सुनिश्चित होती है।

पौधे कैसे श्वसन करते हैं?

पौधे बिना श्वसन तंत्र के कैसे श्वसन करते हैं इसके कई कारण हो सकते हैं। 

  1. पादपों का प्रत्येक भाग अपनी गैसीय आदान-प्रदान की आवश्यकता का ध्यान रखता है। पादपों के एक भाग से दूसरे भाग में गैसों का परिवहन बहुत कम होता है ।

2) पादपों में गैंसों के आदान-प्रदान की बहुत अधिक मांग नहीं होती। मूल’ तना व पत्ती में श्वसन, जन्तुओं की अपेक्षा बहुत ही धीमी दर से होता है। केवल प्रकाश संश्लेषण के दौरान गैसों का अत्यधिक आदान-प्रदान होता है तथा प्रत्येक पत्ती, पूर्णतयः इस प्रकार अनुकूलित होती है कि इस अवधि के दौरान अपनी आवश्यकता का ध्यान रखती है । जब कोशिका श्वसन करती है। oxygen की उपलब्धता की कोई समस्या नहीं होती है, क्योंकि कोशिका में प्रकाश-संश्लेषण के दौरान oxygen निकलती है।

3) बड़े स्थूल पादपों में गैसें अधिक दूरी तक विसरित नहीं होती है। पादपों में प्रत्येक सजीव कोशिका पादपों की सतह के बिल्कुल पास स्थित होती है।

श्वसन तंत्र को मजबूत कैसे बनाएं?

Respiratory System in Hindi
Source – Hindi Website for quotes

आजकल के समय में पोलूशन, बीमारियां और अस्वस्थ भोजन के कारण श्वसन तंत्र संबंधी विकार होना एक आम बात हो गई है आजकल के समय में ज्यादातर लोगों को श्वसन तंत्र संबंधी विकार होते हैं जैसे अस्थमा, फेफड़ों का कैंसर और निमोनिया आदि इन सभी बीमारियों से बचने के लिए हमें अपने श्वसन तंत्र को मजबूत रखना चाहिए श्वसन तंत्र को मजबूत करने के लिए हम निम्नलिखित उपाय कर सकते हैं।

  • अच्छा और स्वस्थ भोजन खाएं:- क्योंकि ज्यादातर बीमारियां खराब भोजन की वजह से ही होती हैं इसलिए हमें अच्छा संतुलित और स्वस्थ भोजन खाना चाहिए जो हमारे शरीर को ताकत दें और हमारे दिमागी और शारीरिक विकास में सहायक बने।
  • शरीर का वजन बढ़ने ना दे:- आजकल की बढ़ती गलत खानपान के कारण मोटापा बहुत अधिक बढ़ गया है बहुत सारे लोग आजकल मोटापे से ग्रस्त हैं मोटापा अपने आप में ही एक भयंकर बीमारी है और यह हजारों बीमारियों को जन्म दे सकता है इसलिए मोटापे से बचें और अपने वजन को नियंत्रण में रखें।
  • धूम्रपान ना करें:- धूम्रपान करना हमारे सेहत के लिए काफी हानिकारक होता है धूम्रपान करने से बचें और ऐसे लोगों से भी दूर रहें जो धूम्रपान करते हैं।
  • पोलूशन से बचने का प्रयास करें:- हम 24 घंटे पोलूशन से नहीं बच सकते हैं फिर भी जितना हो सके हमें उतना पोलूशन से बचना चाहिए क्योंकि पोलूशन के कारण आजकल स्वास्थ संबंधी समस्याएं बहुत ज्यादा बढ़ गई हैं।
  • इंफेक्शन से ग्रस्त व्यक्ति से बचें:– ऐसे लोगों से बचे जिन्हें वायरल या कोई इंफेक्शन हो।
  • नियमित रूप से एक्सरसाइज करें:- नियमित रूप से योगा और एक्सरसाइज करें इससे आपका शरीर फिट रहेगा और जब आपका शरीर फिट रहेगा तो आपको किसी भी प्रकार की कोई समस्या नहीं होगी।

श्वसन तंत्र संबंधी विकार क्या हैं?

Respiratory System in Hindi
Source -Yashoda Hospital

हमारे श्वसन तंत्र में काफी सारे अंगो का उपयोग होता है अलग-अलग अंग का अलग-अलग कार्य है श्वसन तंत्र में छोटे-छोटे अंगों से लेकर बड़े-बड़े अंगों तक का उपयोग है इसलिए इसमें कई प्रकार की श्वसन तंत्र से जुड़ी बीमारियां हो सकती हैं।

  • अस्थमा : अस्थमा एक ऐसी बीमारी है जो आजकल काफी सामान्य है और ज्यादातर लोगों को होती है क्योंकि पोलूशन बहुत अधिक है।
  • इंफेक्शन आमतौर पर लोगों को इंफेक्शन काफी जल्दी हो जाता है और बहुत सारे लोगों को श्वसन तंत्र से जुड़ा इंफेक्शन बहुत जल्दी होता है।
  • कोई बीमारी के कारण भी कई बार श्वसन तंत्र से जुड़ी समस्याएं हो सकती हैं।
  • बढ़ती हुई उम्र एक उम्र के बाद श्वसन तंत्र में समस्याएं आने लगती हैं और यह सामान्य होता है।
  • चोट लगना अगर किसी व्यक्ति को किसी प्रकार की कोई चोट लग जाती है तो उससे भी श्वसन तंत्र में समस्या आ सकती है। रेस्पिरेट्री सिस्टम से जुड़ी बीमारियों की सूची।
  • दमा (Asthma)
  • क्रॉनिक ऑब्सट्रक्टिव पल्मोनरी डिजीज (COPD) (Chronic Obstructive Pulmonary Disease (COPD))
  • फेफड़ों का कैंसर (Lung Cancer)
  • सिस्टिक फाइब्रोसिस / ब्रोन्किइक्टेसिस (Cystic Fibrosis/Bronchiectasis)
  • न्यूमोनिया (Pneumonia)
  • फुफ्फुस बहाव (Pleural Effusion)
  • क्रोनिक ब्रोंकाइटिस (Chronic Bronchitis)
  • वातस्फीति (Emphysema)
Source: Bodhaguru

श्वसन पथ

किण्वन

  • किणवन की खोज क्रइकशैन्क ने की थी। किण्वन शब्द का प्रयोग उन क्रियाओं के लिए किया जाता है-
  • जिनमें विभिन्न जीवाणुओं व कवकों के ऑक्सी व अनॉक्सी श्वसन द्वारा ग्लूकोज का अपूर्ण विघटन होकर
  • CO2 व एथिल अल्कोहल का निर्माण व साथ-साथ में दूसरे कार्बनिक अम्ल जैसे- एसिटिक अम्ल, ऑक्जेलिक

अम्ल इत्यादि बनते हैं, किण्वन क्रिया में बनने वाले उत्पाद को निम्न प्रकारों में बांटा गया है।

1.एल्कोहलीय किण्वन, 2. लैक्टिक अम्ल किण्वन, 3. एसिटिक अम्ल किण्वन, 4. ब्यूटाइरिक अम्ल किण्वन।

क्रेब्स चक्र

इसका वर्णन हेंस क्रेब ने सन् 1937 ई. में किया। इसको साइट्रिक अम्ल चक्र या ट्राई कार्बोक्सिलिक चक्र भी कहा जाता है।

  • यह माइटोकॉन्ड्रिया के अन्दर विशेष एंजाइम की उपस्थिति में ही सम्पन्न होता है।
  • क्रैब्स चक्र श्वसन की द्वितीय व अंतिम अभिक्रिया है।
  • इसमें पाइरूविक अम्ल से विभिन्न कार्बनिक अम्ल का निर्माण होता है।
  • इस क्रिया को अनेक एंजाइम नियंत्रित करते हैं।
  • इस प्रक्रम में 36 ATP अणु बनते हैं। इस प्रकार श्वसन में कुल 38 ATP अणुओं का निर्माण होता है।

ग्लाइकोलिसिस

  • इसका अध्ययन सर्वप्रथम एंबडेन मेयर हॉफ, पारसन ने किया था। इसलिए इसे EMP पथ भी कहते हैं।
  • इसको अनॉक्सी श्वसन या शर्करा किण्वन भी कहा जाता है। इसमें ऑक्सीजन की अनुपस्थिति में ऊर्जा मुक्त होती है।
  • विभिन्न सजीव ऊतकों में क्रमबद्ध विघटनकारी
  • अभिक्रियाओं द्वारा हेक्जोसेस (प्रायः ग्लूकोज) के पाइरूविक अम्ल में परिवर्तन को ग्लाइकोलिसिस (Glycolysis) कहते हैं।

श्वास-गति

एक स्वस्थ मनुष्य आमतौर पर एक मिनट में 16 से 20 बार तक सांस लेता है। अलग-अलग आयु में सांस संख्या निम्नानुसार होती है-

आयु संख्या प्रति मिनट
दो महीने से दो साल तक 35 प्रति मिनट
दो साल से छ: साल तक 23 प्रति मिनट
छ: साल से बारह साल तक 20 प्रति मिनट
बारह साल से पंद्रह साल तक 18 प्रति मिनट
पन्द्रह साल से इक्कीस साल तक 16 से 18 प्रति मिनट

आशा है कि इस ब्लॉग से आपको Respiratory System in Hindi के बारे में सम्पूर्ण जानकारी मिल गई होगी। यदि आप विदेश में पढ़ाई करना चाहते हैं तो आज ही 1800 572 000 पर कॉल करके हमारे Leverage Edu के विशेषज्ञों के साथ 30 मिनट का फ्री सेशन बुक करें।

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