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उत्तर: अष्टछाप की स्थापना 1565 ई. में गोस्वामी विट्ठलनाथ (वल्लभाचार्य के पुत्र) ने की थी। यह आठ कवियों का ऐसा समूह था जो पुष्टिमार्गीय संप्रदाय से जुड़ा था और जिनका काव्य कृष्ण भक्ति पर आधारित था।
अष्टछाप के आठ कवि इस प्रकार हैं:
- सूरदास
- परमानंददास
- कुम्भनदास
- कृष्णदास
- नन्ददास
- गोविन्दस्वामी
- छीतस्वामी
- चतुर्भुजदास
इनमें से प्रथम चार कवि वल्लभाचार्य के शिष्य तथा अंतिम चार विट्ठलनाथ के शिष्य थे।
इस समूह का उद्देश्य श्रीनाथजी (कृष्ण) के अष्ट शृंगार के लिए पदों की रचना करना था। इन कवियों में सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण सूरदास माने जाते हैं, जिनकी रचना ‘सूरसागर’ में कृष्ण की बाल-लीला, सखा-भाव और रासलीला का अत्यंत भावपूर्ण चित्रण है। वल्लभाचार्य ने स्वयं सूरदास को “पुष्टिमार्ग का जहाज” कहा था।
अन्य प्रश्न
- उपर्युक्त पद में गोपियों की कौन-सी विशेषता प्रकट हो रही है?
- पहले के भले लोगों का कैसा स्वभाव होता था?
- सूरदास जी ने उद्धव एवं कमल-पत्र में क्या समानता बताई है?
- गोपियों ने अपनी तुलना किससे की है और क्यों?
- ‘प्रीति-नदी में पाउँ न बोर्यो’ के माध्यम से गोपियाँ उद्धव से क्या कहना चाहती हैं?
- कृष्ण द्वारा भेजा गया योग-संदेश सुन गोपियाँ हताश और कातर क्यों हो उठीं?
- गोपियाँ अब धैर्य क्यों नहीं रख पा रही हैं?
- सु तौ ब्याधि हमकों लै आए यहाँ गोपियों ने ‘व्याधि’ किसे माना है और क्यों?
- “ते क्यों अनीति करें आपुन, जे और अनीति छुड़ाए” – गोपियों ने इससे किस पर व्यंग्य किया है?
- “राजधरम तौ यहै” इस कथन के माध्यम से सूरदास ने किस जीवन-सत्य का बोध कराया है?
- “ऊधो, तुम हौ अति बड़भागी” – इसमें किन लोगों पर व्यंग्य है? सूरदास ने इसके माध्यम से क्या सन्देश दिया है?

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