Ped Par Kavita: पेड़-पौधों का मानव जीवन एवं जीव-जंतु में बड़ा महत्व है। ये हमें न सिर्फ स्वच्छ ऑक्सीजन देते हैं बल्कि पर्यावरण के संरक्षण में भी महत्वपूर्ण भूमिका अदा करते हैं। पेड़-पौधों के बिना मानव जीवन की कल्पना करना भी असंभव है। वहीं हमारे दैनिक जीवन में तमाम प्रकार के फल-फूल, जड़ी बूटियां एवं लकड़ियाँ आदि हमें पेड़ों से ही प्राप्त होती हैं। बताना चाहेंगे समय-समय पर ऐसे कई कवि और लेखक हुए हैं, जिन्होंने पेड़-पौधों पर अनुपम काव्य कृतियों का सृजन किया है। इस लेख में, हम पेड़ पर कविता (Ped Par Kavita) प्रस्तुत कर रहे हैं, जो आपको पेड़-पौधों का महत्व बताएंगी।
पेड़ पर कविता
पेड़ पौधों पर कविता (Ped Par Kavita) इस प्रकार है:-
कविता का नाम | कवि का नाम |
घर और वन और मन | भवानीप्रसाद मिश्र |
पतझड़ की शाम | हरिवंशराय बच्चन |
उस दिन गिर रही थी नीम की एक पत्ती | उदय प्रकाश |
पतझड़ के पीले पत्तों ने | भगवतीचरण वर्मा |
आम के बाग़ | आलोक धन्वा |
वनराज | डी.एच. लॉरेंस |
फूलों में भरी डाल | आलोक धन्वा |
This Blog Includes:
घर और वन और मन
हवा
मेरे घर का चक्कर लगाकर
अभी वन में चली जाएगी
भेजेगी मन तक
बाँस के वन में गुँजाकर
बाँसुरी की आवाज
एक हो जाएँगे
इस तरह
घर और वन और मन
हवा का आना
हवा का जाना
गूँजना बंसी का स्वन !
रचनाकार- भवानीप्रसाद मिश्र
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पतझड़ की शाम
है यह पतझड़ की शाम, सखे!
नीलम-से पल्लव टूट गए,
मरकत-से साथी छूट गए,
अटके फिर भी दो पीत पात
जीवन-डाली को थाम, सखे!
है यह पतझड़ की शाम, सखे!
लुक-छिप करके गानेवाली,
मानव से शरमानेवाली
कू-कू कर कोयल माँग रही
नूतन घूँघट अविराम, सखे!
है यह पतझड़ की शाम, सखे!
नंगी डालों पर नीड़ सघन,
नीड़ों में है कुछ-कुछ कंपन,
मत देख, नजर लग जाएगी;
यह चिड़ियों के सुखधाम, सखे!
है यह पतझड़ की शाम, सखे!
रचनाकार- हरिवंशराय बच्चन
उस दिन गिर रही थी नीम की एक पत्ती
नीम की एक छोटी सी पत्ती हवा जिसे उड़ा ले जा सकती थी किसी भी ओर
जिसे देखा मैंने गिरते हुए आँखें बचाकर बाई ओर
उस तरफ आकाश जहाँ खत्म होता था या शुरू उस रोज
कुछ दिन बीत चुके हैं या कई बरस आज तक
और वह है कि गिरती जा रही है उसी तरह अब तक स्थगित करती समय को
इसी तरह टूटता-फूटता अचानक किसी दिन आता है जीवन में प्यार
अपनी दारुण जर्जरता में पीला किसी हरे-भरे डाल की स्मृति से टूटकर अनाथ
किसी पुराने पेड़ के अंगों से बिछुड़ कर दिशाहारा
हवा में अनिश्चित दिशाओं में आह-आह बिलखता दीन और मलीन
मेरे जीवन के अब तक के जैसे-तैसे लिखे जाते वाक्यों को बिना मुझसे पूछे
इस आकस्मिक तरीके से बदलता हुआ
मुझे नई तरह से लिखता और विकट ढंग से पढ़ता हुआ
इसके पहले यह जीवन एक वाक्य था हर पल लिखा जाता हुआ अब तक किसी तरह
कुछ साँसों, उम्मीदों, विपदाओं और बदहवासियों के आलम में
टेढ़ी-मेढ़ी हैंडराइटिंग में, कुछ अशुद्धियों और व्याकरण की तमाम ऐसी भूलों के साथ
जो हुआ ही करती हैं उस भाषा में जिसके पीछे होती है ऐसी नगण्यता
और मृत या छूटे परिजनों और जगहों की स्मृतियाँ
प्यार कहता है अपनी भर्राई हुई आवाज में भविष्य
और मैं देखता हूँ उसे सांत्वना की
हँसी के साथ हँसी जिसकी आँख से रिसता है आँसू
और शरीर के सारे जोड़ों से लहू
वह नीम की पत्ती जो गिरती चली जा रही है
इस निचाट निर्जनता में खोजती हुई भविष्य
मैं उसे सुनाना चाहता हूँ शमशेर की वह पंक्ति
जिसे भूले हुए अब तक कई बरस हो गए।
रचनाकार- उदय प्रकाश
पतझड़ के पीले पत्तों ने
पतझड़ के पीले पत्तों ने
प्रिय देखा था मधुमास कभी;
जो कहलाता है आज रुदन,
वह कहलाया था हास कभी;
आँखों के मोती बन-बनकर
जो टूट चुके हैं अभी-अभी
सच कहता हूँ, उन सपनों में
भी था मुझको विश्वास कभी।
आलोक दिया हँसकर प्रातः
अस्ताचल पर के दिनकर ने;
जल बरसाया था आज अनल
बरसाने वाले अम्बर ने;
जिसको सुनकर भय-शंका से
भावुक जग उठता काँप यहाँ;
सच कहता हैं कितने रसमय
संगीत रचे मेरे स्वर ने।
तुम हो जाती हो सजल नयन
लखकर यह पागलपन मेरा;
मैं हँस देता हूँ यह कहकर
‘लो टूट चुका बन्धन मेरा!’
ये ज्ञान और भ्रम की बातें
तुम क्या जानो, मैं क्या जानूँ ?
है एक विवशता से प्रेरित
जीवन सबका, जीवन मेरा!
कितने ही रस से भरे हृदय,
कितने ही उन्मद-मदिर-नयन,
संसृति ने बेसुध यहाँ रचे
कितने ही कोमल आलिंगन;
फिर एक अकेली तुम ही क्यों
मेरे जीवन में भार बनीं?
जिसने तोडा प्रिय उसने ही
था दिया प्रेम का यह बन्धन !
कब तुमने मेरे मानस में
था स्पन्दन का संचार किया?
कब मैंने प्राण तुम्हारा निज
प्राणों से था अभिसार किया?
हम-तुमको कोई और यहाँ
ले आया-जाया करता है;
मैं पूछ रहा हूँ आज अरे
किसने कब किससे प्यार किया?
जिस सागर से मधु निकला है,
विष भी था उसके अन्तर में,
प्राणों की व्याकुल हूक-भरी
कोयल के उस पंचम स्वर में;
जिसको जग मिटना कहता है,
उसमें ही बनने का क्रम है;
तुम क्या जानो कितना वैभव है
मेरे इस उजड़े घर में?
मेरी आँखों की दो बूँदों
में लहरें उठतीं लहर-लहर;
मेरी सूनी-सी आहों में
अंबर उठता है मौन सिहर,
निज में लय कर ब्रह्माण्ड निखिल
मैं एकाकी बन चुका यहाँ,
संसृति का युग बन चुका अरे
मेरे वियोग का प्रथम प्रहर!
कल तक जो विवश तुम्हारा था,
वह आज स्वयं हूँ मैं अपना;
सीमा का बन्धन जो कि बना,
मैं तोड़ चुका हूँ वह सपना;
पैरों पर गति के अंगारे,
सर पर जीवन की ज्वाला है;
वह एक हँसी का खेल जिसे
तुम रोकर कह देती ‘तपना’।
मैं बढ़ता जाता हूँ प्रतिपल,
गति है नीचे गति है ऊपर;
भ्रमती ही रहती है पृथ्वी,
भ्रमता ही रहता है अम्बर!
इस भ्रम में भ्रमकर ही भ्रम के
जग में मैंने पाया तुमको;
जग नश्वर है, तुम नश्वर हो,
बस मैं हूँ केवल एक अमर!
रचनाकार- भगवतीचरण वर्मा
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आम के बाग़
आम के फले हुए पेड़ों
के बाग में
कब जाऊँगा?
मुझे पता है कि
अवध, दीघा और मालदह में
घने बाग़ हैं आम के
लेकिन अब कितने और
कहाँ कहाँ
अक्सर तो उनके उजड़ने की
ख़बरें आती रहती हैं।
बचपन की रेल यात्रा में
जगह जगह दिखाई देते थे
आम के बाग
बीसवीं सदी में
भागलपुर से नाथनगर के
बीच रेल उन दिनों जाती थी
आम के बाग़ों के बीच
दिन में गुजरो
तब भी
रेल के डब्बे भर जाते
उनके अँधेरी हरियाली
और खुशबू से
हरा और दूधिया मालदह
दशहरी, सफेदा
बागपत का रटौल
डंटी के पास लाली वाले
कपूर की गंध के बीजू आम
गूदेदार आम अलग खाने के लिए
खाने के लिए
और रस से भरे चूसने के लिए
अलग
ठंढे पानी में भिगोकर
आम खाने और चूसने
के स्वाद से भरे हैं
मेरे भी मन प्राण
हरी धरती से अभिन्न होने में
हज़ार हज़ार चीजें
हाथ से तोड़कर खाने की सीधे
और आग पर पका कर भी
यह जो धरती है
मिट्टी की
जिसके ज़रा नीचे नमी
शुरू होने लगती है खोदते ही !
यह जो धरती
मेढक और झींगुर
के घर जिसके भीतर
मेढक और झींगुर की
आवाज़ों से रात में गूंजने वाली
यह जो धारण किये हुए है
सुदूर जन्म से ही मुझे
हम ने भी इसे संवारा है !
यह भी उतनी ही असुरक्षित
जितना हम मनुष्य इन दिनों
आम जैसे रसीले फल के लिए
भाषा कम पड़ रही है
मेरे पास
भारतवासी होने का सौभाग्य
तो आम से बी बनता है!
रचनाकार- आलोक धन्वा
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वनराज
सर्दियों और जनवरी की बरसती बर्फ में
बहते पानी के गहरे दरें स्याह
घने सनोवर के वृक्ष, नीली गुलमेहँदी
तरल जल की कल-कल, छल-छल
और दूर तक पसरा नागरमोथे का जाल
वहाँ हैं इनसान… दो इंसान
इंसान- दुनिया का सबसे भयावह प्राणी!
वे झिझकते हैं बंदूक रखकर भी
पर, हमारे पास तो कुछ भी नहीं!
सबके कदम बढ़ते हैं आगे की ओर
निकलते हैं दो मेक्सिकी अजनबी
घनघोर घनी घाटी से बाहर
अँधेरा… बर्फ और एकाकीपन
गुम होती पगडंडियों पर
क्या कर रहे हैं वे दोनों?
काँधे पर लदी पीली सी गठरी
आखिर क्या है – हिरण!
मूर्खतापूर्ण हँसी से झेंपते हैं वे
जैसे पकड़ी गई हो कोई गलती
और हम भी मुस्कुराते है, उसी तरह
मानो अनजान हो न हो उस दुखांतिका से
क्या सभ्य है वह गहरे चेहरे का इनसान!
और बेबस है हम – वनराज!
ओह वनराज…!
पीतवर्णी पर निर्जीव, प्राणहीन
तिरस्कार भरी हँसी से बोला वह
मारा है मैंने इसे आज सुबह
गोल, सुंदर माथा, निष्प्राण कर्ण
काली दमकती धारियाँ
सर्द चेहरा और आँखें बेजान
इंसान अधिकारी है खुलेपन का
और हम सिमटे घाटी के धुँधलके में
यहाँ ऊपर किसी वृक्ष की शाख पर
मिलते हैं कुछ केश गुच्छ
भर आता है नन, आँखें होती हैं नम
गहरा सुराख है नारंगी चट्टान की छाती पर
बिखरी हड्डियाँ, शाखें और फैलती गंध
अब उस राह नहीं जाएँगे कभी वे लोग
क्योंकि यहाँ नहीं गरजेगा वनराज
न होगा कुहासे सा चेहरा और…
न होगी उसकी निहार, चमकीली धारियाँ
नारंगी चट्टानों से बनी घाटी के पेड़ों से
निकालकर अपना चेहरा मुहाने पर
नहीं होगा वह वनराज
पर मैं देखता हूँदूर… दूर… और दूर
रेगिस्तान के क्षितिज का वह धुँधलका
एक स्वप्नमयी मृगमरीचिका
बर्फ जमी पहाड़ी पर, हरे स्थितिप्रज्ञ
क्रिसमस वृक्ष की तरह खड़ा में
सोचता हूँ कि इस एकाकी दुनिया में
जगह थी मेरे और वनराज के लिए भी
पर… उस पार की दुनिया में
कितनी आसानी से बसने देते हैं हम
इंसानों की अनगिनत बस्तियाँ अनथक
फिर भी कितना अंतर है इन दोनों दुनियाओं में
इंसानों को हम नहीं खोते कभी पर
वनराज को क्यों खो देता है इंसान!
रचनाकार- डी.एच. लॉरेंस
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फूलों में भरी डाल
दुनिया से मेरे जाने की बात
सामने आ रही है
ठंडी सादगी से
यह सब इसलिए
कि शरीर मेरा थोड़ा हिल गया है
मैं तैयार तो कतई नहीं हूँ
अभी मेरी उम्र ही क्या है!
इस उम्र में तो लोग
घोड़ों की सवारी सीखते हैं
तैर कर नदी पार करते हैं
पानी से भरा मशक
खींच लेते हैं कुएँ से बाहर!
इस उम्र में तो लोग
किसी नेक और कोमल स्त्री
के पीछे-पीछे रुसवाई उठाते हैं
फूलों से भरी डाल
झकझोर डालते हैं
उसके ऊपर!
रचनाकार- आलोक धन्वा
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