सूर की भ्रमरगीत परम्परा पर संक्षेप में प्रकाश डालिए

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सूर की भ्रमरगीत परम्परा पर संक्षेप में प्रकाश डालिए
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उत्तर: भ्रमरगीत परम्परा संस्कृत के भागवत महापुराण में वर्णित उस प्रसंग से जुड़ी है जिसमें श्रीकृष्ण द्वारा उद्धव को गोपियों के पास ज्ञान और वैराग्य का संदेश लेकर भेजा जाता है। गोपियाँ उद्धव के इस योग-संदेश को अस्वीकार कर प्रेम और भक्ति की महत्ता का तर्कपूर्ण ढंग से प्रतिपादन करती हैं।

सूरदास ने इस परम्परा को हिन्दी में अपनाया और उसे सजीव, भावप्रवण एवं लोक-निष्ठ रूप प्रदान किया। उनके भ्रमरगीत में:

  • सगुण भक्ति (भाव, प्रेम, रूप, लीलाएं) का महत्त्व दिखाया गया है।
  • निर्गुण भक्ति (निर्लिप्त योग और ज्ञान का मार्ग) का खंडन किया गया है।
  • गोपियाँ गंभीर तर्क, भावुक संवाद, और कटाक्षपूर्ण भाषा से उद्धव को उत्तर देती हैं।
  • वे कहती हैं कि जिसने प्रेम नहीं किया, वह कितना भी ज्ञानी हो, वह जीवन के रस से वंचित है।

सूरदास का भ्रमरगीत इस परम्परा का सबसे भावुक, प्रभावशाली और काव्यात्मक रूप है। इसमें न केवल भक्ति और ज्ञान की बहस है, बल्कि मानव-हृदय की गहराईयों की भी सुंदर अभिव्यक्ति है।

इस प्रकार सूरदास ने भ्रमरगीत परम्परा को लोकभाषा में जीवंत और कालजयी बना दिया।

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