हरित क्रांति 1960 के दशक में शुरू हुआ एक महत्वपूर्ण कृषि आंदोलन था, जिसका उद्देश्य खेती के पारंपरिक तरीकों को बदलकर कृषि उत्पादन को तेज़ी से बढ़ाना था। इस आंदोलन के तहत उच्च उपज वाले बीज (HYV), आधुनिक सिंचाई व्यवस्था, रासायनिक उर्वरकों और कृषि मशीनों का बड़े पैमाने पर उपयोग किया गया। इसके परिणामस्वरूप भारत में विशेष रूप से गेहूँ और चावल के उत्पादन में क्रांतिकारी वृद्धि हुई।
इस आंदोलन की आवश्यकता इसलिए पड़ी क्योंकि स्वतंत्रता के बाद भारत में खाद्यान्न की भारी कमी थी। बढ़ती जनसंख्या, मानसून पर निर्भर खेती और कम उत्पादन के कारण देश को अनाज आयात करना पड़ता था। हरित क्रांति का मुख्य लक्ष्य इस खाद्य संकट को समाप्त करना और देश में खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करना था।
वैश्विक स्तर पर हरित क्रांति के जनक नॉर्मन बोरलॉग माने जाते हैं, जबकि भारत में इस कृषि आंदोलन का नेतृत्व डॉ. एम. एस. स्वामीनाथन ने किया। भारत में हरित क्रांति की शुरुआत 1965 – 66 के आसपास मानी जाती है।
इस आंदोलन के परिणामस्वरूप भारत खाद्यान्न की कमी वाले देश से आत्मनिर्भर राष्ट्र बन सका। कृषि उत्पादन में भारी वृद्धि हुई, किसानों की आय बढ़ी और अकाल जैसी स्थितियों पर काफी हद तक नियंत्रण संभव हुआ। हालांकि, रासायनिक उर्वरकों और कीटनाशकों के अधिक प्रयोग से मिट्टी की गुणवत्ता और पर्यावरण पर नकारात्मक प्रभाव भी पड़े।
हरित क्रांति के प्रभाव
हरित क्रांति के कारण भारत में खाद्यान्न उत्पादन, विशेष रूप से गेहूँ और चावल की पैदावार, तेज़ी से बढ़ी और देश खाद्यान्न आत्मनिर्भर बन सका। खाद्य उपलब्धता बढ़ने से अकाल जैसी स्थितियों पर काफी हद तक नियंत्रण संभव हुआ। साथ ही सिंचाई, भंडारण और कृषि उपकरणों से जुड़ी सुविधाओं का विकास हुआ तथा खेती में वैज्ञानिक सोच और आधुनिक तकनीकों का महत्व बढ़ा।
हालाँकि इसके कुछ नकारात्मक प्रभाव भी सामने आए। रासायनिक उर्वरकों और कीटनाशकों के अधिक उपयोग से मिट्टी की उर्वरता प्रभावित हुई और कई क्षेत्रों में भूजल स्तर गिरा। इसके अलावा, हरित क्रांति का लाभ कुछ ही राज्यों तक सीमित रहा और गेहूँ-चावल पर अधिक जोर देने से फसल विविधता तथा पर्यावरणीय संतुलन पर असर पड़ा।

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