Subhadra Kumari Chauhan Poem in Hindi: भारतीय साहित्य में कई ऐसी कवि और कवयित्रियाँ हुई हैं, जिनकी लेखनी ने समाज को जागरूक करने और बदलाव की लौ जलाने का कार्य किया। ऐसी ही एक प्रखर स्वतंत्रता सेनानी और अद्भुत कवयित्री थीं सुभद्रा कुमारी चौहान। उनकी रचनाएँ सिर्फ़ साहित्य का हिस्सा नहीं हैं, बल्कि वे समाज में व्याप्त कुरीतियों के ख़िलाफ़ एक मजबूत आवाज़ भी बनीं। उनकी कविताएँ आज भी प्रासंगिक हैं और युवाओं में राष्ट्रप्रेम, साहस और संघर्ष की भावना भरने का काम करती हैं।
कविता केवल भावनाओं की अभिव्यक्ति नहीं, बल्कि समाज में बदलाव लाने का एक सशक्त माध्यम होती है। सुभद्रा कुमारी चौहान की कविताओं में भी यही तेजस्विता झलकती है। उनकी रचनाएँ, विशेष रूप से ‘झाँसी की रानी’, आज भी हर भारतीय के हृदय में जोश और गर्व की भावना भर देती हैं। वे न सिर्फ़ अपने शब्दों से क्रांति की मशाल जलाने वाली कवयित्री थीं, बल्कि एक वीर स्वतंत्रता सेनानी भी, जिन्होंने देश के लिए संघर्ष किया।
इस लेख में, सुभद्रा कुमारी चौहान की कविताएं (Subhadra Kumari Chauhan Poem in Hindi) दी गई हैं, जो पाठकों को न केवल साहित्य का आनंद देंगी, बल्कि उनके भीतर साहस, आत्मसम्मान और देशभक्ति की भावना भी जागृत करेंगी।
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सुभद्रा कुमारी चौहान कौन थीं?
सुभद्रा कुमारी चौहान केवल एक प्रसिद्ध कवयित्री ही नहीं, बल्कि भारतीय स्वतंत्रता संग्राम की एक निर्भीक सेनानी भी थीं। उनकी लेखनी में देशभक्ति, साहस और सामाजिक जागरूकता की गूंज थी। उनकी रचनाएँ आज भी प्रासंगिक हैं और लाखों युवाओं को प्रेरित कर रही हैं। साहित्य जगत में उन्हें एक अनमोल रत्न माना जाता है, जिनकी कविताएँ न केवल साहित्यिक उत्कृष्टता का परिचय देती हैं, बल्कि समाज में बदलाव की चेतना भी जागृत करती हैं।
सुभद्रा कुमारी चौहान का जन्म 16 अगस्त 1904 को उत्तर प्रदेश के निहालपुर गाँव में हुआ था। उन्होंने प्रयागराज के क्रास्थवेट गर्ल्स कॉलेज में शिक्षा प्राप्त की। महज़ 9 वर्ष की उम्र में उनकी पहली कविता प्रयाग से प्रकाशित पत्रिका ‘मर्यादा’ में प्रकाशित हुई, जिससे उनकी साहित्यिक प्रतिभा उभरकर सामने आई।
उन्होंने अनेक प्रेरणादायक कविताएँ लिखीं, जिनमें देशभक्ति, वीरता और सामाजिक सरोकारों की झलक मिलती है। उनकी रचनाओं में “झाँसी की रानी”, “वीरों का कैसा हो वसंत”, “जलियाँवाला बाग में बसंत”, “कोयल”, “ठुकरा दो या प्यार करो”, और “पानी और धूप” जैसी कालजयी कविताएँ शामिल हैं, जो आज भी लोगों के दिलों में देशप्रेम और जोश की भावना भर देती हैं।
उनके अतुलनीय साहित्यिक योगदान और स्वतंत्रता संग्राम में साहसिक भूमिका के लिए, उन्हें वर्ष 1946 में “पद्म भूषण” से सम्मानित किया गया था। 15 फरवरी 1948 को, यह महान कवयित्री और स्वतंत्रता सेनानी मध्य प्रदेश के सिवनी में इस दुनिया को अलविदा कह गईं। लेकिन उनकी कविताएँ और विचार आज भी जीवित हैं और अनगिनत लोगों को प्रेरित करते रहेंगे।
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सुभद्रा कुमारी चौहान की कविताएं
सुभद्रा कुमारी चौहान की कविताओं (Subhadra Kumari Chauhan Poem in Hindi) की सूची इस प्रकार है, जो कविताएं देशभक्ति, वीरता, सामाजिक जागरूकता और प्रकृति प्रेम की अद्भुत भावना से ओत-प्रोत हैं और आज भी पाठकों को प्रेरित करती हैं।
उल्लास | प्रभु तुम मेरे मन की जानो |
प्रथम दर्शन | नीम |
पूछो | पानी और धूप |
परिचय | झिलमिल तारे |
ठुकरा दो या प्यार करो | झाँसी की रानी की समाधि पर |
झांसी की रानी | जलियाँवाला बाग में बसंत |
तुम | खिलौनेवाला |
जीवन-फूल | चिंता |
चलते समय | आराधना |
इसका रोना | कलह-कारण |
उपेक्षा | अनोखा दान |
व्याकुल चाह | कोयल |
स्वदेश के प्रति | समर्पण |
वेदना | साध |
यह कदम्ब का पेड़ | वीरों का कैसा हो वसंत |
विदा | मधुमय प्याली |
मेरा जीवन | मेरा नया बचपन |
बिदाई | विजयी मयूर |
मेरा गीत | मेरे पथिक |
भ्रम | मुरझाया फूल |
फूल के प्रति | मेरी टेक |
प्रतीक्षा | प्रियतम से |
वीरों का कैसा हो वसंत
सुभद्रा कुमारी चौहान जी की लोकप्रिय कविताओं (Subhadra Kumari Chauhan Poem in Hindi) में से एक “वीरों का कैसा हो वसंत” भी है, जो इस प्रकार है:
आ रही हिमालय से पुकार है उदधि गरजता बार बार प्राची पश्चिम भू नभ अपार; सब पूछ रहें हैं दिग-दिगन्त वीरों का कैसा हो वसंत फूली सरसों ने दिया रंग मधु लेकर आ पहुंचा अनंग वधु वसुधा पुलकित अंग अंग; है वीर देश में किन्तु कंत वीरों का कैसा हो वसंत भर रही कोकिला इधर तान मारू बाजे पर उधर गान है रंग और रण का विधान; मिलने को आए आदि अंत वीरों का कैसा हो वसंत गलबाहें हों या कृपाण चलचितवन हो या धनुषबाण हो रसविलास या दलितत्राण; अब यही समस्या है दुरंत वीरों का कैसा हो वसंत कह दे अतीत अब मौन त्याग लंके तुझमें क्यों लगी आग ऐ कुरुक्षेत्र अब जाग जाग; बतला अपने अनुभव अनंत वीरों का कैसा हो वसंत हल्दीघाटी के शिला खण्ड ऐ दुर्ग सिंहगढ़ के प्रचंड राणा ताना का कर घमंड; दो जगा आज स्मृतियां ज्वलंत वीरों का कैसा हो वसंत भूषण अथवा कवि चंद नहीं बिजली भर दे वह छन्द नहीं है कलम बंधी स्वच्छंद नहीं; फिर हमें बताए कौन हन्त वीरों का कैसा हो वसंत -सुभद्रा कुमारी चौहान
भावार्थ: इस कविता में सुभद्रा कुमारी चौहान वीरों के वसंत का चित्रण करती हैं, जो आम लोगों के वसंत से बिल्कुल अलग होता है। कविता की शुरुआत में वह हिमालय से प्रश्न करती हैं कि वीरों का वसंत कैसा होता होगा? इसके उत्तर में वह बताती हैं कि वीरों का वसंत रणभूमि में खिलता है, जहाँ वे अपने प्राणों की आहुति देकर मातृभूमि की रक्षा करते हैं।
कविता में कवयित्री यह दर्शाती हैं कि वीरों के वसंत में फूलों की सुगंध नहीं, बल्कि बारूद की गंध होती है। यह वह ऋतु है, जब वीर अपने साहस, शौर्य और बलिदान से इतिहास रचते हैं। अंत तक कविता यही संदेश देती है कि वीरों का वसंत देशभक्ति, त्याग, सम्मान और बलिदान से महकता है। यह प्रेरणादायक रचना स्वतंत्रता संग्राम के दौरान वर्ष 1923 में लिखी गई थी, जो आज भी वीरता और राष्ट्रप्रेम की भावना को जागृत करती है।
ठुकरा दो या प्यार करो
सुभद्रा कुमारी चौहान जी की लोकप्रिय कविताओं (Subhadra Kumari Chauhan Poem in Hindi) में से एक “ठुकरा दो या प्यार करो” भी है, जो इस प्रकार है:
देव! तुम्हारे कई उपासक कई ढंग से आते हैं सेवा में बहुमूल्य भेंट वे कई रंग की लाते हैं धूमधाम से साज-बाज से वे मंदिर में आते हैं मुक्तामणि बहुमुल्य वस्तुऐं लाकर तुम्हें चढ़ाते हैं मैं ही हूँ गरीबिनी ऐसी जो कुछ साथ नहीं लाई फिर भी साहस कर मंदिर में पूजा करने चली आई धूप-दीप-नैवेद्य नहीं है झांकी का श्रृंगार नहीं हाय! गले में पहनाने को फूलों का भी हार नहीं कैसे करूँ कीर्तन, मेरे स्वर में है माधुर्य नहीं मन का भाव प्रकट करने को वाणी में चातुर्य नहीं नहीं दान है, नहीं दक्षिणा खाली हाथ चली आई पूजा की विधि नहीं जानती, फिर भी नाथ चली आई पूजा और पुजापा प्रभुवर इसी पुजारिन को समझो दान-दक्षिणा और निछावर इसी भिखारिन को समझो मैं उनमत्त प्रेम की प्यासी हृदय दिखाने आई हूँ जो कुछ है, वह यही पास है, इसे चढ़ाने आई हूँ चरणों पर अर्पित है, इसको चाहो तो स्वीकार करो यह तो वस्तु तुम्हारी ही है ठुकरा दो या प्यार करो -सुभद्रा कुमारी चौहान
भावार्थ: इस कविता में सुभद्रा कुमारी चौहान ईश्वर के प्रति अपनी अटूट भक्ति और समर्पण को अभिव्यक्त करती हैं। कविता की शुरुआत में वह कहती हैं कि उनका प्रेम केवल ईश्वर के लिए है, और वे सच्चे हृदय से उनकी आराधना करती हैं। कवयित्री आगे स्पष्ट करती हैं कि उनकी भक्ति किसी दिखावे के लिए नहीं है, बल्कि वह निस्वार्थ और गहरी श्रद्धा से ईश्वर को प्रेम करती हैं। वह न तो भौतिक सुख-संपत्ति की आकांक्षा रखती हैं, न ही कोई विशेष वरदान चाहती हैं, बल्कि केवल ईश्वर का आशीर्वाद और प्रेम ही उनकी सच्ची संपत्ति है। यह कविता निष्काम भक्ति का सुंदर उदाहरण प्रस्तुत करती है, जो यह सिखाती है कि सच्चा प्रेम और समर्पण किसी भी स्वार्थ से परे होता है।
साध
सुभद्रा कुमारी चौहान जी की लोकप्रिय कविताओं (Subhadra Kumari Chauhan Poem in Hindi) में से एक “साध” भी है, जो इस प्रकार है:
मृदुल कल्पना के चल पँखों पर हम तुम दोनों आसीन। भूल जगत के कोलाहल को रच लें अपनी सृष्टि नवीन। वितत विजन के शांत प्रांत में कल्लोलिनी नदी के तीर। बनी हुई हो वहीं कहीं पर हम दोनों की पर्ण-कुटीर। कुछ रूखा, सूखा खाकर ही पीतें हों सरिता का जल। पर न कुटिल आक्षेप जगत के करने आवें हमें विकल। सरल काव्य-सा सुंदर जीवन हम सानंद बिताते हों। तरु-दल की शीतल छाया में चल समीर-सा गाते हों। सरिता के नीरव प्रवाह-सा बढ़ता हो अपना जीवन। हो उसकी प्रत्येक लहर में अपना एक निरालापन। रचे रुचिर रचनाएँ जग में अमर प्राण भरने वाली। दिशि-दिशि को अपनी लाली से अनुरंजित करने वाली। तुम कविता के प्राण बनो मैं उन प्राणों की आकुल तान। निर्जन वन को मुखरित कर दे प्रिय! अपना सम्मोहन गान। -सुभद्रा कुमारी चौहान
भावार्थ : इस कविता में सुभद्रा कुमारी चौहान एक सरल, शांत और संतोषपूर्ण जीवन की कामना करती हैं। वह मानती हैं कि सच्ची खुशी बाहरी दिखावे या भौतिक सुखों में नहीं, बल्कि सादगी और संयम में निहित होती है। कवयित्री इस कविता के माध्यम से यह व्यक्त करती हैं कि वह दुनिया के शोर, चकाचौंध और दिखावे से दूर रहकर एक शांतिपूर्ण जीवन जीना चाहती हैं। वह बाहरी वैभव या संपत्ति की आकांक्षा नहीं रखतीं, बल्कि आंतरिक शांति और आत्मसंतोष को ही जीवन का सर्वोच्च सुख मानती हैं। यह कविता महात्मा गांधी के विचारों से प्रेरित होकर वर्ष 1932 में लिखी गई थी, जो सरलता, आत्मसंयम और अहिंसा के सिद्धांतों पर बल देती है।
कोयल
सुभद्रा कुमारी चौहान जी की लोकप्रिय कविताओं (Subhadra Kumari Chauhan Poem in Hindi) में से एक “कोयल” भी है, जो इस प्रकार है:
देखो कोयल काली है पर मीठी है इसकी बोली इसने ही तो कूक कूक कर आमों में मिश्री घोली कोयल कोयल सच बतलाना क्या संदेसा लाई हो बहुत दिनों के बाद आज फिर इस डाली पर आई हो क्या गाती हो किसे बुलाती बतला दो कोयल रानी प्यासी धरती देख मांगती हो क्या मेघों से पानी? कोयल यह मिठास क्या तुमने अपनी माँ से पाई है? माँ ने ही क्या तुमको मीठी बोली यह सिखलाई है? डाल डाल पर उड़ना गाना जिसने तुम्हें सिखाया है सबसे मीठे मीठे बोलो यह भी तुम्हें बताया है बहुत भली हो तुमने माँ की बात सदा ही है मानी इसीलिये तो तुम कहलाती हो सब चिड़ियों की रानी -सुभद्रा कुमारी चौहान
भावार्थ: इस कविता में सुभद्रा कुमारी चौहान कोयल के मधुर स्वर की सुंदरता और उसके प्रभाव को दर्शाती हैं। कवयित्री कहती हैं कि कोयल का गीत वसंत ऋतु के आगमन का संदेश लेकर आता है, जो मन को आनंद और उमंग से भर देता है। कविता में कोयल के मधुर स्वरों को आत्मा को शांति और प्रसन्नता देने वाला बताया गया है, जो हमें जीवन की खूबसूरती को महसूस करने और उसका आनंद लेने के लिए प्रेरित करता है। इस रचना के माध्यम से प्रकृति के प्रति प्रेम और उसकी सराहना का भाव प्रकट किया गया है। यह कविता वर्ष 1930 में लिखी गई थी, जिसमें प्रकृति के सौंदर्य और संगीत के माध्यम से मनुष्य के भीतर सकारात्मकता और उल्लास भरने का संदेश दिया गया है।
झांसी की रानी
सुभद्रा कुमारी चौहान जी की लोकप्रिय कविताओं (Subhadra Kumari Chauhan Poem in Hindi) में से एक “झांसी की रानी” भी है, जो इस प्रकार है:
सिंहासन हिल उठे राजवंशों ने भृकुटी तानी थी, बूढ़े भारत में भी आई फिर से नई जवानी थी, गुमी हुई आज़ादी की कीमत सबने पहचानी थी, दूर फिरंगी को करने की सबने मन में ठानी थी। चमक उठी सन सत्तावन में, वह तलवार पुरानी थी, बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी, खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी। कानपूर के नाना की, मुँहबोली बहन छबीली थी, लक्ष्मीबाई नाम, पिता की वह संतान अकेली थी, नाना के सँग पढ़ती थी वह, नाना के सँग खेली थी, बरछी, ढाल, कृपाण, कटारी उसकी यही सहेली थी। वीर शिवाजी की गाथायें उसको याद ज़बानी थी, बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी, खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी। लक्ष्मी थी या दुर्गा थी वह स्वयं वीरता की अवतार, देख मराठे पुलकित होते उसकी तलवारों के वार, नकली युद्ध-व्यूह की रचना और खेलना खूब शिकार, सैन्य घेरना, दुर्ग तोड़ना ये थे उसके प्रिय खिलवाड़। महाराष्ट्र-कुल-देवी उसकी भी आराध्य भवानी थी, बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी, खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी। हुई वीरता की वैभव के साथ सगाई झाँसी में, ब्याह हुआ रानी बन आई लक्ष्मीबाई झाँसी में, राजमहल में बजी बधाई खुशियाँ छाई झाँसी में, सुघट बुंदेलों की विरुदावलि-सी वह आई थी झांसी में। चित्रा ने अर्जुन को पाया, शिव को मिली भवानी थी, बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी, खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी। उदित हुआ सौभाग्य, मुदित महलों में उजियाली छाई, किंतु कालगति चुपके-चुपके काली घटा घेर लाई, तीर चलाने वाले कर में उसे चूड़ियाँ कब भाई, रानी विधवा हुई, हाय! विधि को भी नहीं दया आई। निसंतान मरे राजाजी रानी शोक-समानी थी, बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी, खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी। बुझा दीप झाँसी का तब डलहौज़ी मन में हरषाया, राज्य हड़प करने का उसने यह अच्छा अवसर पाया, फ़ौरन फौजें भेज दुर्ग पर अपना झंडा फहराया, लावारिस का वारिस बनकर ब्रिटिश राज्य झाँसी आया। अश्रुपूर्ण रानी ने देखा झाँसी हुई बिरानी थी, बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी, खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी। अनुनय विनय नहीं सुनती है, विकट शासकों की माया, व्यापारी बन दया चाहता था जब यह भारत आया, डलहौज़ी ने पैर पसारे, अब तो पलट गई काया, राजाओं नव्वाबों को भी उसने पैरों ठुकराया। रानी दासी बनी, बनी यह दासी अब महरानी थी, बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी, खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी। छिनी राजधानी दिल्ली की, लखनऊ छीना बातों-बात, कैद पेशवा था बिठूर में, हुआ नागपुर का भी घात, उदैपुर, तंजौर, सतारा,कर्नाटक की कौन बिसात? जब कि सिंध, पंजाब ब्रह्म पर अभी हुआ था वज्र-निपात। बंगाले, मद्रास आदि की भी तो वही कहानी थी, बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी, खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी। रानी रोईं रनिवासों में, बेगम ग़म से थीं बेज़ार, उनके गहने कपड़े बिकते थे कलकत्ते के बाज़ार, सरे आम नीलाम छापते थे अंग्रेज़ों के अखबार, 'नागपुर के ज़ेवर ले लो लखनऊ के लो नौलख हार'। यों परदे की इज़्ज़त परदेशी के हाथ बिकानी थी, बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी, खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी। कुटियों में भी विषम वेदना, महलों में आहत अपमान, वीर सैनिकों के मन में था अपने पुरखों का अभिमान, नाना धुंधूपंत पेशवा जुटा रहा था सब सामान, बहिन छबीली ने रण-चण्डी का कर दिया प्रकट आहवान। हुआ यज्ञ प्रारम्भ उन्हें तो सोई ज्योति जगानी थी, बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी, खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी। महलों ने दी आग, झोंपड़ी ने ज्वाला सुलगाई थी, यह स्वतंत्रता की चिनगारी अंतरतम से आई थी, झाँसी चेती, दिल्ली चेती, लखनऊ लपटें छाई थी, मेरठ, कानपुर,पटना ने भारी धूम मचाई थी, जबलपुर, कोल्हापुर में भी कुछ हलचल उकसानी थी, बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी, खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी। इस स्वतंत्रता महायज्ञ में कई वीरवर आए काम, नाना धुंधूपंत, ताँतिया, चतुर अज़ीमुल्ला सरनाम, अहमदशाह मौलवी, ठाकुर कुँवरसिंह सैनिक अभिराम, भारत के इतिहास गगन में अमर रहेंगे जिनके नाम। लेकिन आज जुर्म कहलाती उनकी जो कुरबानी थी, बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी, खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी। इनकी गाथा छोड़, चले हम झाँसी के मैदानों में, जहाँ खड़ी है लक्ष्मीबाई मर्द बनी मर्दानों में, लेफ्टिनेंट वाकर आ पहुँचा, आगे बढ़ा जवानों में, रानी ने तलवार खींच ली, हुया द्वंद असमानों में। ज़ख्मी होकर वाकर भागा, उसे अजब हैरानी थी, बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी, खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी। रानी बढ़ी कालपी आई, कर सौ मील निरंतर पार, घोड़ा थक कर गिरा भूमि पर गया स्वर्ग तत्काल सिधार, यमुना तट पर अंग्रेज़ों ने फिर खाई रानी से हार, विजई रानी आगे चल दी, किया ग्वालियर पर अधिकार। अंग्रेज़ों के मित्र सिंधिया ने छोड़ी राजधानी थी, बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी, खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी। विजय मिली, पर अंग्रेज़ों की फिर सेना घिर आई थी, अबके जनरल स्मिथ सम्मुख था, उसने मुहँ की खाई थी, काना और मंदरा सखियाँ रानी के संग आई थी, युद्ध श्रेत्र में उन दोनों ने भारी मार मचाई थी। पर पीछे ह्यूरोज़ आ गया, हाय! घिरी अब रानी थी, बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी, खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी। तो भी रानी मार काट कर चलती बनी सैन्य के पार, किन्तु सामने नाला आया, था वह संकट विषम अपार, घोड़ा अड़ा, नया घोड़ा था, इतने में आ गये सवार, रानी एक, शत्रु बहुतेरे, होने लगे वार-पर-वार। घायल होकर गिरी सिंहनी उसे वीर गति पानी थी, बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी, खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी। रानी गई सिधार चिता अब उसकी दिव्य सवारी थी, मिला तेज से तेज, तेज की वह सच्ची अधिकारी थी, अभी उम्र कुल तेइस की थी, मनुज नहीं अवतारी थी, हमको जीवित करने आई बन स्वतंत्रता-नारी थी, दिखा गई पथ, सिखा गई हमको जो सीख सिखानी थी, बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी, खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी। जाओ रानी याद रखेंगे ये कृतज्ञ भारतवासी, यह तेरा बलिदान जगावेगा स्वतंत्रता अविनासी, होवे चुप इतिहास, लगे सच्चाई को चाहे फाँसी, हो मदमाती विजय, मिटा दे गोलों से चाहे झाँसी। तेरा स्मारक तू ही होगी, तू खुद अमिट निशानी थी, बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी, खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी। -सुभद्रा कुमारी चौहान
भावार्थ: इस कविता में सुभद्रा कुमारी चौहान ने झांसी की रानी लक्ष्मीबाई के अदम्य साहस, वीरता और बलिदान का चित्रण किया है। कवयित्री रानी लक्ष्मीबाई के जन्म, पालन-पोषण, उनकी न्यायप्रियता और ब्रिटिश सेना के खिलाफ उनके संघर्षों का विस्तृत वर्णन करती हैं। यह कविता भारत के स्वतंत्रता संग्राम के दौरान वर्ष 1930 में लिखी गई थी, जिसका उद्देश्य रानी लक्ष्मीबाई के साहस को सच्ची श्रद्धांजलि अर्पित करना था। इस रचना ने स्वतंत्रता संग्राम के दौरान युवाओं में देशभक्ति और राष्ट्रवाद की भावना को प्रबल रूप से जागृत किया। झांसी की रानी का यह ओजस्वी चित्रण आज भी प्रेरणा का स्रोत बना हुआ है।
पानी और धूप
सुभद्रा कुमारी चौहान जी की लोकप्रिय कविताओं (Subhadra Kumari Chauhan Poem in Hindi) में से एक “पानी और धूप” भी है, जो इस प्रकार है:
अभी अभी थी धूप, बरसने लगा कहाँ से यह पानी किसने फोड़ घड़े बादल के की है इतनी शैतानी। सूरज ने क्यों बंद कर लिया अपने घर का दरवाज़ा उसकी माँ ने भी क्या उसको बुला लिया कहकर आज। ज़ोर-ज़ोर से गरज रहे हैं बादल हैं किसके काका किसको डाँट रहे हैं, किसने कहना नहीं सुना माँ का। बिजली के आँगन में अम्माँ चलती है कितनी तलवार कैसी चमक रही है फिर भी क्यों ख़ाली जाते हैं वार। क्या अब तक तलवार चलाना माँ वे सीख नहीं पाए इसीलिए क्या आज सीखने आसमान पर हैं आए। एक बार भी माँ यदि मुझको बिजली के घर जाने दो उसके बच्चों को तलवार चलाना सिखला आने दो। ख़ुश होकर तब बिजली देगी मुझे चमकती सी तलवार तब माँ कोई कर न सकेगा अपने ऊपर अत्याचार। पुलिसमैन अपने काका को फिर न पकड़ने आएँगे देखेंगे तलवार दूर से ही वे सब डर जाएँगे। अगर चाहती हो माँ काका जाएँ अब न जेलख़ाना तो फिर बिजली के घर मुझको तुम जल्दी से पहुँचाना। काका जेल न जाएँगे अब तुझे मँगा दूँगी तलवार पर बिजली के घर जाने का अब मत करना कभी विचार।
भावार्थ: पानी और धुप कविता में सुभद्रा जी ने ऐसे एक मौसम के बारे में बताया है जब काले बादल आकाश में एकत्र होने लगते हैं, बिजली रौद्र रूप से गरजती है और उसके बाद भीषण वर्षा बरसती है।
खिलौनेवाला
सुभद्रा कुमारी चौहान जी की लोकप्रिय कविताओं (Subhadra Kumari Chauhan Poem in Hindi) में से एक “खिलौनेवाला” भी है, जो इस प्रकार है:
वह देखो माँ आज
खिलौनेवाला फिर से आया है।
कई तरह के सुंदर-सुंदर
नए खिलौने लाया है।
हरा-हरा तोता पिंजड़े में
गेंद एक पैसे वाली
छोटी-सी मोटर गाड़ी है
सर-सर-सर चलने वाली।
सीटी भी है कई तरह की
कई तरह के सुंदर खेल
चाभी भर देने से भक-भक
करती चलने वाली रेल।
गुड़िया भी है बहुत भली-सी
पहिने कानों में बाली
छोटा-सा ‘टी सेट’ है
छोटे-छोटे हैं लोटा-थाली।
छोटे-छोटे धनुष-बाण हैं
हैं छोटी-छोटी तलवार
नए खिलौने ले लो भैया
ज़ोर-ज़ोर वह रहा पुकार।
मुन्नू ने गुड़िया ले ली है
मोहन ने मोटर गाड़ी
मचल-मचल सरला कहती है
माँ से लेने को साड़ी
कभी खिलौनेवाला भी माँ
क्या साड़ी ले आता है।
साड़ी तो वह कपड़े वाला
कभी-कभी दे जाता है
अम्मा तुमने तो लाकर के'अम्मा तुमने तो लाकर के
मुझे दे दिए पैसे चार
कौन खिलौने लेता हूँ मैं
तुम भी मन में करो विचार।
तुम सोचोगी मैं ले लूँगा।
तोता, बिल्ली, मोटर, रेल
पर माँ, यह मैं कभी न लूँगा
ये तो हैं बच्चों के खेल।
मैं तलवार ख़रीदूँगा माँ
या मैं लूँगा तीर-कमान
जंगल में जा, किसी ताड़का
को मारूँगा राम समान।
तपसी यज्ञ करेंगे, असुरों—
को मैं मार भगाऊँगा
यों ही कुछ दिन करते-करते
रामचंद्र बन जाऊँगा।
यहीं रहूँगा कौशल्या मैं
तुमको यहीं बनाऊँगा।
तुम कह दोगी वन जाने को
हँसते-हँसते जाऊँगा।
पर माँ, बिना तुम्हारे वन में
मैं कैसे रह पाऊँगा।
दिन भर घूमूँगा जंगल में
लौट कहाँ पर आऊँगा।
किससे लूँगा पैसे, रूठूँगा
तो कौन मना लेगा
कौन प्यार से बिठा गोद में
मनचाही चीज़ें देगा।
भावार्थ : छोटा बालक अपनी माता से बोलता है कि, मां आज देखिए खिलौने वाला भिन्न-भिन्न के खिलौने लेकर आया है। उस खिलौने वाले के पिंजरे में एक हरा तोता है तो उसके पास एक मोटर गाड़ी भी है जो धीरे धीरे चलती है।
FAQs
सुभद्रा कुमारी द्वारा लिखी प्रसिद्ध कविता झाँसी की रानी है।
सुभद्रा कुमारी चौहान ने मात्र 9 वर्ष की आयु में अपनी पहली कविता ‘नीम’ लिखी थी।
सुभद्रा कुमारी चौहान की मृत्यु 15 फ़रवरी 1948 को सिवनी, मध्यप्रदेश में हुई थी।
“झाँसी की रानी” उनकी सबसे प्रसिद्ध रचना है, जो रानी लक्ष्मीबाई के वीरता और बलिदान को दर्शाती है।
“झाँसी की रानी” कविता रानी लक्ष्मीबाई के संघर्ष और साहस को दर्शाती है, जिसे सुभद्रा कुमारी चौहान ने लिखा था।
यह प्रसिद्ध देशभक्ति कविता सुभद्रा कुमारी चौहान द्वारा लिखी गई है।
“खूब लड़ी मर्दानी, वह तो झाँसी वाली रानी थी” पंक्ति सुभद्रा कुमारी चौहान की कविता “झाँसी की रानी” से ली गई है।
उनके काव्य का मूल स्वर देशभक्ति, सामाजिक चेतना, नारी सशक्तिकरण और वीर रस से प्रेरित है।
सुभद्रा कुमारी चौहान का जन्म 16 अगस्त 1904 को निहालपुर, प्रयागराज (उत्तर प्रदेश) में हुआ था।
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