Motivational Poems in Hindi

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Motivational Poems in Hindi

Motivational poems हमारे हृदय में उत्साह और प्रोत्साहन भरती है। Motivational Poem in Hindi के इस ब्लॉग में महान लोगों के द्वारा लिखी गई मोटिवेशनल पोएम इन हिंदी दी गई है जो आपको अपने जीवन में हताश होने पर motivate करेगी। महान लोगों की यह most important motivational poems आपके जीवन में आनंद भरेगी और आपको सफलता की ओर अग्रसर करेगी। तो आइए देखते हैं महान लोगों के द्वारा लिखी गई Motivational poems in Hindi जो नीचे दी गई है-

This Blog Includes:
  1. हरिवंश राय बच्चन: Motivational Poems in Hindi 
    1. जो बीत गई -हरिवंश राय बच्चन 
    2. दिन जल्दी-जल्दी ढलता है -हरिवंश राय बच्चन 
    3. हिम्मत करने वालों की कभी हार नही होती.. -हरिवंश राय बच्चन
  2. मैथिलीशरण गुप्त: Motivational poems in Hindi
    1. मनुष्यता -मैथिलीशरण गुप्त
    2. नर हो, न निराश करो मन को -मैथिलीशरण गुप्त
    3. प्रतिशोध -मैथिलीशरण गुप्त
  3. अटल बिहारी वाजपेयी: Motivational Poem in Hindi
    1. आओ फिर से दिया जलाएँ -अटल बिहारी वाजपेयी
    2. क़दम मिला कर चलना होगा -अटल बिहारी वाजपेयी
  4. प्रदीप: Motivational Poem in Hindi
    1. हम लाये हैं तूफ़ान से किश्ती निकाल के | प्रदीप 
  5. रवीन्द्रनाथ टैगोर: Motivational Poem in Hindi
    1. मन जहां डर से परे है
  6. Makhanlal Chaturvedi (माखनलाल चतुर्वेदी)
  7. माखनलाल चतुर्वेदी की कविताएं
    1. एक तुम हो
    2. मैं अपने से डरती हूँ सखि !
  8. सूर्यकांत त्रिपाठी निराला Suryakant Tripathi Nirala
    1. सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’ की रचनाएं
  9. जयशंकर प्रसाद (Jay Shankar Prasad)
  10. नरेंद्र वर्मा की Poem
  11. नरेंद्र वर्मा की मोटिवेशनल Poem

हरिवंश राय बच्चन: Motivational Poems in Hindi 

कवि परिचय-कविवर हरिवंश राय बच्चन का जन्म 27 नवंबर सन 1907 को इलाहाबाद में हुआ था। उन्होंने इलाहाबाद विश्वविद्यालय से अंग्रेजी विषय में एम०ए० की परीक्षा उत्तीर्ण की तथा 1942-1952 ई० तक यहीं पर प्राध्यापक रहे। 1976 ई० में उन्हें ‘पद्म भूषण’ से अलंकृत किया गया।उनका निधन 2003 ई० में मुंबई में हुआ।

Harivansh Rai Bachchan

जो बीत गई -हरिवंश राय बच्चन 

जो बीत गई सो बात गई!
जीवन में एक सितारा था
माना, वह बेहद प्यारा था,
वह डूब गया तो डूब गया;
अंबर के आनन को देखो,
कितने इसके तारे टूटे,
कितने इसके प्यारे छूटे,
जो छूट गए फिर कहाँ मिले;
पर बोलो टूटे तारों पर
कब अंबर शोक मनाता है!
जो बीत गई सो बात गई!

जीवन में वह था एक कुसुम,
थे उस पर नित्य निछावर तुम,
वह सूख गया तो सूख गया;
मधुवन की छाती को देखो,
सूखीं कितनी इसकी कलियाँ,
मुरझाईं कितनी वल्लरियाँ जो
मुरझाईं फिर कहाँ खिलीं;
पर बोलो सूखे फूलों पर
 कब मधुवन शोर मचाता है;
जो बीत गई सो बात गई!

जीवन में मधु का प्याला था,
तुमने तन-मन दे डाला था,
वह टूट गया तो टूट गया;
मदिरालय का आँगन देखो,
कितने प्याले हिल जाते हैं,
गिर मिट्टी में मिल जाते हैं,
जो गिरते हैं कब उठते हैं;
पर बोलो टूटे प्यालों पर
कब मदिरालय पछताता है!
जो बीत गई सो बात गई!

मृदु मिट्टी के हैं बने हुए,
मधुघट फूटा ही करते हैं,
लघु जीवन लेकर आए हैं,
प्याले टूटा ही करते हैं,
फिर भी मदिरालय के अंदर
 मधु के घट हैं, मधुप्याले हैं,
जो मादकता के मारे हैं
वे मधु लूटा ही करते हैं;
वह कच्चा पीने वाला है
 जिसकी ममता घट-प्यालों पर,
जो सच्चे मधु से जला हुआ
 कब रोता है, चिल्लाता है!
जो बीत गई सो बात गई!

भावार्थ- इसमें कवि हरिवंश राय बच्चन सांत्वना देते रिश्तों की नाजुक अवस्था का वर्णन करते हुए यह बताना चाहते हैं कि संसार में हर रिश्ता एक ना एक दिन समाप्त होना ही है। यह अस्थाई है इस पर किसी का जोर नहीं है।इसमें कवि हरिवंश राय बच्चन अनेक उदाहरण देकर कहते हैं कि जो बीत गई सो बात गई!

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दिन जल्दी-जल्दी ढलता है -हरिवंश राय बच्चन 

दिन जल्दी-जल्दी ढलता है!
हो जाय न पथ में रात कहीं,
मंज़िल भी तो है दूर नहीं
यह सोच थका दिन का पंथी भी जल्दी-जल्दी चलता है!
दिन जल्दी-जल्दी ढलता है!
बच्चे प्रत्याशा में होंगे,
नीड़ों से झाँक रहे होंगॆ
 यह ध्यान परों में चिड़ियों के भरता कितनी चंचलता है!
दिन जल्दी-जल्दी ढलता है!
मुझसे मिलने को कौन विकल?
मैं होऊँ किसके हित चंचल?
यह प्रश्न शिथिल करता पद को, भरता उर में विह्वलता है!
दिन जल्दी-जल्दी ढलता है!

भावार्थ – इसमें कवि हरिवंश राय बच्चन पथिक के थके होने के बावजूद उमंग और उत्साह की बात करता है। जब पथिक घर लौटता है बहुत थका हुआ होता है लेकिन अपनों से मिलने की चाहत उसे जल्दी जल्दी चलने के लिए उत्साहित करती है। पथिक यही सोच कर चलता है की मंजिल बस आने ही वाली है और वह निरंतर चलता रहता है। इसी भावार्थ के साथ कवि हरिवंश राय बच्चन कहते हैं-दिन जल्दी जल्दी ढलता है।

हिम्मत करने वालों की कभी हार नही होती.. -हरिवंश राय बच्चन

लहरों से डरकर नौका पार नहीं होती…
हिम्मत करने वालों की कभी हार नहीं होती…
नन्ही चींटीं जब दाना लेकर चढ़ती है…
चढ़ती दीवारों पर सौ बार फ़िसलती है…
मन का विश्वास रगों में साहस भरता है…
चढ़कर गिरना, गिरकर चढ़ना, ना अखरता है…
मेहनत उसकी बेकार हर बार नहीं होती…
हिम्मत करने वालों की कभी हार नहीं होती…
डुबकियां सिंधु में गोताखोर लगाता है…
जा जा कर ख़ाली हाथ लौटकर आता है..
मिलते ना सहज ही मोती गहरे पानी में…
बढ़ता दूना विश्वास इसी हैरानी में…
मुट्ठी उसकी ख़ाली हर बार नहीं होती…
हिम्मत करने वालों की कभी हार नहीं होती…
असफलता एक चुनौती है… स्वीकार करो…
क्या कमी रह गयी, देखो और सुधार करो…
जब तक ना सफल हो नींद-चैन को त्यागो तुम…
संघर्षों का मैदान छोड़ मत भागो तुम…
कुछ किये बिना ही जयजयकार नहीं होती…
हिम्मत करने वालों की कभी हार नहीं होती…

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मैथिलीशरण गुप्त: Motivational poems in Hindi

Motivational Poems in Hindi
Source – Aaj ka Bharat

कवि परिचय-राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त ( 3 अगस्त 1886 – 12 दिसम्बर 1964) हिन्दी के प्रसिद्ध कवि थे। हिन्दी साहित्य के इतिहास में वे खड़ी बोली के प्रथम महत्त्वपूर्ण कवि हैं।उन्हें साहित्य जगत में ‘दद्दा’ नाम से सम्बोधित किया जाता था। उनकी कृति भारत-भारती (1912) भारत के स्वतन्त्रता संग्राम के समय में काफी प्रभावशाली सिद्ध हुई थी और और इसी कारण महात्मा गांधी ने उन्हें ‘राष्ट्रकवि’ की पदवी भी दी थी। उनकी जयन्ती 3 अगस्त को हर वर्ष ‘कवि दिवस’ के रूप में मनाया जाता है। सन 1954 में भारत सरकार ने उन्हें पद्मभूषण से सम्मानित किया।

मनुष्यता -मैथिलीशरण गुप्त

विचार लो कि मर्त्य हो न मृत्यु से डरो कभी¸|
मरो परन्तु यों मरो कि याद जो करे सभी।
 हुई न यों सु–मृत्यु तो वृथा मरे¸ वृथा जिये¸
मरा नहीं वहीं कि जो जिया न आपके लिए।
 यही पशु–प्रवृत्ति है कि आप आप ही चरे¸
वही मनुष्य है कि जो मनुष्य के लिए मरे।।

 उसी उदार की कथा सरस्वती बखानवी¸
उसी उदार से धरा कृतार्थ भाव मानती।
 उसी उदार की सदा सजीव कीर्ति कूजती;
तथा उसी उदार को समस्त सृष्टि पूजती।
 अखण्ड आत्मभाव जो असीम विश्व में भरे¸
वही मनुष्य है कि जो मनुष्य के लिये मरे।।

 सहानुभूति चाहिए¸ महाविभूति है वही;
वशीकृता सदैव है बनी हुई स्वयं मही।
 विरूद्धवाद बुद्ध का दया–प्रवाह में बहा¸
विनीत लोकवर्ग क्या न सामने झुका रहे?
अहा! वही उदार है परोपकार जो करे¸
वहीं मनुष्य है कि जो मनुष्य के लिए मरे।।

 अनंत अंतरिक्ष में अनंत देव हैं खड़े¸
समक्ष ही स्वबाहु जो बढ़ा रहे बड़े–बड़े।
 परस्परावलम्ब से उठो तथा बढ़ो सभी¸
अभी अमर्त्य–अंक में अपंक हो चढ़ो सभी।
 रहो न यों कि एक से न काम और का सरे¸
वही मनुष्य है कि जो मनुष्य के लिए मरे।।

मनुष्य मात्र बन्धु है यही बड़ा विवेक है¸
पुराणपुरूष स्वयंभू पिता प्रसिद्ध एक है।
 फलानुसार कर्म के अवश्य बाह्य भेद है¸
परंतु अंतरैक्य में प्रमाणभूत वेद हैं।
 अनर्थ है कि बंधु हो न बंधु की व्यथा हरे¸
वही मनुष्य है कि जो मनुष्य के लिए मरे।।

 चलो अभीष्ट मार्ग में सहर्ष खेलते हुए¸
विपत्ति विप्र जो पड़ें उन्हें ढकेलते हुए।
 घटे न हेल मेल हाँ¸ बढ़े न भिन्नता कभी¸
अतर्क एक पंथ के सतर्क पंथ हों सभी।
 तभी समर्थ भाव है कि तारता हुआ तरे
वही मनुष्य है कि जो मनुष्य के लिए मरे।।

 रहो न भूल के कभी मदांध तुच्छ वित्त में
 संत जन आपको करो न गर्व चित्त में
 अन्त को है यहाँ त्रिलोकनाथ साथ में
 दयालु दीन बन्धु के बडे विशाल हाथ हैं
 अतीव भाग्यहीन है अंधेर भाव जो भरे
वही मनुष्य है कि जो मनुष्य के लिए मरे।।

भावार्थ-इस कविता के माध्यम से कवि मैथिलीशरण गुप्त मनुष्यता का सही अर्थ समझाना चाहते हैं। वह इस कविता के माध्यम से कहना चाहते हैं कि व्यक्ति का जीना मरना अर्थहीन है स्वार्थी व्यक्ति सिर्फ स्वार्थ के लिए जीता और मरता है। जिस प्रकार से पशु का अस्तित्व सिर्फ जीवन जीने जितना होता है मनुष्य का जीवन में ऐसा नहीं होना चाहिए। मनुष्य जाति को अपने जीवन में इस प्रकार के काम करने चाहिए कि मरने के बाद भी वर्तमान मनुष्य जाति या आने वाली जाति उन्हें याद करें। और हमारे मन में कभी भी मृत्यु का भय नहीं सताना चाहिए।

नर हो, न निराश करो मन को -मैथिलीशरण गुप्त

नर हो, न निराश करो मन को
 कुछ काम करो, कुछ काम करो
 जग में रहकर कुछ नाम करो
 यह जन्म हुआ किस अर्थ अहो
 समझो जिसमें यह व्यर्थ न हो
 कुछ तो उपयुक्त करो तन को
 नर हो, न निराश करो मन को
 संभलों कि सुयोग न जाय चला
 कब व्यर्थ हुआ सदुपाय भला
 समझो जग को न निरा सपना
 पथ आप प्रशस्त करो अपना
 अखिलेश्वर है अवलंबन को
 नर हो, न निराश करो मन को
 जब प्राप्त तुम्हें सब तत्त्व यहाँ
 फिर जा सकता वह सत्त्व कहाँ
 तुम स्वत्त्व सुधा रस पान करो
 उठके अमरत्व विधान करो
 दवरूप रहो भव कानन को
 नर हो न निराश करो मन को
 निज़ गौरव का नित ज्ञान रहे
 हम भी कुछ हैं यह ध्यान रहे
 मरणोंत्‍तर गुंजित गान रहे
 सब जाय अभी पर मान रहे
 कुछ हो न तज़ो निज साधन को
 नर हो, न निराश करो मन को
 प्रभु ने तुमको दान किए
 सब वांछित वस्तु विधान किए
 तुम प्राप्‍त करो उनको न अहो
 फिर है यह किसका दोष कहो
 समझो न अलभ्य किसी धन को
 नर हो, न निराश करो मन को
 किस गौरव के तुम योग्य नहीं
 कब कौन तुम्हें सुख भोग्य नहीं
 जान हो तुम भी जगदीश्वर के
 सब है जिसके अपने घर के
 फिर दुर्लभ क्या उसके जन को
 नर हो, न निराश करो मन को
 करके विधि वाद न खेद करो
 निज़ लक्ष्य निरन्तर भेद करो
 बनता बस उद्‌यम ही विधि है
 मिलती जिससे सुख की निधि है
 समझो धिक् निष्क्रिय जीवन को
 नर हो, न निराश करो मन को
कुछ काम करो, कुछ काम करो

भावार्थ- निराशा हमें मिट्टी के समान बना देती है। इस कविता के माध्यम से कवि मैथिलीशरण गुप्त बोलते हैं कि नर हो ना निराश करो मन को। इसका अर्थ यह है कि कुछ ऐसा कीजिए कि मानव जाति का या आपका संसार में नाम हो, निराश होकर मत बैठो और मनुष्य जीवन को व्यर्थ मत कीजिए। मन से प्रयास करने से सारी विपदा दूर हो जाती है। इसमें वह कहना चाहते हैं कि देर मत करो अन्यथा अवसर हाथ से निकल जाएंगे।

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प्रतिशोध -मैथिलीशरण गुप्त

किसी जन ने किसी से क्लेश पाया
 नबी के पास वह अभियोग लाया।
 मुझे आज्ञा मिले प्रतिशोध लूँ मैं।
 नहीं निःशक्त वा निर्बोध हूँ मैं।
उन्होंने शांत कर उसको कहा यो
स्वजन मेरे न आतुर हो अहा यों।
चले भी तो कहाँ तुम वैर लेने
स्वयं भी घात पाकर घात देने
क्षमा कर दो उसे मैं तो कहूंगा
तुम्हारे शील का साक्षी रहूंगा
दिखावो बंधु क्रम-विक्रम नया तुम
यहाँ देकर वहाँ पाओ दया तुम।

भावार्थ-इस कविता में कवि मैथिलीशरण गुप्त स्वयं प्रतिशोध लेने के लिए कहते हैं। इस कविता में क्षमा भाव दिखाने के लिए कहते हैं। और आपस में बंधुता दिखाकर दया दूसरे के मन में ला सकते हैं।

अटल बिहारी वाजपेयी: Motivational Poem in Hindi

कवि परिचय-अटल बिहारी वाजपेयी (25 दिसंबर 1924 – 16 अगस्त 2018) भारत के दो बार के प्रधानमंत्री थे। वे पहले 16 मई से 1 जून 1996 तक, तथा फिर 19 मार्च 1998 से 22 मई 2004 तक भारत के प्रधानमंत्री रहे।वे हिंदी कवि, पत्रकार व एक प्रखर वक्ता थे।वे भारतीय जनसंघ के संस्थापकों में एक थे, और 1968 से 1973 तक उसके अध्यक्ष भी रहे। उन्होंने लंबे समय तक राष्‍ट्रधर्म, पाञ्चजन्य और वीर अर्जुन आदि राष्ट्रीय भावना से ओत-प्रोत अनेक पत्र-पत्रिकाओं का संपादन भी किया।

आओ फिर से दिया जलाएँ -अटल बिहारी वाजपेयी

आओ फिर से दिया जलाएँ
 भरी दुपहरी में अंधियारा
 सूरज परछाई से हारा
 अंतरतम का नेह निचोड़ें-
बुझी हुई बाती सुलगाएँ।
 हम पड़ाव को समझे मंज़िल
 लक्ष्य हुआ आंखों से ओझल
 वतर्मान के मोहजाल में-
आने वाला कल न भुलाएँ।
 आओ फिर से दिया जलाएँ।
 आहुति बाकी यज्ञ अधूरा
 अपनों के विघ्नों ने घेरा
 अंतिम जय का वज़्र बनाने-
नव दधीचि हड्डियां गलाएँ।
आओ फिर से दिया जलाएँ

भावार्थ- इस कविता के माध्यम से कवि अटल बिहारी वाजपेई कहना चाहते हैं कि युवावस्था में व्यक्ति स्वस्थ और शक्तिशाली और उमंग,उल्लास और जोश से भरा होता है। इस अवस्था में हमें कभी हार नहीं माननी चाहिए।उन्होंने युवाओं की तुलना सूरत से करते हुए कहा है कि युवाओं का जीवन कठिनाइयों के सामने हारना मानो सूर्य का परचाई से हारना है। इसलिए आशा के बुझे हुए दीपक की बाती को सुलझाना होगा अर्थात उम्मीद का नया दिया फिर से जलाना होगा।

क़दम मिला कर चलना होगा -अटल बिहारी वाजपेयी

Source: UrBro MohitBaneta

बाधाएँ आती हैं आएँ
घिरें प्रलय की घोर घटाएँ,
पावों के नीचे अंगारे,
सिर पर बरसें यदि ज्वालाएँ,
निज हाथों में हँसते-हँसते,
आग लगाकर जलना होगा।
क़दम मिलाकर चलना होगा।
हास्य-रूदन में, तूफ़ानों में,
अगर असंख्यक बलिदानों में,
उद्यानों में, वीरानों में,
अपमानों में, सम्मानों में,
उन्नत मस्तक, उभरा सीना,
पीड़ाओं में पलना होगा।
 क़दम मिलाकर चलना होगा।
उजियारे में, अंधकार में,
कल कहार में, बीच धार में,
घोर घृणा में, पूत प्यार में,
क्षणिक जीत में, दीर्घ हार में,
जीवन के शत-शत आकर्षक,
अरमानों को ढलना होगा।
 क़दम मिलाकर चलना होगा।
सम्मुख फैला अगर ध्येय पथ,
प्रगति चिरंतन कैसा इति अब,
सुस्मित हर्षित कैसा श्रम श्लथ,
असफल, सफल समान मनोरथ,
सब कुछ देकर कुछ न मांगते,
पावस बनकर ढ़लना होगा। 
क़दम मिलाकर चलना होगा।
कुछ काँटों से सज्जित जीवन,
प्रखर प्यार से वंचित यौवन,
नीरवता से मुखरित मधुबन,
परहित अर्पित अपना तन-मन,
जीवन को शत-शत आहुति में,
जलना होगा, गलना होगा।
क़दम मिलाकर चलना होगा।

भावार्थ-कविता अटल बिहारी वाजपेयी समझाना चाहते हैं कि एक बेहतर कल के लिए, कठिनाइयों के बावजूद, देशवासियों से एक साथ चलना होगा|जितनी बाधाएं और मुश्किलें  आती रहेंगी ।पांवों के नीचे अंगारे भी होंगे, सिर पर बरसें यदि ज्वालाएं हमें या साथ हाथ-हाथ से मिलाकर हंसते-हंसते, भय को दूर भगाकर कदम मिलाकर चलना होगा| तूफ़ानों में, अपमानों में, सम्मानों में, पीड़ाओं का सामना करने पर भी कदम मिलाकर चलना होगा। विपत्तियों को हराकर आगे बढ़ने की प्रेरणा दी है डरना नहीं हिम्मत नहीं हारनी है।

प्रदीप: Motivational Poem in Hindi

Motivational Poems in Hindi
Source – भारतकोश

कवि परिचय-कवि प्रदीप (6 फ़रवरी 1915 – 11 दिसम्बर 1998) भारतीय कवि एवं गीतकार थे जो देशभक्ति गीत ऐ मेरे वतन के लोगों की रचना के लिए प्रसिद्ध हैं। उन्होंने 1962 के भारत-चीन युद्ध के दौरान शहीद हुए सैनिकों की श्रद्धांजलि में ये गीत लिखा था। लता मंगेशकर द्वारा गाए इस गीत का तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू की उपस्थिति में 26 जनवरी 1963 को दिल्ली के रामलीला मैदान में सीधा प्रसारण किया गया।

हम लाये हैं तूफ़ान से किश्ती निकाल के | प्रदीप 

हम लाये हैं तूफ़ान से किश्ती निकाल क
पासे सभी उलट गए दुश्मन की चाल के
अक्षर सभी पलट गए भारत के भाल के
 मंजिल पे आया मुल्क हर बला को टाल के
 सदियों के बाद फ़िर उड़े बादल गुलाल के
 हम लाये हैं तूफ़ान से किश्ती निकाल के
 इस देश को रखना मेरे बच्चों संभाल के

तुम ही भविष्य हो मेरे भारत विशाल के
इस देश को रखना मेरे बच्चों संभाल के
 देखो कहीं बरबाद न होवे ये बगीचा 
 इसको हृदय के खून से बापू ने है सींचा
 रक्खा है ये चिराग़ शहीदों ने बाल के
 इस देश को रखना मेरे बच्चों संभाल के
 दुनियाँ के दांव पेंच से रखना न वास्ता 
मंजिल तुम्हारी दूर है लंबा है रास्ता 
 भटका न दे कोई तुम्हें धोखे में डाल के
 इस देश को रखना मेरे बच्चों संभाल के
एटम बमों के जोर पे ऐंठी है ये दुनियाँ 

 बारूद के इक ढेर पे बैठी है ये दुनियाँ
 तुम हर कदम उठाना जरा देखभाल के
 इस देश को रखना मेरे बच्चों संभाल के
आराम की तुम भूल-भुलैया में न भूलो 
सपनों के हिंडोलों में मगन हो के न झूलो 
अब वक़्त आ गया मेरे हंसते हुए फूलों 
उठो छलांग मार के आकाश को छू लो
तुम गाड़ दो गगन में तिरंगा उछाल के 
इस देश को रखना मेरे बच्चों संभाल के

भावार्थ-इसमें कवि प्रदीप जी ने अपने देश के प्रति देश भक्ति और प्रेम को प्रदर्शित किया है। इस कविता में युवाओं के मन में देशभक्ति जागृत करने का भाव प्रकट होता है। कि देश के नए युवा उठे और देश की रक्षा के लिए समर्पण भाव अपने मन में जागृत करें।

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रवीन्द्रनाथ टैगोर: Motivational Poem in Hindi

Motivational Poems in Hindi
Source – विकिपीडिया

जीवन परिचय– रवींद्रनाथ टैगोर(7मई1861-07 अगस्त 1941)विश्वविख्यात कवि, साहित्यकार, दार्शनिक और भारतीय साहित्य के नोबल पुरस्कार विजेता हैं। उन्हें गुरुदेव के नाम से भी जाना जाता है। बांग्ला साहित्य के माध्यम से भारतीय सांस्कृतिक चेतना में नयी जान फूँकने वाले युगदृष्टा थे। वे एशिया के प्रथम नोबेल पुरस्कार सम्मानित व्यक्ति हैं। वे एकमात्र कवि हैं जिसकी दो रचनाएँ दो देशों का राष्ट्रगान बनीं – भारत का राष्ट्र-गान ‘जन गण मन’ और बाँग्लादेश का राष्ट्रीय गान ‘आमार सोनार बाँग्ला’ गुरुदेव की ही रचनाएँ हैं।

मन जहां डर से परे है

“मन जहां डर से परे है और सिर जहां ऊंचा है;
ज्ञान जहां मुक्त है और जहां दुनिया को
संकीर्ण घरेलू दीवारों से छोटे छोटे टुकड़ों में बांटा नहीं गया है;
जहां शब्द सच की गहराइयों से निकलते हैं, जहां थकी हुई प्रयासरत बांहें
त्रुटि हीनता की तलाश में हैं, जहां कारण की स्पष्ट धारा है
जो सुनसान रेतीले मृत आदत के,वीराने में अपना रास्ता खो नहीं चुकी है;
जहां मन हमेशा व्यापक होते विचार और सक्रियता में, तुम्हारे जरिए आगे चलता है
और आजादी के स्वर्ग में पहुंच जाता है,ओ पिता परमेश्वर
मेरे देश को जागृत बनाओ”

भावार्थ- रवींद्रनाथ टैगोर ने इस कविता में सपनों के भारत का वर्णन किया है। इसमें कवि ऐसे भारत का वर्णन कर रहे हैं जिसमें कोई भी अपने स्वार्थ के लिए झूठ ना बोले। जहां ज्ञान को जाति और धर्म के नाम पर बांटा ना जाए। आजादी के बाद जो भारत किस सोच में बदलाव हो गया है सब अपने स्वार्थ के लिए जिंदा है यह सब भाव और अपने मन से हीनता का भाव भुला भुला दो मेरे देश के वासियों यह कवि कहना चाहते हैं।

Source: motivational point

Makhanlal Chaturvedi (माखनलाल चतुर्वेदी)

नाम माखनलाल चतुर्वेदी
पेशा लेखक,साहित्यकार,कवि,पत्रकार
साहित्य का प्रकार नव-छायाकार
जन्मदिन 4 अप्रैल 1889 को
जन्मस्थान मध्य प्रदेश के होशंगाबाद जिले के बवाई गाँव में
लेख ‘वेणु लो गूंजे धरा’,हिम कीर्तिनी,हिम तरंगिणी,युग चरण,साहित्य देवता
कविताएं अमर राष्ट्र, अंजलि के फूल गिरे जाते हैं, आज नयन के बंगले में, इस तरह ढक्कन लगाया रात ने, उस प्रभात तू बात ना माने, किरणों की शाला बंद हो गई छुप-छुप, कुञ्ज-कुटीरे यमुना तीरे, गली में गरिमा घोल-घोल, भाई-छेड़ो नहीं मुझे, मधुर-मधुर कुछ गा दो मालिक,संध्या के बस दो बोल सुहाने लगते हैं.
सम्मान 1955 में साहित्यिक अकादमी अवार्ड 
1963 में पद्म भूषण सम्मान
उन्हें समर्पित सम्मान मध्य प्रदेश साहित्य अकादमी द्वारा देश के श्रेष्ठ कवियों को माखनलाल चतुर्वेदी पुरस्कार”दिया जाता है 
उनके नाम पर माखन लाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता विश्वविद्यालय उनके नाम पर पोस्टेज स्टाम्प ज़ारी किये गए।

माखनलाल चतुर्वेदी के साहित्य की विधा में दिए योगदान के कारण उन्हें बहुत सारी यूनिवर्सिटी ने विविध अवार्ड के नाम उनके नाम पर रखे गए हैं ।मध्य प्रदेश सांस्कृतिक कौंसिल  द्वारा नियंत्रित मध्य प्रदेश साहित्य अकादमी देश की किसी भी भाषा में योग्य कवियों को “माखनलाल चतुर्वेदी पुरस्कार” देती हैं। पंडित जी की मृत्यु के 19 वर्ष बाद 1987 से यह सम्मान देना शुरू किया गया है। साथ ही भोपाल,मध्य प्रदेश में स्थित माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता विश्वविद्यालय पूरे एशिया में अपने प्रकार का पहला विश्वविद्यालय हैं। इसकी स्थापना पंडित जी के राष्ट्रीय स्वाधीनता संग्राम में पत्रकारिता और लेखन के द्वारा दिए योगदान को सम्मान देते हुए उनकी यादागिरी में 1991 में हुई। पंडित जी मखन लाल चतुर्वेदी को सम्मान करते हुए भारत के पोस्ट और टेलीग्राफ डिपार्टमेंट ने पोस्टल स्टाम्प की शुरुआत की।यह स्टाम्प पंडितजी के 88वें जन्मदिन 4 अप्रैल 1977 को ज़ारी हुआ।

माखनलाल चतुर्वेदी की कविताएं

एक तुम हो

गगन पर दो सितारे: एक तुम हो,
धरा पर दो चरण हैं: एक तुम हो,
‘त्रिवेणी’ दो नदी हैं! एक तुम हो,
हिमालय दो शिखर है: एक तुम हो,
रहे साक्षी लहरता सिंधु मेरा,
कि भारत हो धरा का बिंदु मेरा ।
कला के जोड़-सी जग-गुत्थियाँ ये,
हृदय के होड़-सी दृढ वृत्तियाँ ये,
तिरंगे की तरंगों पर चढ़ाते,
कि शत-शत ज्वार तेरे पास आते ।
तुझे सौगंध है घनश्याम की आ,
तुझे सौगंध भारत-धाम की आ,
तुझे सौगंध सेवा-ग्राम की आ,
कि आ, आकर उजड़तों को बचा, आ ।
तुम्हारी यातनाएँ और अणिमा,
तुम्हारी कल्पनाएँ और लघिमा,
तुम्हारी गगन-भेदी गूँज, गरिमा,
तुम्हारे बोल ! भू की दिव्य महिमा
तुम्हारी जीभ के पैंरो महावर,
तुम्हारी अस्ति पर दो युग निछावर ।
रहे मन-भेद तेरा और मेरा, अमर हो देश का कल का सबेरा,
कि वह कश्मीर, वह नेपाल; गोवा; कि साक्षी वह जवाहर, यह विनोबा,
प्रलय की आह युग है, वाह तुम हो,
जरा-से किंतु लापरवाह तुम हो।
मैं अपने से डरती हूँ सखि !
पल पर पल चढ़ते जाते हैं,
पद-आहट बिन, रो! चुपचाप
बिना बुलाये आते हैं दिन,
मास, वरस ये अपने-आप;
लोग कहें चढ़ चली उमर में
पर मैं नित्य उतरती हूँ सखि !

makhanlal-chautarvedi
Source – Sahityakalp

मैं अपने से डरती हूँ सखि !

मैं बढ़ती हूँ? हाँ; हरि जानें
यह मेरा अपराध नहीं है,
उतर पड़ूँ यौवन के रथ से
ऐसी मेरी साध नहीं है;
लोग कहें आँखें भर आईं,
मैं नयनों से झरती हूँ सखि !
मैं अपने से डरती हूँ सखि !
किसके पंखों पर, भागी
जाती हैं मेरी नन्हीं साँसें ?
कौन छिपा जाता है मेरी
साँसों में अनगिनी उसाँसें ?
लोग कहें उन पर मरती है
मैं लख उन्हें उभरती हूँ सखि !
मैं अपने से डरती हूँ सखि  !
सूरज से बेदाग, चाँद से
रहे अछूती, मंगल-वेला,
खेला करे वही प्राणों में,
जो उस दिन प्राणों पर खेला,
लोग कहें उन आँखों डूबी,
मैं उन आँखों तरती हूँ सखि !
मैं अपने से डरती हूँ सखि !
जब से बने प्राण के बन्धन,
छूट गए गठ-बन्धन रानी,
लिखने के पहले बन बैठी,
मैं ही उनकी प्रथम कहानी,
लोग कहें आँखें बहती हैं;
उनके चरण भिगोने आयें,
जिस दिन शैल-शिखिरियाँ उनको
रजत मुकुट पहनाने आयें,
लोग कहें, मैं चढ़ न सकूँगी-
बोझीली; प्रण करती हूँ सखि !
मैं नर्मदा बनी उनके,
प्राणों पर नित्य लहरती हूँ सखि !
मैं अपने से डरती हूँ सखि !

सूर्यकांत त्रिपाठी निराला Suryakant Tripathi Nirala

सूर्यकांत त्रिपाठी निराला
सूर्यकांत त्रिपाठी निराला
पूरा नाम सूर्यकान्त त्रिपाठी निराला
अन्य नाम निराला
जन्म 21 फ़रवरी, 1896
जन्म भूमि मेदनीपुर ज़िला, बंगाल (पश्चिम बंगाल)
मृत्यु 15 अक्टूबर, सन् 1961
मृत्यु स्थान प्रयाग, भारत
अभिभावक पं. रामसहाय
पति/पत्नी मनोहरा देवी
कर्म भूमि भारत
कर्म-क्षेत्र साहित्यकार
मुख्य रचनाएँ परिमल, गीतिका, तुलसीदास (खण्डकाव्य) आदि
विषय कविता, खंडकाव्य, निबंध, समीक्षा
भाषा हिन्दी, बंगला, अंग्रेज़ी और संस्कृत भाषा
प्रसिद्धि कवि, उपन्यासकार, निबन्धकार और कहानीकार
नागरिकता भारतीय
  • उनकी सबसे पहली कविता जन्मभूमि प्रभा नामक मासिक पत्र  1920 जून में प्रकाशित हुई ।
  • इनकी सबसे पहली कविता संग्रह 1923 अनामिका प्रकाशित हुई थी।
  • 1920 अक्टूबर में सबसे पहला निबंध बंग भाषा का उच्चारण मासिक पत्रिका सरस्वती में प्रकाशित हुई थी।

सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’ की रचनाएं

काव्य संग्रह–

  • अनामिका (1923)
  • परिमल (1930)
  • गीतिका (1936)
  • अनामिका (द्वितीय)
  • तुलसीदास (1939)
  • कुकुरमुत्ता (1942)
  • अणिमा (1943)
  • बेला (1946)
  • नये पत्ते (1946)
  • अर्चना(1950)
  • आराधना (1953)
  • गीत कुंज (1954)
  • सांध्य काकली
  • अपरा (संचयन)

उपन्यास–

  • अप्सरा (1931)
  • अलका (1933)
  • प्रभावती (1936)
  • निरुपमा (1936)
  • कुल्ली भाट (1938-39)
  • बिल्लेसुर बकरिहा (1942)
  • चोटी की पकड़ (1946)
  • काले कारनामे (1950)
  • चमेली
  • इन्दुलेखा

कहानी संग्रह

  • लिली (1934)
  • सखी (1935)
  • सुकुल की बीवी (1941)
  • चतुरी चमार (1945)
  • देवी (1948)

निबंध–

  • रवीन्द्र कविता कानन (1929)
  • प्रबंध पद्म (1934)
  • प्रबंध प्रतिमा (1940)
  • चाबुक (1942)
  • चयन (1957)
  • संग्रह (1963)

कहानी संग्रह–

  • लिली (1934)
  • सखी (1935)
  • सुकुल की बीवी (1941)
  • चतुरी चमार (1945)
  • देवी (1948)

पुरस्कार एवं सम्मान | Suryakant Tripathi (Nirala) Awards

सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’ को उनके मरणोपरांत भारत का प्रतिष्ठित सम्मान “पद्मभूषण“ से सम्मानित किया गया।

जयशंकर प्रसाद (Jay Shankar Prasad)

जयशंकर प्रसाद का जीवन परिचय कक्षा 10
Source – Hindi.com
पूरा नाम महाकवि जयशंकर प्रसाद
जन्म 30 जनवरी, 1889 ई.
जन्म भूमि वाराणसी, उत्तर प्रदेश
मृत्यु 15 नवम्बर, सन् 1937 (आयु- 48 वर्ष)
मृत्यु स्थान वाराणसी, उत्तर प्रदेश
अभिभावक देवीप्रसाद साहु
कर्म भूमि वाराणसी
कर्म-क्षेत्र उपन्यासकार, नाटककार, कवि
मुख्य रचनाएँ चित्राधार, कामायनी, आँसू, लहर, झरना, एक घूँट, विशाख, अजातशत्रु, आकाशदीप, आँधी, ध्रुवस्वामिनी, तितली और कंकाल
विषय कविता, उपन्यास, नाटक और निबन्ध
भाषा हिंदी, ब्रजभाषा, खड़ी बोली
नागरिकता भारतीय
शैली वर्णनात्मक, भावात्मक, आलंकारिक, सूक्तिपरक, प्रतीकात्मक

मोटिवेशनल पोएम इन हिंदी में जयशंकर प्रसाद हिन्दी कहानियाँ

  • अघोरी का मोह
  • अनबोला
  • अपराधी
  • अमिट स्मृति
  • अशोक
  • आकाशदीप
  • आँधी
  • इंद्रजाल
  • उर्वशी
  • उस पार का योगी
  • करुणा की विजय
  • कला
  • कलावती की शिक्षा
  • खंडहर की लिपि
  • ग्राम
  • ग्राम-गीत
  • गुदड़ी में लाल
  • गुंडा
  • गुलाम
  • गूदड़ साईं
  • घीसू
  • चक्रवर्ती का स्तम्भ
  • चंदा
  • चित्र-मंदिर
  • चित्रवाले पत्थर
  • चित्तौर-उद्धार
  • चूड़ीवाली
  • छोटा जादूगर
  • जहाँआरा
  • ज्योतिष्मती
  • तानसेन
  • दासी
  • दुखिया
  • देवदासी
  • देवरथ
  • नीरा
  • नूरी
  • पत्थर की पुकार
  • पंचायत
  • प्रणय-चिह्न
  • प्रतिध्वनि
  • प्रतिमा
  • प्रलय
  • प्रसाद
  • परिवर्तन
  • पाप की पराजय
  • पुरस्कार
  • बनजारा
  • बभ्रुवाहन
  • ब्रह्मर्षि
  • बिसाती
  • बेड़ी
  • भिखारिन
  • भीख में
  • मदन-मृणालिनी
  • मधुआ
  • ममता
  • रमला
  • रसिया बालम
  • रूप की छाया
  • व्रत-भंग
  • विजया
  • विराम-चिह्न
  • वैरागी
  • शरणागत
  • संदेह
  • समुद्र-संतरण
  • सलीम
  • सहयोग
  • स्वर्ग के खंडहर में
  • सालवती
  • सिकंदर की शपथ
  • सुनहला साँप
  • हिमालय का पथिक

नरेंद्र वर्मा की Poem

कोने में बैठ कर क्यों रोता है
कोने में बैठ कर क्यों रोता है,
यू चुप चुप सा क्यों रहता है।
आगे बढ़ने से क्यों डरता है,
सपनों को बुनने से क्यों डरता है।
तकदीर को क्यों रोता है,
मेहनत से क्यों डरता है।
झूठे लोगो से क्यों डरता है,
कुछ खोने के डर से क्यों बैठा है।
हाथ नहीं होते नसीब होते है उनके भी,
तू मुट्ठी में बंद लकीरों को लेकर रोता है।
भानू भी करता है नित नई शुरुआत,
सांज होने के भय से नहीं डरता है।
मुसीबतों को देख कर क्यों डरता है,
तू लड़ने से क्यों पीछे हटता है।
किसने तुमको रोका है,
तुम्ही ने तुम को रोका है।
भर साहस और दम, बढ़ा कदम,
अब इससे अच्छा कोई न मौका है।

नरेंद्र वर्मा
Source – – भारतकोश

नरेंद्र वर्मा की मोटिवेशनल Poem

तुम मन की आवाज सुनो
तुम मन की आवाज सुनो,
जिंदा हो, ना शमशान बनो,
पीछे नहीं आगे देखो,
नई शुरुआत करो।
मंजिल नहीं, कर्म बदलो,
कुछ समझ ना आए,
तो गुरु का ध्यान करो,
तुम मन की आवाज सुनो।
लहरों की तरह किनारों से टकराकर,
मत लौट जाना फिर से सागर,
साहस में दम भरो फिर से,
तुम मन की आवाज सुनो।
सपनों को देखकर आंखें बंद मत करो,
कुछ काम करो,
सपनों को साकार करो,
तुम मन की आवाज सुनो।
इम्तिहान होगा हर मोड़ पर,
हार कर मत बैठ जाना किसी मोड़ पर,
तकदीर बदल जाएगी अगले मोड़ पर,
तुम अपने मन की आवाज सुनो।

आशा है, आपको यह मोटिवेशनल पोएम इन हिंदी अच्छी लगी होंगी।आपको यह ब्लॉग पसंद आया हो तो लाइक करें और कमेंट सेक्शन में हमें लिखकर बताएं तथा ज्यादा से ज्यादा शेयर करें। इसी तरह के बहुत आकर्षक और उपयोगी ब्लॉग Leverage Edu की वेबसाइट पर उपलब्ध है आप वहां से इसकी जानकारी ले सकते हैं तथा अध्ययन से संबंधित किसी भी प्रकार की जानकारी के लिए या विदेश में जाकर पढ़ाई करने के लिए यदि आपको कोई भी जानकारी चाहिए तो आप Leverage Edu से संपर्क कर सकते हैं।

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