मैथिलीशरण गुप्त की कविताएं

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मैथिलीशरण गुप्त की कविताएं

मैथिलीशरण गुप्त हिंदी खड़ बोली के महत्वपूर्ण और प्रसिद्धि कवि थे। उनकी कला और राष्ट्र प्रेम के कारण उन्हें राष्ट्र कवि का दर्जा प्राप्त है। उनकी कविताओं की विशेष बात ये भी थी वे खड़ी बोली में लिखने वाले पहले कवि थे जिसकी वजह से कवियों में उनका एक अलग स्थान रहा। मैथिलीशरण गुप्त की कविताओं ने स्वतंत्रा में बहुत बड़ा योगदान दिया है उनका देश के प्रति इसी अपार प्रेम के कारण उनके जन्म दिवस को राष्ट्र कवि दिवस के रूप मनाया जाता है। आज हम इस ब्लॉग के माध्यम से मैथिलीशरण गुप्त के जीवन परिचय , उनकी साहित्यिक और काव्यगत विशेषताएँ , मैथिलीशरण गुप्त कविताएं और उनकी रचनाओं के बारे में जानेंगे। मैथिलीशरण गुप्त बारे में यह सभी बातें जानने के लिए हमारे ब्लॉग को आखिर तक पढ़ें।

मैथिलीशरण गुप्त जीवन परिचय 

राष्ट्र कवि मैथिलीशरण गुप्त का जन्म झाँसी के चिरगाँव में 3 अगस्त, सन 1866 ई० में हुआ था। इनके पिताजी भी एक बेहतरीन कवी थे जिनसे प्रेरित होकर बचपन से ही मैथिलीशरण गुप्त की लेखन में रूचि हुई। मैथिलीशरण गुप्त की पढाई घर पर ही हुई जिसके साथ ही उन्होंने अपना लेखन भी जारी रखा। इन्होने हिंदी के अतिरिक्त बंगला ,मराठी भाषाओं का भी अध्ययन किया। जैसे जैसे समय बीता महावीर प्रसाद उनके प्रेरणास्तोत्र बन गए जिसकी झलक आपको उनके लेखन में भी देखने को मिल सकती है। मैथिलीशरण गुप्त ने अपने जीवन काल में अपने लेखन द्वारा कई लोगो को देश प्रेम के लिए प्रेरित किया और एक मज़बूत प्रभाव डाला। सन 1907 में अपनी पत्रिका सरस्वती में उनका पहली बार खड़ी बोली में “हेमंत शीर्षक” से प्रकाशित हुआ। ‘भारत-भारती’ उनकी बेहतरीन देश प्रेम में से एक है जो गुप्ता जी के स्वदेश प्रेम को दर्शाती है। मैथिलीशरण गुप्त जी की मृत्यु 12 दिसंबर 1964 को हृदय गति रुकने से हो गयी। इस प्रकार 78 वर्ष की अवस्था में हिन्दी साहित्य का जगमगाता सितारा सदा-सदा के लिए आस्थाचाल की ओट में छिप गया।  

साहित्यिक विशेषताएँ

  1. राष्ट्र भावना  :  मैथिलीशरण गुप्त जी का राष्ट्र प्रेम उनकी कविताओं में प्रदर्शित होता है। उन्होंने अपनी कविताओं में देश के गौरव, सौंदर्य का सुन्दर वर्णन किया है साथ ही वर्तमान की चुनौतियों के बारे में बताया है। यहाँ तक की उनकी ‘भारत भारती’ रचना भी इसी परिपेक्ष में है। इसी प्रकार ‘किसान’ कविता में उन्होंने देश के किसानों की दयनीय स्थिति पर प्रकाश डाला गया है | वे देश के युवाओं को राष्ट्रीय आंदोलन के लिए भी प्रेरित करते हैं |   
  1. नारी के प्रति दृष्टिकोण : मैथिलीशरण गुप्त जी का नारी को लेकर एक अलग दृष्टिकोण था जिसकी झलक उनके लेख द्वारा हमें देखने को मिलती है। उन्होंने अपनी अनेकों कविताओं में भारतीय नारियों को विशेष रूप से स्थान दिया है। जिसमें उन्होंने यशोधरा, उर्मिला व कैकयी जैसी उपेक्षित नारियों को भी अपने काव्य में स्थान दिया और उनको अलग प्रकार से चित्रित किया है। मैथिलीशरण गुप्त जी अपने काव्य में नारी के माँ, बहन और पत्नी के रूपों का वर्णन अधिक किया है। मैथिलीशरण गुप्त जी नारी के प्रति सहानुभूति प्रकट करते हुए कहते हैं –

“अबला जीवन हाय तेरी यही कहानी |
आंचल में है दूध और आँखों में पानी ||”

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मैथिलीशरण गुप्त की रचनाएँ

प्रमुख रचनाएँ प्रकाशन वर्ष 
रंग में भंग 1909 ई.
जयद्रथवध 1910 ई.
भारत भारती 1912 ई.
किसान 1917 ई.
शकुन्तला 1923 ई.
पंचवटी 1925 ई.
अनघ 1925 ई.
हिन्दू 1927 ई.
त्रिपथगा 1928 ई.
शक्ति 1928 ई.
गुरुकुल 1929 ई.
विकट भट 1929 ई.
साकेत 1931 ई.
यशोधरा 1933 ई.
द्वापर 1936 ई.
सिद्धराज 1936 ई.
नहुष 1940 ई.
कुणालगीत 1942 ई.
काबा और कर्बला 1942 ई.
पृथ्वीपुत्र 1950 ई.
प्रदक्षिणा 1950 ई.
जयभारत 1952 ई.
विष्णुप्रिया 1957 ई.
अर्जन और विसर्जन 1942 ई.
झंकार 1929 ई

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मैथिलीशरण गुप्त कविताएं-1

भावार्थ :- जब सिद्धार्थ ज्ञान प्राप्ति के कारण यशोधरा और अपने पुत्र राहुल को रात्रि में सोता हुआ छोड़ जाते है। इसकी कविता में यशोधरा अपनी सखी से कहती है कि अगर वो मुझे बताकर जाते तो मै उनके मार्ग में कभी बाधा नहीं डालती।  उसे दुःख है कि उसे बताकर जाते तो वो सहयोग करती। उसका कहना है उनके वन जाकर सिद्धि पाने का निर्णय अच्छा था। यशोधरा कहती है कि वो जानती है कि वो वापस आएंगे।

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मैथिलीशरण गुप्त कविताएं-2

भावार्थ :- कवि कहना चाहता है कि प्यार की उत्पत्ति न केवल एक तरफ है, दोनों लोगों के बीच प्यार दोनों पक्षों से जागृत हो गया है। पतंग और कवि रोशनी के उदाहरण दें, “कैटरपिलर जो रोशनी में अपना जीवन देते समय अपने जीवन की परवाह नहीं करता है, वैसे ही रोशनी आ जाएगी और अपनी रुचि को जानने के बाद मर जाएगी। कवि कहते हैं कि यह वास्तविक दुनिया में होता है|

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मैथिलीशरण गुप्त कविताएं-3

भावार्थ:- मनुष्यता कविता में कवि मैथिलीशरण गुप्त जी ने उसी व्यक्ति को मनुष्य माना है, जो केवल अपने लिए ही नहीं, बल्कि दूसरों के हित के लिए भी जीते-मरते हैं। ऐसे मनुष्य को मृत्यु के बाद भी उसके अच्छे कर्मों के लिए युगों-युगों तक याद किया जाता है, इस प्रकार, परोपकारी मनुष्य मर कर भी दुनिया में अमर हो जाता है।

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मैथिलीशरण गुप्त कविताएं-4

भावार्थ:-कवी कहते है की चन्द्रम की सुन्दर किरणे जल थल में फैली हुई है। जिसे देखर ऐसा लगता है जैसे कोई मोती के समान चादर बिछी हुई है। धरती पर फैली हरी घास तिनको के माध्यम से अपनी प्रसन्नता प्रकट कर रही है। धीमी सुगन्धित वायु चल रही है जिसके कारण पेड़ धीरे – धीरे हिल रहे है। लक्ष्मण को देखते हुए, कवि ने कहा कि इस युवा व्यक्ति जिसने बहादुर व्यक्ति को अपनी नींद की कीमत पर साधना में अवशोषित किया था? इस कुटीर की रक्षा के लिए शरीर की देखभाल नहीं कर रहा है, अर्थात् उसका शरीर आराम नहीं करता है और सभी प्रकार से अपने दिमाग को इस कुटि की रक्षा करने के लिए झोंक दिया है। लक्ष्मण ने पंचवती की प्रकृति की सुंदरता को देखते हुए अपने दिमाग में सोचा कि यहां एक साफ और उज्ज्वल चांदनी थी और रात बहुत शांत थी। साफ, सुगंधित धीमी हवा है।

Source –
Hindi Kavita

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मैथिलीशरण गुप्त कविताएं-5

भावार्थ: इस कविता में जीवन के संघर्षों से निराश हो चुके लोगों से कवी कहते हैं-अपने मन को निराश मत करो। कुछ काम करो। कुछ ऐसा काम करो जिससे इस विश्व में नाम हो। तुम्हारे जीवन का क्या उद्देश्य है उसे समझो। बैठे बैठे अपने जीवन की यूं ना गवाओ। अच्छा काम हमेश लाभ ही पहुँचाता है। निराश होकर यूं ना बैठो बल्कि और सपनों की दुनिया से बाहर निकालो और कुछ काम करो। भगवान तुम्हारे साथ है। जब तुम्हारे पास सभी साधन है तो सफलता की नई कहानी लिखो। अपने आत्म सम्मान को समझो और कुछ ऐसा काम कर जाओ की मृत्यु के बाद भी तुम्हारा नाम इस संसार में अमर हो। भाग्य के भरोसे मत बैठो। लगातार अपने लक्ष्य को पाने का प्रयास जारी रखो। क्योंकी प्रयास की एक मात्र रास्ता है। निष्क्रिय जीवन एक अभिशाप है।  

मैथिलीशरण गुप्त कविताएं-6

“माँ कह एक कहानी।”
बेटा समझ लिया क्या तूने मुझको अपनी नानी?”
“कहती है मुझसे यह चेटी, तू मेरी नानी की बेटी
कह माँ कह लेटी ही लेटी, राजा था या रानी?
माँ कह एक कहानी।”

“तू है हठी, मानधन मेरे, सुन उपवन में बड़े सवेरे,
तात भ्रमण करते थे तेरे, जहाँ सुरभि मनमानी।”
“जहाँ सुरभि मनमानी! हाँ माँ यही कहानी।”

वर्ण वर्ण के फूल खिले थे, झलमल कर हिमबिंदु झिले थे,
हलके झोंके हिले मिले थे, लहराता था पानी।”
“लहराता था पानी, हाँ-हाँ यही कहानी।”

“गाते थे खग कल-कल स्वर से, सहसा एक हंस ऊपर से,
गिरा बिद्ध होकर खग शर से, हुई पक्ष की हानी।”
“हुई पक्ष की हानी? करुणा भरी कहानी!”

चौंक उन्होंने उसे उठाया, नया जन्म सा उसने पाया,
इतने में आखेटक आया, लक्ष सिद्धि का मानी।”
“लक्ष सिद्धि का मानी! कोमल कठिन कहानी।”

“मांगा उसने आहत पक्षी, तेरे तात किन्तु थे रक्षी,
तब उसने जो था खगभक्षी, हठ करने की ठानी।”
“हठ करने की ठानी! अब बढ़ चली कहानी।”

हुआ विवाद सदय निर्दय में, उभय आग्रही थे स्वविषय में,
गयी बात तब न्यायालय में, सुनी सभी ने जानी।”
“सुनी सभी ने जानी! व्यापक हुई कहानी।”

राहुल तू निर्णय कर इसका, न्याय पक्ष लेता है किसका?
कह दे निर्भय जय हो जिसका, सुन लूँ तेरी बानी”
“माँ मेरी क्या बानी? मैं सुन रहा कहानी।

कोई निरपराध को मारे तो क्यों अन्य उसे न उबारे?
रक्षक पर भक्षक को वारे, न्याय दया का दानी।”
“न्याय दया का दानी! तूने गुनी कहानी।”

Source – NCERT OFFICIAL

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मैथिलीशरण गुप्त की कविताएं PDF

मैथिलीशरण गुप्त की देशभक्ति कविताएं

नर हो, न निराश करो मन को
कुछ काम करो, कुछ काम करो
जग में रह कर कुछ नाम करो
यह जन्म हुआ किस अर्थ अहो
समझो जिसमें यह व्यर्थ न हो
कुछ तो उपयुक्त करो तन को
नर हो, न निराश करो मन को।
संभलो कि सुयोग न जाय चला
कब व्यर्थ हुआ सदुपाय भला
समझो जग को न निरा सपना
पथ आप प्रशस्त करो अपना
अखिलेश्वर है अवलंबन को
नर हो, न निराश करो मन को।
निज गौरव का नित ज्ञान रहे
हम भी कुछ हैं यह ध्यान रहे
मरणोत्‍तर गुंजित गान रहे
सब जाय अभी पर मान रहे
कुछ हो न तज़ो निज साधन को
नर हो, न निराश करो मन को।
किस गौरव के तुम योग्य नहीं
कब कौन तुम्हें सुख भोग्य नहीं
जान हो तुम भी जगदीश्वर के
सब है जिसके अपने घर के
फिर दुर्लभ क्या उसके जन को
नर हो, न निराश करो मन को।

Source: Kartikeya Shukla

मातृभूमि

Maithili Sharan Gupt ki Kavitayen आपकी जीवनशैली में साकारत्मक बदलाव कर सकती हैं, मैथली शरण गुप्त जी की कविताओं की श्रेणी में एक कविता “मातृभूमि” भी है, जो आपके सामने मातृभूमि की महिमा को प्रस्तुत करेगी।

“नीलांबर परिधान हरित पट पर सुंदर है,
सूर्य-चंद्र युग मुकुट मेखला रत्नाकर है।
नदियाँ प्रेम-प्रवाह फूल तारे मंडन हैं,
बंदी जन खग-वृंद शेष फन सिंहासन हैं!
करते अभिषेक पयोद हैं बलिहारी इसे वेष की,
है मातृभूमि! तू सत्य ही सगुण मूर्ति सर्वेश की॥

मृतक-समान अशक्त विविश आँखों को मीचे;
गिरता हुआ विलोक गर्भ से हम को नीचे।
कर के जिसने कृपा हमें अवलंब दिया था,
लेकर अपने अतुल अंक में त्राण किया था।
जो जननी का भी सर्वदा थी पालन करती रही,
तू क्यों न हमारी पूज्य हो? मातृभूमि, मातामही!

जिसकी रज में लोट-लोट कर बड़े हुए हैं,
घुटनों के बल सरक-सरक कर खड़े हुए हैं।
परमहंस-सम बाल्यकाल में सब सुख पाए,
जिसके कारण ‘धूल भरे हीरे’ कहलाए।
हम खेले कूदे हर्षयुत जिसकी प्यारी गोद में,
हे मातृभूमि! तुझको निरख मग्न क्यों न हों मोद में?

पालन-पोषण और जन्म का कारण तू ही,
वक्ष:स्थल पर हमें कर रही धारण तू ही।
अभ्रंकष प्रसाद और ये महल हमारे,
बने हुए हैं अहो! तुझी से तुझ पर सारे।
हे मातृभूमि! जब हम कभी शरण न तेरी पाएँगे,
बस तभी प्रलय के पेट में सभी लीन हो जाएँगे॥

हमें जीवनधार अन्न तू ही देती है,
बदले में कुछ नहीं किसी से तू लेती है।
श्रेष्ठ एक से एक विविध द्रव्यों के द्वारा,
पोषण करती प्रेम-भाव से सदा हमारा।
हे मातृभूमि! उपजे न जो तुझसे कृषि-अंकुर कभी,
तो तड़प-तड़प कर जल मरें जठरानल में हम सभी॥

पाकर तुझको सभी सुखों को हमने भोगा,
तेरा प्रत्युपकार कभी क्या हमसे होगा?
तेरी ही यह देह, तुझी से बनी हुई है,
बस तेरे ही ससुर-सार से सनी हुई है।
हा! अंत-समय तू ही इसे अचल देख अपनाएगी,
हे मातृभूमि! यह अंत में तुझमें ही मिल जाएगी॥

जिन मित्रों का मिलन मलिनता को है खोता,
जिस प्रेमी का प्रेम हमें मुददायक होता।
जिन स्वजनों को देख हृदय हर्षित हो जाता,
नहीं टूटता कभी जन्म भर जिनसे नाता।
उन सबमें तेरा सर्वदा व्याप्त हो रहा तत्व है
हे मातृभूमि! तेरे सदृश किसका महा महत्व है?

निर्मल तेरा नीर अमृत के सम उत्तम है,
शीतल-मंद-सुगंध पवन हर लेता श्रम है।
षट् ऋतुओं का विविध दृश्ययुत अद्भभुत क्रम है,
हरियाली का फ़र्श नहीं मख़मल से कम है।
शुचि सुधा सींचता रात में तुझ पर चंद्र-प्रकाश है,
हे मातृभूमि! दिन में तरणि करता तम का नाश है॥

सुरभित, सुंदर, सुखद सुमन तुझ पर लिखते हैं,
भाँति-भाँति के सरस सुधोपम फल मिलते हैं।
ओषधियाँ हैं प्राप्त एक से एक निराली,
खानें शोभित कहीं धातु-वर रत्नोंवाली।
जो आवश्यक होते हमें मिलत सभी पदार्थ हैं,
हे मातृभूमि! वसुधा, धरा, तेरे नाम यथार्थ हैं॥

दीख रही है कहीं दूर तक शैल-श्रेणी,
कहीं घनावलि बनी हुई है तेरी वेणी।
नदियाँ पैर पखार रही हैं वन कर चेरी,
पुष्पों से तरुराजि कर रही पूजा तेरी।
मृदु मलय-वायु मानो तुझे चंदन चारु चढ़ा रही,
हे मातृभूमि! किसका न तू सात्विक भाव बढ़ा रही?

क्षमामयी, तू दयामयी है, क्षेममयी है,
सुधामयी, वात्सल्यमयी, तू प्रेममयी है।
विभवशालिनी, विश्वपालिनी, दुखहर्त्री है,
हे शरणदायिनी देवि! तू करती सब का त्राण है,
हे मातृभूमि! संतान हम, तू जननी तू प्राण है॥

आते ही उपकार याद हे माता! तेरा,
हो जाता मन मुग्ध भक्ति-भावों का प्रेरा।
तू पूजा के योग्य, कीर्ति तेरी हम गावें,
मन तो होता तुझे उठाकर शीश चढ़ावे।
वह शक्ति कहाँ, हा! क्या करें, क्यों हम को लज्जा न हो?
हम मातृभूमि! केवल तुझे शीश झुका सकते अहो!

कारण-वश जब शोक-दाह से हम दहते हैं,
तब मुझ पर ही लोट-लोट कर दुख सहते हैं।
पाखंडी ही धूल चढ़ा कर तनु में तेरी,
कहलाते हैं साधु नहीं लगती है देरी।
इस तेरी ही शुचि धूलि में मातृभूमि! वह शक्ति है।
जो क्रूरों के भी चित्त में उपजा सकती भक्ति है॥

कोई व्यक्ति विशेष नहीं तेरा अपना है,
जो यह समझे हाय! देखता वह सपना है।
तुझको सारे जीव एक से ही प्यारे हैं,
कर्मों के फल मात्र यहाँ न्यारे न्यारे हैं।
हे मातृभूमि! तेरे निकट सबका सम संबंध है,
जो भेद मानता वह अहो! लोचनयुत भी अंध है॥

जिस पृथिवी में मिले हमारे पूर्वज प्यारे,
उससे हे भगवान! कभी हम रहें न न्यारे।
लोट-लोट कर वहीं हृदय को शांत करेंगे,
उसमें मिलते समय मृत्यु से नहीं डरेंगे।
उस मातृभूमि की धूल में जब पूरे सन जाएँगे,
हो कर भव-बंधन-मुक्त हम आत्मरूप बन जाएँगे…”
-मैथली शरण गुप्त

भाषा का संदेश

Maithili Sharan Gupt ki Kavitayen आपकी जीवनशैली में साकारत्मक बदलाव कर सकती हैं, मैथली शरण गुप्त जी की कविताओं की श्रेणी में एक कविता “भाषा का संदेश” भी है। यह कविता आपके सामने भाषा की खूबसूरती को प्रस्तुत करेगी।

भाषा का संदेश सुनो, हे
भारत! कभी हताश न हो।
बता क्या है फिर अरुणोदय से
उज्जवल भाग्याकाश न हो॥

दिन खोटे क्यों न हों तुम्हारे किंतु आप तुम खरे रहो,
साथ छोड़ दे क्यों न सफलता किंतु धैर्य तुम धरे रहे।
ख़ाली हाथ हुए, हो जाओ, पर साहस से भरे रहो,
हरि के कर्मक्षेत्र! हरे हो और सर्वदा हरे रहो॥
बात क्या कि फिर देश तुम्हारा
पूरा पुनर्विकाश न हो।
भाषा का संदेश सुनो, हे
भारत! कभी हताश न हो॥

मार्ग सूझते नहीं, न सूझे, किंतु अटल तुम अड़े रहो,
आगे बढ़ना कठिन हुआ तो हटो न पीछे, खड़े रहो।
विविध बंधनों में जकड़े हो, रहो, किंतु तुम कड़े रहो,
जी छोटा मत करो, बड़ों के वशंज हो तुम बड़े रहो॥
बात क्या कि फिर यहाँ तुम्हारा
पावन पूर्व प्रकाश न हो।
भाषा का संदेश सुनो, हे
भारत! कभी हताश न हो॥

तुम में हो या न हो शेष कुछ पर हो तो तुम आर्य अभी,
सूख गया तनु तक तो सूखे, रक्त-मांस हो या कि न भी।
अरे, हड्डियाँ तो शरीर में बनी हुई हैं वही अभी
जिनसे विश्रुत वज्र बना था, सिद्ध हुए सुर-कार्य सभी!
बात क्या कि फिर देश तुम्हारे
पाप पतन का नाश न हो।
भाषा का संदेश सुनो, हे
भारत! कभी हताश न हो॥

नहीं रहे अधिकार तुम्हारे, न रहें, पर वे मिटे नहीं,
जन्म-सिद्ध अधिकार किसी के मिट सकते हैं भला कहीं?
भूमि वहीं है, जहाँ निरंतर सभी सिद्धियाँ सिद्ध रहीं,
जगत जानता है कि हुआ था आत्मबोध उत्पन्न वहीं॥
बात क्या कि फिर छिन्न-भिन्न यह
पराधीनता-पाश न हो।
भाषा का संदेश सुनो, हे
भारत! कभी हताश न हो॥
-मैथली शरण गुप्त

विजयदशमी

Maithili Sharan Gupt ki Kavitayen आपकी जीवनशैली में साकारत्मक बदलाव कर सकती हैं, मैथली शरण गुप्त जी की कविताओं की श्रेणी में एक कविता “विजयदशमी” भी है, जो कि सनातन संस्कृति के एक पावन पर्व विजयदशमी की महानता को बताता है।

जानकी जीवन, विजयदशमी तुम्हारी आज है,
दीख पड़ता देश में कुछ दूसरा ही साज है।
राघवेंद्र! हमें तुम्हारा आज भी कुछ ज्ञान है,
क्या तुम्हें भी अब कभी आता हमारा ध्यान है?

वह शुभ स्मृति आज भी मन को बनाती है हरा,
देव! तुम तो आज भी भूली नहीं है यह धरा।
स्वच्छ जल रखती तथा उत्पन्न करती अन्न है,
दीन भी कुछ भेंट लेकर दीखती संपन्न है॥

व्योम को भी याद है प्रभुवर तुम्हारी वह प्रभा!
कीर्ति करने बैठती है चंद्र-तारों की सभा।
भानु भी नव-दीप्ति से करता प्रताप प्रकाश है,
जगमगा उठता स्वयं जल, थल तथा आकाश है॥

दुःख में ही है! तुम्हारा ध्यान आया है हमें,
जान पड़ता किंतु अब तुमने भुलाया है हमें।
सदय होकर भी सदा तुमने विभो! यह क्या किया,
कठिन बनकर निज जनों को इस प्रकार भुला दिया॥

है हमारी क्या दशा सुध भी न ली तुमने हरे?
और देखा तक नहीं जन जी रहे हैं या मरे।
बन सकी हमसे न कुछ भी किंतु तुमसे क्या बनी?
वचन देकर ही रहे, हो बात के ऐसे धनी!

आप आने को कहा था, किंतु तुम आए कहाँ?
प्रश्न है जीवन-मरण का हो चुका प्रकटित यहाँ।
क्या तुम्हारा आगमन का समय अब भी दूर है?
हाय तब तो देश का दुर्भाग्य ही भरपूर है!

आग लगने पर उचित है क्या प्रतीक्षा वृष्टि की,
यह धरा अधिकारिणी है पूर्ण करुणा दृष्टि की।
नाथ इसकी ओर देखो और तुम रक्खो इसे,
देर करने पर बताओ फिर बचाओगे किसे?

बस तुम्हारे ही भरोसे आज भी यह जी रही,
पाप पीड़ित ताप से चुपचाप आँसू पी रही।
ज्ञान, गौरव, मान, धन, गुण, शील सब कुछ खो गया,
अंत होना शेष है बस और सब कुछ हो गया॥

यह दशा है इस तुम्हारी कर्मलीला भूमि की,
हाय! कैसी गति हुई इस धर्म-शीला भूमि की।
जा घिरी सौभाग्य-सीता दैन्य-सागर-पार है,
राम-रावण-वध बिना संभव कहाँ उद्धार है?

शक्ति दो भगवान् हमें कर्तव्य का पालन करे,
मनुज होकर हम न परवश पशु-समान जिएँ-मरें।
विदित विजय-स्मृति तुम्हारी यह महामंगलमयी,
जटिल जीवन-युद्ध में कर दे हमें सत्वर जयी॥
-मैथली शरण गुप्त

नागरी और हिंदी

Maithili Sharan Gupt ki Kavitayen आपकी जीवनशैली में साकारत्मक बदलाव कर सकती हैं, मैथली शरण गुप्त जी की कविताओं की श्रेणी में एक कविता “नागरी और हिंदी” भी है, जो कि आपको नागरी और हिंदी भाषा की महानता बताती है।

है एक-लिपि-विस्तार होना योग्य हिंदुस्तान में
अब आ गई यह बात सब विद्वज्जनों के ध्यान में।
है किंतु इसके योग्य उत्तम कौन लिपि गुण आगरी?
इस प्रश्न का उत्तर यथोचित है उजागर ‘नागरी’॥

समझें अयोग्य न क्यों इसे कुछ हठी और दुराग्रही,
लिपियाँ यहाँ हैं और जितनी श्रेष्ठ सबसे है यही।
इसका प्रचार विचार से कल्याणकर सब ठौर है,
सुंदर, सरल, सुस्पष्ट ऐसी लिपि न कोई और है॥

सर्वत्र ही उत्कर्ष इसका हो चुका अब सिद्ध है,
यह सरल इतनी है कि जिससे ‘बालबोध’ प्रसिद्ध है।
अति अज्ञ जन भी सहज ही में जान लेते हैं इसे,
संपूर्ण सहृदय जन इसी से मान देते हैं इसे॥

जैसा लिखो वैसा पढ़ो कुछ भूल हो सकती नहीं,
है अर्थ का न अनर्थ इसमें एक बार हुआ कहीं।
इस भाँति होकर शुद्ध यह अति सरल और सुबोध है,
क्या उचित फिर इसका कभी अवरोध और विरोध है?

है हर्ष अब नित बुध जनों की दृष्टि इस पर हो रही,
वह कौन भाषा है जिसे यह लिख सके न सही सही?
लिपि एक हो सकती यही संपूर्ण भारतवर्ष में,
हित है हमारा इसी लिपि के सर्वथा उत्कर्ष में॥

हैं वर्ण सीधे और सादे रम्य रुचिराकृति सभी,
लिखते तथा पढ़ते समय कुछ श्रम नहीं पड़ता कभी।
हैं अन्य लिपियों की तरह अक्षर न इसके भ्रम भरे,
कुंचित, कठिन, दुर्गम, विषम, छोटे-बड़े खोटे-खरे॥

गुर्जर तथा बंगादि लिपियाँ सब इसी से हैं बनी,
है मूल उनका नागरी ही रूण-गुण-शोभा-सनी।
अतएव फिर क्यों हो यही प्रचलित न भारत में अहो!
क्या उचित शाखाश्रय कभी है मूल को तज कर कहो?

आरंभ से इस देश में प्रचलित यही लिपि है रही,
अब भी हमारा मुख्य सब साहित्य रखती है यही।
श्रुति, शास्त्र और पुराण आदिक ग्रंथ-संस्कृत के सभी,
अंकित इसी लिपि में हुए थे और में न कहीं कभी॥

उद्देश जिनका एक केवल देश का कल्याण था,
सुर-सदृश ऋषियों ने स्वयं इसको किया निर्माण था।
अतएव सारे देश में कर लिपि पुन:प्रचलित यही,
मानो महा उद्देश उनका पूर्ण करना है वही॥

जिसमें हमारे पुण्य-पूर्वज ज्ञान अपना भर गए,
स्वर्गीय शिक्षा का सदा का द्वार दर्शित कर गए।
है जो तथा सब भाँति सुंदर और सब गुण आगरी,
प्यारी हमारी लिपि वही जीती रहे नित ‘नागरी’॥

इसके गुणों का पूर्ण वर्णन हो नहीं सकता कभी,
स्वीकार करते विज्ञ जन उपयोगिता इसकी सभी।
है नाम ही इसका स्वयं निज योग्यता बतला रहा,
प्रख्यात है जो आप ही फिर जाए क्या उस पर कहा?

अत्यंत आवश्यक यहाँ त्यों एक-लिपि-विस्तार है,
त्यों एक भाषा का अपेक्षित निर्विवाद प्रचार है।
इस विषय में कुछ कथन भी अब जान पड़ता है वृथा,
हैं चाहते सब जन जिसे उसके गुणों की क्या कथा?

ज्यों-ज्यों यहाँ पर एक भाषा वृद्धि पाती जाएगी,
त्यों त्यों अलौकिक एकता सबमें समाती जाएगी।
कट जाएगी जड़ भिन्नता की विज्ञता बढ़ जाएगी,
श्री भारती जन-जाति उन्नति-शिखर पर चढ़ जाएगी॥

संपूर्ण प्रांतिक बोलियाँ सर्वत्र ज्यों की त्यों रहें,
सब प्रांत-वासी प्रेम से उनके प्रवाहों में बहें।
पर एक ऐसी मुख्य भाषा चाहिए होनी यहाँ,
सब देशवासी जन जिसे समझें समान जहाँ-तहाँ॥

हो जाए जब तक एक भाषा देश में प्रचलित नहीं,
होगा हज़ारों यत्न से भी कुछ हमारा हित नहीं।
जब तक न भाषण ही परस्पर कर सकेंगे हम सभी,
क्या काम कोई कर सकेंगे हाय! हम मिल कर कभी!

हा! एक भाषा के बिना इस देश के वासी यहीं—
हम एक होकर भी अनेकों हो रहे हैं क्या नहीं?
पर ध्यान अब कुछ लोग हैं इस पर न धरना चाहते,
वे जाति-बंधन तोड़ कर है ऐक्य करना चाहते!

हम पूछते हैं विश्व में वह देश ऐसा है कहाँ—
मत भिन्न सामाजिक तथा धार्मिक न होते हों जहाँ?
पर क्या कभी मत-भिन्नता से द्वेष होता है कहीं?
दो नेत्र रहते भी अहो! हम देखते हैं कुछ नहीं!

व्यवहार रोटी और बेटी का हुए पर भी अहो!
क्या एक भाषा के बिना हम एक हो सकते कहो?
अफ़सोस! जो कुछ कार्य है हम उसे तो करते नहीं,
है जो अकार्य वृथा उसे करते हुए डरते नहीं!

हो एक भाषा की लता सर्वत्र जिसमें लहलही,
प्रत्येक देशी विज्ञ जन का काम है पहला यही।
साधक बनो पहले सभी जन सिद्धि पाओगे तभी,
क्या पूर्ण योग्य हुए बिना फल-प्राप्ति हो सकती कभी?

जब तक तुम्हारा तत्वमय उपदेश समझेंगे नहीं—
हे शिक्षितो! हम अज्ञ जन क्या कर सकेंगे कुछ कहीं?
इससे हमें उपदेश अपना देश-भाषा में करो,
मत अन्य-भाषा-ज्ञान का गौरव दिखाने पर मरो॥

अब एक लिपि से भी अधिकतर एक भाषा इष्ट है,
जिसके बिना होता हमारा सब प्रकार अनिष्ट है।
अतएव है ज्यों एक लिपि के योग्य केवल ‘नागरी’,
त्यों एक भाषा-योग्य है ‘हिंदी’ मनोज्ञ उजागरी॥

प्रख्यात है इस देश की जब ‘हिंद’ संज्ञा सर्वथा
वासी यहाँ के जब सभी ‘हिंदू’ कहे जाते तथा।
तब फिर यहाँ की मुख्य भाषा क्यों न ‘हिंदी’ ही रहे,
है कौन ऐसा अज्ञ जो इस बात को अनुचित कहे?

थोड़ी बहुत सर्वत्र ही यह समझ ली जाती यहाँ,
व्यापक न ऐसी एक भाषा और दिखलाती यहाँ।
हो क्यों नहीं इस देश की फिर मुख्य भाषा भी यही,
है योग्य जो सबसे अधिक हो क्यों न अंगीकृत वही?

है कौन ऐसी बात जो इसमें न जा सकती कही?
किस अर्थ की, किस समय, इसमें, कौन-सी त्रुटि है रही?
सब विषय-वर्णन-योग्य इसमें विपुल शब्द भरे पड़े,
हैं गद्य-पद्य समान इसमें सरस बन सकते बड़े॥

यद्यपि अभी तक देश के दुर्भाग्य से यह दीन है,
पर राष्ट्र-भाषा-योग्य यह किस श्रेष्ठ गुण से हीन है?
होवे भले ही कौमुदी कृश कृष्णापक्ष-प्रभाव से,
पर कुमुद मुद पाते नहीं क्या देख उसको चाव से?
-मैथली शरण गुप्त

वर्षा-वर्णन

Maithili Sharan Gupt ki Kavitayen आपकी जीवनशैली में साकारत्मक बदलाव कर सकती हैं, मैथली शरण गुप्त जी की कविताओं की श्रेणी में एक कविता “वर्षा-वर्णन” भी है, जो कि मातृभूमि के प्रति आस्था और सम्मान के भाव पर आधारित है।

गगन में घन हैं घिरने लगे, मुदित चातक भी फिरने लगे।
घट गया रवि-तेज कराल है, अब मनोहर पावस काल है॥

अनल-सी जलती महि थी जहाँ, अब भरा जल ही जल है वहाँ।
द्रवित भूमि हुई वह कर्कशा, स्थिर सदा किस की रहती दशा?

झुलस जो तरु थे तप से गए, लहलहे अब वे सब हैं भए।
न अब आतप-ताप रहा कहीं, दुख बिना सुख है मिलता नहीं॥

भर गए सलिलाशय रम्य हैं, विपुल पंकिल मार्ग अगम्य हैं।
अवनि-आर्त्ति हुई सब दूर है, सुख हुआ सब को भरपूर है॥

नव तृणों पर इंद्रवधू-गण, कर रहे अब यों छवि धारण—
हरित वस्त्र मनों पहने मही, अरुण बूँद भली जिस पै रही॥

गरजते नभ में घन घोर हैं, कर रहे रव दादुर मोर हैं।
चमकती चपला डरता हिया, फिर न क्यों कर मान तजें प्रिया?

काली घटा में उड़ती बकाली, छटा दिखाती अपनी निराली।
मानों खुले केश नभस्थली के, प्रसून हैं ये खिसके उसी के॥

मतंग से, शैल, तुंरग से कहीं, विहंग से, वृक्ष, कुरंग से कहीं।
कहीं-कहीं दुर्गम दुर्ग से बने, विराजते हैं घन व्योम में घने॥

देते दिवाकर न दर्शन हैं सदैव
तारे शशी-युत छिपे रहते तथैव।
मानो हुए अब पयोद नभोवितान,
होता न ज्ञात सहसा समय-प्रमाण॥

मंदानिलाकुलित पत्र-समूहधारी,
गाते जहाँ भ्रमर सुंदर शब्दकारी।
उत्फुल्ल-पुष्प-परिपूर्ण कदंब-वंश,
है हास्य-सा कर रहा प्रकट प्रशंस॥

हैं रात्रि में निज प्रकाश-छटा दिखाते,
अंगार से तिमिर के तनु में लगाते।
मानो लता-द्रुम-विभूषण हैं सुहाते,
खद्योत-वृंद कहिए, न किसे लुभाते?

जलद कर रहे हैं नम्र हो नीर-दान
सतत बढ़ रहे हैं धान शोभा-निधान।
सुखयुत करते हैं कोकिला-मोर गान,
प्रमुदित निज जी में हो रहे हैं किसान॥

पुलकित करते हैं स्पर्श से अंग अंग,
स्व-सुमन-शर मानो मारता है अनंग।
श्रमयुत हरते हैं स्वेद संताप-वृंद,
जल-कण गिरते हैं व्योम से मंद मंद॥

हुई शोभाशाली प्रकट हरियाली क्षिति पर,
निराली शोभा है गिरिवर वनों का सुखकर।
दिखाती वर्षा में प्रकृति नित जो दृश्य अपने,
नहीं होते वैसे अपर ऋतु में प्राप्त सपने॥

है मेघ-ध्वनि ही मृदंग जिसमें केकी-कला नृत्य है,
केका,कोकिल-कूक गान जिस में होता तथा नित्य है॥
झिल्ली की झनकार तार जिसमें है मंजु वीणा-ध्वनि।
देती पावस है न मोद किसको यों नाट्यशाला बनी॥
-मैथली शरण गुप्त

FAQ

मैथिली शरण गुप्त द्वारा रचित कविता कौन सी है?

जयद्रथवध, साकेत, पंचवटी, सैरन्ध्री, बक संहार, यशोधरा, द्वापर, नहुष, जयभारत, हिडिम्बा, विष्णुप्रिया एवं रत्नावली आदि रचनाएं इसके उदाहरण हैं।

मैथिलीशरण गुप्त का प्रथम खंडकाव्य कौन सा है?

प्रथम काव्य संग्रह “रंग में भंग” तथा बाद में “जयद्रथ वध” प्रकाशित हुई। उन्होंने बंगाली के काव्य ग्रन्थ “मेघनाथ वध”, “ब्रजांगना” का अनुवाद भी किया।

मैथिलीशरण गुप्त को राष्ट्रकवि क्यों कहा जाता है मैथिलीशरण गुप्त के राष्ट्रप्रेम पर प्रकाश डालिए?

गुप्त राष्ट्रकवि केवल इसलिए नहीं हुए कि देश की आजादी के पहले राष्ट्रीयता की भावना से लिखते रहे। वह देश के कवि बने क्योंकि वह हमारी चेतना, हमारी बातचीत, हमारे आंदोलनों की भाषा बन गए। व्यक्तिगत सत्याग्रह के कारण उन्हें 1941 में जेल जाना पड़ा. तब तक वह हिंदी के सबसे प्रतिष्ठित कवि बन चुके थे।

हिन्दी साहित्य को मैथिलीशरण गुप्त जी का क्या योगदान स्पष्ट करें?

हिन्दी कविता के इतिहास में यह गुप्त जी का सबसे बड़ा योगदान है। घासीराम व्यास जी उनके मित्र थे। पवित्रता, नैतिकता और परंपरागत मानवीय सम्बन्धों की रक्षा गुप्त जी के काव्य के प्रथम गुण हैं, जो ‘पंचवटी’ से लेकर ‘जयद्रथ वध’, ‘यशोधरा’ और ‘साकेत’ तक में प्रतिष्ठित एवं प्रतिफलित हुए हैं। ‘साकेत’ उनकी रचना का सर्वोच्च शिखर है।

मैथिलि शरण गुप्त का जनम कब और कहाँ हुआ?

मैथिलीशरण गुप्त का जन्म 3 अगस्त 1886 में पिता सेठ रामचरण कनकने और माता काशी बाई की तीसरी संतान के रूप में उत्तर प्रदेश में झांसी के पास चिरगांव में हुआ। माता और पिता दोनों ही वैष्णव थे।

आशा है कि ‘मैथिलीशरण गुप्त कविताएं’ (Maithili Sharan Gupt ki Kavitayen) के माध्यम से आप मैथली शरण गुप्त की कविताएं पढ़ पाएं होंगे, जो कि आपको सदा प्रेरित करती रहेंगी। साथ ही यह ब्लॉग आपको इंट्रस्टिंग और इंफॉर्मेटिव भी लगा होगा, इसी प्रकार की अन्य कविताएं पढ़ने के लिए हमारी वेबसाइट Leverage Edu के साथ बने रहें।

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