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उत्तर- भक्तकवि सूरदास की रचना ‘सूरसागर’ में कृष्ण काव्य के एक प्रसंग को ‘भ्रमरगीत’ कहा गया है। इस प्रसंग में उद्धव, कृष्ण का संदेश लेकर योग-संदेश देने आए हैं, लेकिन गोपियाँ उसे व्यर्थ और निरर्थक समझकर कई प्रकार के उपहास करती हैं। जैसे भ्रमर या भंवरा फूलों से रस पीकर कहीं और चला जाता है, उसी तरह कृष्ण भी गोपियों से प्रेम कर मथुरा चले गए हैं। गोपियाँ उद्धव को भी भ्रमर के समान ही मानती हैं, क्योंकि भ्रमर का रंग काला होता है और वह रूप व रस के लोभ में होता है, ठीक वैसे ही कृष्ण और उद्धव भी रूप, गुण और कर्म में मिलते-जुलते हैं। हिंदी साहित्य में गोपियों के विरह के इस प्रसंग को ‘भ्रमरगीत’ के नाम से जाना जाता है।
अन्य प्रश्न
- कृष्ण द्वारा भेजा गया योग-संदेश सुन गोपियाँ हताश और कातर क्यों हो उठीं?
- गोपियाँ अब धैर्य क्यों नहीं रख पा रही हैं?
- सूर की भ्रमरगीत परम्परा पर संक्षेप में प्रकाश डालिए
- सु तौ ब्याधि हमकों लै आए यहाँ गोपियों ने ‘व्याधि’ किसे माना है और क्यों?
- “ते क्यों अनीति करें आपुन, जे और अनीति छुड़ाए” – गोपियों ने इससे किस पर व्यंग्य किया है?
- “राजधरम तौ यहै” इस कथन के माध्यम से सूरदास ने किस जीवन-सत्य का बोध कराया है?
- सूरदास की भक्ति-भावना पर प्रकाश डालिए।
- अष्टछाप के कवियों का नामोल्लेख कीजिए। इसकी स्थापना का श्रेय किसे दिया जाता है?
- “ऊधो, तुम हौ अति बड़भागी” – इसमें किन लोगों पर व्यंग्य है? सूरदास ने इसके माध्यम से क्या सन्देश दिया है?

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