उत्तर – लक्ष्मण के तीव्र वचनों से उत्तेजित हुए परशुराम जी के क्रोध को श्रीराम ने शांत किया। उन्होंने अत्यंत विनम्र और मधुर शब्दों का प्रयोग किया। श्रीराम के शांत, शीतल और संयमित व्यवहार ने परशुराम के उग्र स्वभाव को ठंडा कर दिया और उनके क्रोध को शांत करने में सहायक बना।
विस्तार से
लक्ष्मण के तीखे और व्यंग्यपूर्ण वचनों से परशुराम जी का क्रोध अत्यंत भड़क उठा। उन्होंने अपने फरसे को उठा लिया और लक्ष्मण को दंड देने के लिए तत्पर हो गए। यह देखकर श्रीराम ने स्थिति को संभालने के लिए अत्यंत धैर्य, विनम्रता और विवेक का परिचय दिया।
श्रीराम ने परशुराम जी को अत्यंत सम्मानपूर्वक प्रणाम किया और स्वयं को उनका दास बताते हुए लक्ष्मण के कठोर शब्दों के लिए क्षमा माँगी। उनके शब्द इतने शीतल और संतुलित थे कि वे परशुराम जी के उग्र स्वभाव के लिए जैसे शीतल जल सिद्ध हुए। श्रीराम के संयमित आचरण और मधुर व्यवहार से परशुराम का क्रोध धीरे-धीरे शांत हो गया।
परशुराम जी ने श्रीराम की दिव्य गरिमा को भी अनुभव किया और उनके तेजस्वी व्यक्तित्व को देखकर उनका हृदय बदल गया। अंततः उन्होंने न केवल क्रोध का त्याग किया, बल्कि राम की विनम्रता और मर्यादा का हृदय से आदर भी किया।
यह प्रसंग दर्शाता है कि क्रोध जैसी तीव्र भावना को भी विनम्रता, शांति और सम्मान से जीता जा सकता है।
इस पाठ के अन्य प्रश्न
- ‘बिहसि लखनु बोले मृदु बानी। अहो मुनीसु महाभट मानी॥ पुनि पुनि मोहि देखाव कुठारु। चहत उड़ावन फूँकि पहारू॥’ का भाव स्पष्ट कीजिए।
- ‘इहाँ कुम्हड़बतिया कोउ नाहीं। जे तरजनी देखि मरि जाहीं॥ देखि कुठारु सरासन बाना। मैं कछु कहा सहित अभिमाना॥’ का भाव स्पष्ट कीजिए।
- पाठ के आधार पर तुलसी के भाषा-सौन्दर्य पर दस पंक्तियाँ लिखिए।
- इस पूरे प्रसंग में व्यंग्य का अनूठा सौन्दर्य है। उदाहरण के साथ स्पष्ट कीजिए।
- निम्नलिखित पंक्तियों में प्रयुक्त अलंकार पहचान कर लिखिए- (क) बालकु बोलि बधाँ नहि तोही। (ख) कोटि कुलिस सम बचनु तुम्हारा।
- “सामाजिक जीवन में क्रोध की ज़रूरत बराबर पड़ती है…” इस कथन के आधार पर क्रोध के पक्ष या विपक्ष में अपना मत स्पष्ट कीजिए।
- अपने किसी परिचित या मित्र के स्वभाव की विशेषताएँ लिखिए।
- दूसरों की क्षमताओं को कम नहीं समझना चाहिए इस विषय पर कहानी लिखिए।
- उन घटनाओं को याद करके लिखिए जब आपने अन्याय का प्रतिकार किया हो।

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