अपरदन (Erosion) एक प्राकृतिक भू-वैज्ञानिक प्रक्रिया है, जिसमें जल, वायु और हिमनद जैसी शक्तियों के प्रभाव से पृथ्वी की ऊपरी सतह की मिट्टी और चट्टानें कटकर, घिसकर या बहकर अपने मूल स्थान से हट जाती हैं। इस प्रक्रिया में मिट्टी और चट्टानों के कण एक स्थान से दूसरे स्थान तक पहुँचते हैं, जिससे भूमि का क्षरण होता है और भू-आकृतियों में परिवर्तन आता है।
अपरदन के प्रमुख कारक जल (नदियाँ और वर्षा), वायु और हिमनद हैं। इसमें पहले मिट्टी या चट्टानों का टूटना और घिसना होता है, इसके बाद उनके कण बहते पानी, हवा या बर्फ के साथ स्थानांतरित हो जाते हैं। अपरदन के परिणामस्वरूप उपजाऊ मिट्टी का नुकसान होता है, नदियों में गाद जमा होती है और कई स्थानों पर भूमि बंजर बन सकती है।
यद्यपि अपरदन एक प्राकृतिक प्रक्रिया है, लेकिन वनों की कटाई, अत्यधिक कृषि, पशुचारण और निर्माण कार्य जैसी मानवीय गतिविधियाँ इसे तेज कर देती हैं, जिससे पर्यावरणीय संतुलन प्रभावित होता है।
अपरदन के प्रकार
अपरदन विभिन्न प्राकृतिक कारकों के कारण होता है। कारकों के आधार पर इसे निम्नलिखित प्रमुख प्रकारों में वर्गीकृत किया जाता है:
- जल द्वारा अपरदन (Water Erosion): वर्षा, नदियाँ और बाढ़ भूमि की ऊपरी परत को काटकर बहा ले जाती हैं। ढाल वाली और अधिक वर्षा वाले क्षेत्रों में यह अधिक प्रभावी होता है। नदी घाटियों का निर्माण और नदी तटों का कटाव इसके प्रमुख परिणाम हैं।
- वायु द्वारा अपरदन (Wind Erosion): शुष्क और कम वनस्पति वाले क्षेत्रों में तेज़ हवाएँ मिट्टी के महीन कणों को उड़ाकर भूमि की उपजाऊ परत को नष्ट करती हैं। रेगिस्तानों में रेत के टीलों का बनना इसका उदाहरण है।
- हिम द्वारा अपरदन (Glacial Erosion): पर्वतीय क्षेत्रों में चलते हुए हिमनद चट्टानों को घिसते हैं, जिससे यू-आकार की घाटियाँ और विशिष्ट पर्वतीय स्थलाकृतियाँ बनती हैं।
- समुद्र द्वारा अपरदन (Marine Erosion): समुद्री लहरों के निरंतर प्रहार से तटीय चट्टानें और भूमि कटती रहती हैं। तटीय कटाव और समुद्री गुफाएँ इसके प्रमुख परिणाम हैं।
- गुरुत्वाकर्षण द्वारा अपरदन (Mass Movement): गुरुत्वाकर्षण के कारण मिट्टी और चट्टानों का ढाल की ओर खिसकना इस प्रकार का अपरदन कहलाता है। भूस्खलन इसका प्रमुख उदाहरण है।

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