भारतीय गायिकाओं में बेजोड़ लता मंगेशकर

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भारतीय गायिकाओं में बेजोड़ लता मंगेशकर Class 11

‘नाम ग़ुम जाएगा चेहरा ये बदल जाएगा मेरी आवाज़ ही पहचान है गर याद रहे’ लता मंगेशकर की शख्सियत को अगर एक पंक्ति में बयां किया जाए तो वो ये पंक्ति होगी जिसे लता जी ने ही अपनी मधुर आवाज़ से सजाया है। ऐसे ही हज़ारो गीतों को अपनी आवाज़ से यादगार बनाने वाली लता मंगेशकर ने भारतीय संगीत जगत की नींव सजाई है जिसमें वो मिठास और खुशबू शामिल है जो किसी का भी मन मोह सकती है।

लता जी का जन्म 28 सितम्बर 1929 को इंदौर में हुआ लेकिन उनकी परवरिश महाराष्ट्र में हुई। उनके पिता रंगमंच LG के कलाकार और गायक थे। पहली बार लता मंगेशकर ने वसंत जोगलेकर द्वारा निर्देशित एक फ़िल्म कीर्ती हसाल के लिये गाया। उनके पिता नहीं चाहते थे कि लता फ़िल्मों के लिये गाये इसलिये इस गाने को फ़िल्म से निकाल दिया गया। लता मंगेशकर की गायिकी को सराहने वाले सिर्फ फिल्मी जगत के प्रशंसक नहीं है। लता मंगेशकर ने और भी कई भाषाओ के गीतों के ज़रिये सुरों को दुनिया भर में बिखेरा है। लता मंगेशकर ने हर गीत को सिर्फ गाया नहीं सुरों को हर रचना में पिरोया है जिसकी सराहना बड़े बड़े दिग्गज करते नहीं थकते। चाहे वो पंडित भीमसेन जोशी हों, पंडित जसराज हों या अन्य बड़े कलाकार जिन्होंने एक मकाम हासिल किया लेकिन लता जी की सराहना भी की। अपनी मनोहर आवाज़ से चाहे ” ऐ मेरे वतन के लोगों ज़रा आंख में भर लो पानी” या फिर ” दीदी तेरा देवर दीवाना “ गाना हो सभी में उन्होंने अपनी आवाज़ से सुनने वाले के हृदय को छुआ है।

6 फरवरी 2022 को लता मंगेशकर ने इस दुनिया को अलवीदा कह दिया। हम खुशकिस्मत है जो हमने उस युग में जन्म लिया जहाँ लता जी जैसी शख्सियत को हमें सुनने और उनकी आवाज़ के जादू से रूबरू होने का मौका मिला। हम उन्हें शत शत नमन करते है।

हिंदी कक्षा 11 “वितान के  भाग-1” के पाठ-1 “भारतीय गायिकाओं में बेजोड़ लता मंगेशकर Class 11″के बारे में पढे़गे। इस कहानी का सार, कठिन-शब्दों के अर्थ , लेखक के बारे में और NCERT की पुस्तक के अनुसार प्रश्नों के उत्तर, इन सभी के बारे में जानेंगे।

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लेखक परिचय

नाम और  परिचय  कुमार गंधर्व, उनका पूरा नाम शिवपुत्र सिद्धरामैया कोमकाली था। पुणे में प्रोफेसर देवधर और अंजनी बाई मालपेकर से संगीत शिक्षा प्राप्त की थी। कालिदास के बाद कुमार गंधर्व मालवा के सबसे दिव्य सांस्कृतिक विभूति  है।     
जन्म               सन् 1948, वर्धा महाराष्ट्र  
प्रमुख रचनाएँ           उड़ जाएगा हंस अकेला, बौर चैता, झीनी झीनी चदरिया,सुनता है गुरु ज्ञानी आदि।  
 पुरस्कार        पदम विभूषण पुरस्कार । 
 मृत्यु  सन् 12 जनवरी 1992
भारतीय गायिकाओं में बेजोड़ लता मंगेशकर
भारतीय गायिकाओं में बेजोड़ लता मंगेशकर , Source: wikipedia
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भारतीय गायिकाओं में बेजोड़ लता मंगेशकर

भारतीय गायिकाओं में बेजोड़ लता मंगेशकर
Source: Pinterest

भारतीय गायिकाओं में बेजोड़ लता मंगेशकर Class 11 पंडित कुमार गंधर्व द्वारा लिखा अध्याय है । जहां लता मंगेशकर के गायन का वर्णन किया गया है। गायिका पर प्रकाश डालते हुए वह कहते हैं कि ‘जब मैं एक बार बीमार था तब मैंने रेडियो लगाया और अचानक एक अद्भुत आवाज़ मेरे कानों से टकराई, वाकई में उसमें कुछ अलग सा जादू था।’ जब गाने का अंत हुआ तब गायिका का नाम बताया गया “लता मंगेशकर”। उस दिन से लेखक लगातार लता मंगेशकर जी को सुनते हुए आ रहे हैं। पहले के समय नूरजहां अपने संगीत के लिए प्रसिद्ध थे लेकिन लता जी तो उनसे बहुत आगे निकल गई। संगीत के क्षेत्र में ऐसे चमत्कार होते रहते हैं जैसे ख्याति प्राप्त सितार वादक उस्ताद विलायत खां ‌अपने पिता से काफी आगे निकल गए। लेखक ने ये बताया है कि लता मंगेशकर जैसी अद्भुत गायिका कोई और हुई नहीं हैं।

लता के कारण ही चित्रपट इतना मशहूर हुआ हैं और साथ ही शास्त्रीय संगीत की ओर नज़रिया बदला है। आजकल जो गाने घर में सुनाई देते हैं और पहले जो बच्चे घर में गाने सुनते थे बड़ा अंतर है। लता मंगेशकर के गाने कानों में पड़े तो कोई भी उन्हें सीखने का प्रयास करने लगता है। संगीत के अलग-अलग प्रकारों से उनका परिचय हो रहा हैं । उनका संगीत का ज्ञान बढ़ता जा रहा हैं साथ ही उन्हें इसकी समझ होती जा रही हैं कि सभी प्रकार के लय भी आवश्यक हैं। इस प्रकार उन्होंने नई पीढ़ी के संगीत को संस्कारित किया है। संगीत की लोकप्रियता, उसका प्रचार और अभिरुचि बनाने से कहां कोई लता हो जाता हैं। कौन से राग में गाया जाए ,कौन सी ताल में गाया जाए यह मालूम नहीं रहता हैं। क्योंकि जिस प्रकार मनुष्यता हो तो वह मनुष्य हैं, वैसे ही गानपन हो तो वह संगीत हैं। लता के कोई भी गाना सुन लीजिए उसमें यह गानपन मौजूद मिलेगा।

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लता के सुरों का जादू

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उनके गाने की एक और विशेषता है कि उनके स्वर में निर्मलता हैं। उनसे पहले नूरजहाँ एक अच्छी गायिका थी। लता के स्वरों में कोमलता और मुग्धता हैं। मैं अगर स्वयं दिग्दर्शक होता तो लता को बहुत जटिल काम दिए बिना रहा नहीं जाता। लता के गाने की एक और विशेषता हैं कि उसका यादों में उच्चार है। उनके गीत 2 शब्द विलीन होते-होते एक दूसरे में मिल जाते हैं।

ऐसा माना जाता हैं कि लता के संगीत में वरुणरस विशेष प्रभावशाली रीति से व्यक्त होता है। मेरा अपना मत हैं कि लता मंगेशकर ने वरुणरस के साथ इतना न्याय नहीं किया है। उनके गायन में एक और कमी हैं, यह कहना मुश्किल होगा इसमें लता का दोष कितना हैं और संगीत दिग्दर्शकों का दोष कितना है। भारतीय गायिकाओं में बेजोड़ लता मंगेशकर का गाना समानता ऊंची पट्टी में रहता है। दिग्दर्शक अधिक ऊंची पट्टी यानी ऊचें स्वरों में गाते हैं और उससे अकारण ही चिल्लवाते हैं। प्रश्न पूछा जाता है कि शास्त्रीय संगीत में लता का स्थान कौन सा है तो मेरे मत से यह प्रश्न खुद ही प्रयोजनहीन हैं। इसका कारण यह है कि शास्त्रीय संगीत और चिटपटे संगीत में तुलना हो ही नहीं सकती है। जहां गंभीर शास्त्रीय संगीत का स्थाई भाव है वही द्रुत लय और चपलता चित्रपट का मुख्य गुणधर्म हैं। लता मंगेशकर द्वारा जीते गए सुप्रसिद्ध अवार्ड्स निम्नलिखित है:

अवार्ड्स वर्ष
1. भारत रत्न ( 2001 )
2. पद्म विभूषण ( 1999 )
3. दादा साहेब फाल्के अवार्ड ( 1990 )
4. पद्म भूषण ( 1969 )
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चित्रपट गाने की विशेषता

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शास्त्रीय संगीत में ताल अपने परिष्कृत रूप में पाई जाती है। चित्रपट संगीत में आधी तारों का उपयोग किया जाता है उसकी लयकारी बिल्कुल अलग होती है और आसान होती है। यहां गीत और आघात को ज़्यादा महत्व दिया जाता है। चित्रपट संगीत गाने वालों को शास्त्रीय संगीत की उत्तम जानकारी होना आवश्यक है और वह लता के पास हैं। लेखक मानता हैं कि 3:30 मिनट के गाए हुए गाने, चित्रपट के किसी गाने का और 18 खानदानी शास्त्र गायक की तीन साढे़ 3 घंटे की महफिल इन दोनों का कलात्मक आनंदात्मक एक ही है। 3 घंटों की रंगदार महफिल का सारा रस लताजी की 3 मिनट की ध्वनि मुद्रिका में किया जा रहा है। स्वर फ्लैट शब्दार्थ का वहां त्रिवेणी संगम होता है और महफिल की बेहोशी उस में समाई रहती हैं।

लेखक कहता है कि शास्त्र संगीत रंजक न हो तो संगीत बिल्कुल ही नीरस ठहरेगा और अनाकर्षक प्रतीत होगा‌ और उसमें कुछ कमी सी प्रतीत होगी। गाने की सारी मिठास सारी ताकत उसकी रंजकता पर निर्भर करती है रंजकता जो संगीत का ज्ञान न होने वाले व्यक्ति को भी सुरो की और आकर्षित कर दे और भाव समझा जाए। संगीत के क्षेत्र में लता का स्थान सबसे ऊपर है। 3 घंटे तो दूर की बात उनके 3 मिनट के गीत कोई पहली श्रेणी का गायक भी ढंग से नहीं कर सकता। खानदानी गायकों का यह आरोप है कि चित्रपट संगीत ने लोगों के कान बिगाड़ दिए है। सच बात तो यह है कि शास्त्रीय संगीत गायक संगीत के क्षेत्र में अपना अधिकार चाहते हैं।

लता मंगेशकर जी ने बहुत से बेहतरीन गीतों को अपनी आवाज़ दी है जिनमे से कुछ निम्नलिखित है।

सुप्रसिद्ध गीत ( फिल्म )
1. पिया तोसे नैना लगे रे ( गाइड )
2. जिया जले जां जले ( दिल से )
3. आज फिर जीने की तमन्ना है ( गाइड )
4. अजीब दास्ताँ है ये ( दिल अपना और प्रीत पराई )
5. तेरे लिए ( वीर ज़ारा )
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संगीत का बदलता स्वरुप

भारतीय गायिकाओं में बेजोड़ लता मंगेशकर
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बदलते वक्त के साथ लोगों की  शुद्ध शास्त्रीय संगीत में रुचि नहीं रही है। शास्त्रीय संगीत को पहचानना उसकी महत्वता और शुद्धि का आंकलन करना एक निश्चित समय और गंभीरता मांगता है। इस प्रक्रिया और अपनी धरोहर को संजोयें रखने के लिए सभी शास्त्रीय संगीत के कलाकार पीढ़ी दर पीढ़ी अपने घरानो और संगीत की पूजा कर रहे है। आज के चित्रपट संगीत में वो जटिलता और भाव की कुछ कमी भी है। लेकिन ये कहना भी ग़लत नहीं होगा कि संगीत के क्षेत्र में चित्रपट संगीत ही क्रांति लाया है।

चित्रपट संगीत में बहुत नए गाने गाने की गुंजाइश है। संगीत के क्षेत्र में रोज़ नए प्रयोग किए जा रहे हैं जिससे यह क्षेत्र अधिक प्रगति कर रहा है। संगीत के क्षेत्र में एक गीतकार रातभर भी अधिक समय तक टिक नहीं पाता परंतु भारतीय गायिकाओं में बेजोड़ लता मंगेशकर आधी से अधिक शताब्दियों से इस क्षेत्र में अपना स्थान बनाए हुए हैं। यह चमत्कार से कम नहीं है कि लताजी को विदेश में भी पसंद किया जाता है। यह हमारा सौभाग्य है कि हम उन्हें अपनी आंखों से घूमता फिरता देख रहे हैं।

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 कठिन शब्द

  1.   स्वाभाविकता- प्राक्रतिक 
  2.   प्रतिस्पर्धा- प्रतियोगिता 
  3.   स्माविष्ट- व्याप्त, पूर्ण 
  4.  अवलंबित- आश्रित, टिका हुआ 
  5.  गानपन- मिठास, मस्ती
  6.  उत्कटता- तेज़ी , उग्रता ,प्रजंड
  7.  मार्मिकता- अच्छी जानकारी होना 
  8.  दृष्टिकोण- नजरिया
  9.  सुसंवाद- आनंददायी, शुभ 
  10.  दिग्दर्शक- दिशाओं का ज्ञान 
  11.  परिष्कृत- स्वच्छ, निर्मल, साफ़
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भारतीय गायिकाओं में बेजोड़ लता मंगेशकर NCERT के प्रश्न-उत्तर

प्रश्न 1. लेखक ने पाठ में गानपन का उल्लेख किया है। पाठ के संदर्भ में स्पष्ट करते हुए बताएँ कि आपके विचार में इसे प्राप्त करने के लिए किस प्रकार के अभ्यास की आवश्यकता है?

उत्तर – गानपन का अर्थ हैं मीठा और सुरीला गाना जो एक इंसान को भावपूर्ण कर दें। जैसे मनुष्यता हो तो मनुष्य कहलाता है वैसे ही संगीत में गानपन होना आवश्यक है। लताजी के गानों में गानपन मौजूद हैं। इसे हासिल करने के लिए निरंतर अभ्यास करना आवश्यक हैं।

प्रश्न 2. लेखक ने लता की गायकी के किन -किन विशेषताओं को उजागर किया है ?आपको लता की गायकी में कौन सी विशेषता नज़र आती हैं ?उदाहरण सहित बताइए।

उत्तर – लेखक ने लताजी के गायकी में निम्न विशेषताओं को उजागर किया हैं।
सुरीलापन-लता के गानों  में सुरीलापन मौजूद है।
उनके स्वरों में एक मिठास और मस्ती है।
उनके गाने लोगों को बहुत पसंद आते हैं।

प्रश्न 3. लता ने करुण रस के गानों के साथ न्याय नहीं किया, जबकि श्रृंगार परक गाने में बड़ी उत्कटता से गाती है। इस कथन से आप कहां तक सहमत हैं ।

उत्तर – लेखक का यह कहना कि “लताजी ने करुण रस के गानों के साथ न्याय नहीं किया हैं ,जबकि श्रृंगार पारक गाने में बड़ी उत्कटता से गाती है।” यह बात चित्रपटों पर लागू नहीं होती है। लता मंगेशकर ने कई चित्रपटों में अपनी आवाज़ दी है उनमे कईं गीत बड़े मार्मिकता के साथ गाएं हैं जिसकी करुणा उनकी वाणी में साफ झलकती है। मैं लेखक की इस बात से सहमत नहीं हूं कि लता जी ने केवल श्रृंगार रस के गीतों के साथ ही न्याय किया है। वे सभी रस के गीतों को भली भाँती निभाना जानती है।

प्रश्न 4 . संगीत का क्षेत्र विस्तीर्ण  है। वहां अब तक अलक्षित, असंशोधित,अहष्टपूर्व ऐसा खूब बड़ा प्रांत है, तथापि बड़े जोश से इनकी खोज और उपयोग चित्रपट के लोग करते चले आ रहे हैं-इस कथन का वर्तमान फिल्मी संगीत को संदर्भ में स्पष्ट कीजिए।

उत्तर – संगीत एक विस्तृत श्रेणी का भाग है जिसका मूल उद्देश्य सिर्फ मनोरंजन नहीं रहा है। सुर, ताल, राग, श्रुतियाँ मिलकर संगीत बनाती है। इसके साथ साथ ये अथा सागर है जिसमे बहुत कुछ करने कि गुंजाइश रहती है। चित्रपट संगीत में हमारी पूर्व संस्कृति को नीव बनाकर नई रचनाये एव योजनाए विक्सित कि जा रहीं है। आजकल के संगीत में पॉप संगीत का मिश्रण किया जा रहा हैं कभी सूफ़ी और कभी लोक संगीत का। इनका जोरों शोरों से प्रचार भी किया जाता है। इस प्रकार वर्तमान फिल्मी संगीत में विस्तार हो रहा है।

प्रश्न 5. शास्त्रीय एवं चित्रपट पर दोनों तरह के संगीतों के महत्व का आधार क्या होना चाहिए? कुमार गंधर्व की इस संबंध में क्या राय है स्वयं आप क्या सोचते हैं?

उत्तर – शास्त्रीय एवं चित्रपट दोनों तरह के संगीत में रंजकता होनी चाहिए। लेखक मानते हैं चाहे शास्त्रीय संगीत हो या फिल्मी संगीत वही संगीत अधिक बेहतर माना संगीत वही माना जाता है जो श्रोताओ और सुनने वालो के हृदय तक पोहोच सकेे आनद दे सके।। क्योंकि संगीत का मूल ही आनंद है जिसकी उत्पत्ति उल्लास से हुई है। लोक संगीत अपने मनोरंजन के लिए सुनते हैं ताकि दुनिया भर कि भाग दौड़ से कुछ समय रुक कर शान्ति पूर्वक आनंद ले सकें।

प्रश्न 6. ‘चित्रपट संगीत में लोगों के कान बिगाड़ दिए’-अक्सर आरोप लगाया जाता रहा हैं। इस संदर्भ में कुमार गंधर्व की राय और अपनी राय लिखें।

उत्तर -कुमार गंधर्व इस बात से सहमत नहीं है कि चित्रपट संगीत ने लोगों के कान बिगाड़ दिए हैं। चित्रपट संगीत, संगीत के क्षेत्र में कई सुधार लाया है। आज इसी वजह से लोगों ने संगीत को समझा है। वर्तमान परिपेक्ष में मेरे हिसाब से चित्रपट संगीत शोर से भरा हुआ और बेतुके शब्दावली का प्रयोग करके तनाव पैदा करता है। जहां पुराने संगीतो में सुरीलापन शब्दों का कुछ अर्थ होता था, वहीं आज संगीत में अश्लीलता और अभद्र भाषा का उपयोग किया जाता हैं। संगीत ऐसा होना चाहिए जो हमारे मन को सुकून और आनंद की अनुभूति कराता हो ना कि उसे और विचलित करता हो।

भारतीय गायिकाओं में बेजोड़ लता मंगेशकर Class 11 MCQ

1. भारतीय गायिकाओं में बेजोड़-लता मंगेशकर के लेखक कौन हैं?
a कुमार गंधर्व
b कुमार विश्वास
c कुमार 
d कुमार भारत

उत्तर-(a)  कुमार गंधर्व

2. लता के पिता का नाम था?
a दीनानाथ मंगेशकर
b देवदास मंगेशकर
c दिवनन मंगेशकर
d देवेंद्र मंगेशकर

उत्तर-(a) दीनानाथ मंगेशकर

3. यह अद्भुत स्वर  किसका क्या है?
a लता
b आशा
c नूरजहां
d अल्का

उत्तर-(a) लता

4. लता से पहले किस गायकी का चित्रपट संगीत अधिकार था?
a नूरी
b नूरजहां
c नूतन
d नूरबेगम

उत्तर-(b) नूरजहां

5. लेखक के अनुसार कौन बीमार था?
a नूरजहां
b लता
c लेखक
d विलायत खां

उत्तर-(c) लेखक

Source:MUNIL SIR CLASSES

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