स्मृति को ‘पाथेय’ बनाने से कवि का आशय है कि जीवन की यात्रा में जब वास्तविक सुख साथ नहीं देता, तब उसके स्मरण ही मनुष्य का सहारा बनते हैं। कवि ने जिन सुखद क्षणों का स्वप्न देखा था, वे उसे जीवन में पूरी तरह प्राप्त नहीं हुए। इसके कारण वह जीवन-पथ पर स्वयं को थका और निराश अनुभव करता है।
ऐसी स्थिति में वे थोड़ी-सी सुखद स्मृतियाँ उसके लिए पाथेय का कार्य करती हैं। जिस प्रकार यात्रा में पाथेय यात्री को आगे बढ़ने की शक्ति देता है, उसी प्रकार सुख की स्मृति कवि को टूटने से बचाती है और जीवन की कठिनाइयों के बीच आगे बढ़ते रहने की प्रेरणा देती है। इसी भाव को व्यक्त करने के लिए कवि स्मृति को ‘पाथेय’ कहता है।
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