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उत्तर: ‘राम-लक्ष्मण-परशुराम संवाद’ पाठ से यह संदेश मिलता है कि हमें बिना सोचे-समझे आवेश में आकर किसी पर क्रोध नहीं करना चाहिए, क्योंकि क्रोध से परिस्थितियाँ और अधिक बिगड़ सकती हैं। परशुराम का बिना तथ्य जाने अत्यधिक क्रोध करना और लक्ष्मण की तीव्र प्रतिक्रिया दोनों ही स्थिति को तनावपूर्ण बना देते हैं। अंततः श्रीराम की विनम्र, संतुलित और मर्यादित वाणी ही स्थिति को शांत करती है। यह पाठ सिखाता है कि संयम, विनय और धैर्य से ही किसी समस्या का समाधान संभव है।
इस पाठ के अन्य प्रश्न
- अपने किसी परिचित या मित्र के स्वभाव की विशेषताएँ लिखिए।
- दूसरों की क्षमताओं को कम नहीं समझना चाहिए इस विषय पर कहानी लिखिए।
- उन घटनाओं को याद करके लिखिए जब आपने अन्याय का प्रतिकार किया हो।
- लक्ष्मण के वचनों से बढ़े हुए परशुराम जी के क्रोध को किसने और कैसे शान्त किया?
- ‘दोहा’ नामक छंद के लक्षण लिखिए।
- लक्ष्मण को परशुराम को मारने पर पाप और अपयश की सम्भावना क्यों थी?
- क्रोध पर विनय और व्यंग्य का अलग-अलग प्रभाव कैसे पड़ता है? ‘राम-लक्ष्मण-परशुराम संवाद’ के आधार पर स्पष्ट कीजिए।
- ‘कहेउ लखन मुनि सीलु तुम्हारा। को नहि जान बिदित संसारा।।’ इस कथन का आशय स्पष्ट कीजिए।
- शूरवीर और कायर में क्या अंतर बताया गया है?

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