किसी भी क्षेत्र में संगतकार की भूमिका निभाने वाले लोग अक्सर बेहद प्रतिभावान होते हैं, फिर भी वे मुख्य या शीर्ष स्थान तक नहीं पहुँच पाते। इसका सबसे बड़ा कारण यह है कि उनकी प्रतिभा का इस्तेमाल दूसरों को उभारने और मंच देने में होता है, न कि खुद आगे आने में।
संगतकार का काम होता है मुख्य कलाकार को सहारा देना, उसकी प्रस्तुति को मजबूत बनाना और पूरे प्रदर्शन को संतुलित रखना। इस प्रक्रिया में उसकी मेहनत, अभ्यास और कला तो बराबर होती है, लेकिन पहचान मुख्य कलाकार को ही मिलती है। समाज भी अक्सर वही देखता है जो सामने चमक रहा हो, पर्दे के पीछे योगदान देने वालों को नजरअंदाज कर देता है।
इसके अलावा, कई बार संगतकार खुद भी संतोष और समर्पण की भावना के कारण पीछे रह जाते हैं। वे प्रतियोगिता की बजाय सहयोग को महत्व देते हैं, इसलिए शीर्ष स्थान की दौड़ में शामिल नहीं होते। इस तरह प्रतिभा की कमी नहीं, बल्कि भूमिका की प्रकृति और सामाजिक सोच उन्हें मुख्य स्थान तक पहुँचने से रोक देती है।

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