कवि और बच्चा दोनों एक-दूसरे से पहले कभी नहीं मिले थे। इसी कारण बच्चा कवि को ध्यान से और लगातार देखता रहता है। उसने कवि की उंगलियां पकड़ रखी हैं और बिना पलक झपकाए उसे निहार रहा है। कवि को लगता है कि कहीं बच्चा देखते-देखते थक न जाए, इसलिए वह अपनी नजर हटा लेता है। लेकिन बच्चा तिरछी नजरों से फिर भी कवि को देखता रहता है। जब दोनों की नजरें मिलती हैं, तो बच्चा हल्की मुसकान बिखेर देता है।
बच्चे की यह निश्छल मुसकान कवि के मन को बहुत अच्छी लगती है। उसकी उदासी दूर हो जाती है और मन प्रसन्न हो उठता है। कवि को ऐसा अनुभव होता है मानो कमल का फूल तालाब छोड़कर उसकी झोपड़ी में खिल गया हो। उस मासूम मुसकान का इतना गहरा प्रभाव पड़ता है कि संन्यास ले चुका कवि फिर से गृहस्थ जीवन की ओर आकर्षित हो जाता है।

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