रामवृक्ष बेनीपुरी भारत के महान विचारक, स्वतंत्रता सेनानी, साहित्यकार, पत्रकार और संपादक थे। वे बीसवीं सदी के उन प्रमुख हिंदी लेखकों में से एक हैं जिन्होंने साहित्य और पत्रकारिता को नई दिशा दी। उन्होंने अपना संपूर्ण जीवन देश सेवा और साहित्य सृजन के लिए समर्पित किया था। उनकी रचनाओं में स्वाधीनता की चेतना, मनुष्य की चिंता और इतिहास की युगानुरूप व्याख्या देखने को मिलती है। अपनी विशिष्ट शैली होने के कारण उन्हें ‘कलम का जादूगर’ भी कहा जाता है। उन्होंने कथा-साहित्य एवं नाटक में नए प्रयोग करते हुए अनेक कालजयी कृतियों का सृजन किया है।
क्या आप जानते हैं कि रामवृक्ष बेनीपुरी साहित्य सृजन के साथ ही वर्ष 1920 में राष्ट्रीय स्वाधीनता आंदोलन से सक्रिय रूप से जुड़े हुए थे। इस कारण उन्हें कई बार जेल भी जाना पड़ा था। उन्होंने राष्ट्रपिता ‘महात्मा गांधी’ के नेतृत्व में चलाए गए ‘भारत छोड़ो आंदोलन’ में भी भाग लिया था। आइए अब इस लेख के माध्यम से प्रख्यात साहित्यकार रामवृक्ष बेनीपुरी का जीवन परिचय और उनकी प्रमुख रचनाओं के बारे में जानते हैं।
| नाम | रामवृक्ष बेनीपुरी |
| जन्म | 23 दिसंबर, 1899 |
| जन्म स्थान | बेनीपुर, मुजफ्फरपुर (बिहार) |
| पेशा | साहित्यकार, स्वतंत्रता सेनानी पत्रकार और संपादक |
| राजनीतिक पार्टी | कांग्रेस समाजवादी दल |
| साहित्य काल | आधुनिक युग (शुक्लोत्तर युग) |
| प्रमुख कृतियाँ | चिता के फूल (कहानी-संग्रह), लाल तारा’, माटी की मूरतें, गेहूँ और गुलाब (शब्दचित्र-संग्रह), पतितों के देश में (उपन्यास), सतरंगा इन्द्रधनुष (ललित निबंध) |
| प्रमुख पत्रिकाएं | तरुण भारत, किसान मित्र, बालक, युवक, जनवाणी और नयी धारा आदि |
| निधन | 9 सितंबर, 1968 |
This Blog Includes:
- बिहार के मुजफ्फरपुर जिले में हुआ था जन्म
- असहयोग आंदोलन के दौरान छोड़ी स्कूली शिक्षा
- स्वाधीनता सेनानी के रूप में नौ बार जेल गए
- रामवृक्ष बेनीपुरी का पत्रकारिता के क्षेत्र में योगदान
- रामवृक्ष बेनीपुरी की साहित्यिक रचनाएं
- रामवृक्ष बेनीपुरी का साहित्यिक योगदान
- रामवृक्ष बेनीपुरी की भाषा शैली
- सम्मान एवं पुरस्कार
- 68 वर्ष की आयु में हुआ निधन
- FAQs
बिहार के मुजफ्फरपुर जिले में हुआ था जन्म
ग्राम्य लोकजीवन के सुप्रसिद्ध साहित्यकार रामवृक्ष बेनीपुरी का जन्म 23 दिसंबर, 1899 में बिहार के मुजफ्फरपुर जिले के बेनीपुर गांव में एक भूमिहार ब्राह्मण परिवार में हुआ था। बताया जाता है कि अल्पायु में माता-पिता का निधन हो जाने के कारण उनका आरंभिक जीवन कठिनाइयों और संघर्षों में बीता था।
असहयोग आंदोलन के दौरान छोड़ी स्कूली शिक्षा
रामवृक्ष बेनीपुरी की प्रारंभिक शिक्षा बेनीपुर में पूरी हुई थी। जब वे मैट्रिक कक्षा में पढ़ रहे थे उसी दौरान वर्ष 1920 में महात्मा गांधी के नेतृत्व में चल रहे अहसयोग आंदोलन में भाग लेने के कारण उन्होंने स्कूली शिक्षा बीच में ही छोड़ दी। इस कारण उनका विद्यालय की शिक्षा प्राप्ति का क्रम हमेशा के लिए टूट गया। इसके बाद वे स्वतंत्र रूप से स्वाध्ययन करने लगे।
स्वाधीनता सेनानी के रूप में नौ बार जेल गए
भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन में भाग लेने के कारण रामवृक्ष बेनीपुरी अपने जीवनकाल में नौ बार जेल जाने के कारण लगभग 8 वर्ष जेल में रहे। किंतु इस दौरान उनका साहित्य के क्षेत्र में पर्दापण हो चुका था। इसके साथ ही उन्होंने अपना अध्ययन भी जारी रखा।
रामवृक्ष बेनीपुरी अपने साहित्यिक जीवनकाल में कुछ समय तक कांग्रेस समाजवादी दल के सदस्य भी रहे थे। इस दौरान वे 1957 में बिहार विधानसभा के सदस्य भी निर्वाचित हुए। इसके अलावा उन्होंने अनेक संस्थाओं का प्रतिनिधित्व किया। वे बिहार हिंदी साहित्य सम्मेलन के संस्थापक भी रहे।
रामवृक्ष बेनीपुरी का पत्रकारिता के क्षेत्र में योगदान
क्या आप जानते हैं कि रामवृक्ष बेनीपुरी की 15 वर्ष की आयु में साहित्यिक रचनाएं पत्र-पत्रिकाओं में छपने लगीं थी। इसके अलावा वे एक प्रतिभाशाली पत्रकार भी थे। उन्होंने अपने जीवनकाल में अनेक दैनिक, साप्ताहिक एवं मासिक पत्र-पत्रिकाओं का संपादन किया, जिनमें ‘बालक’,’युवक’, ‘किसान मित्र’, ‘क़ैदी’, ‘तरुण भारत’, ‘योगी’, ‘चुन्नू-मुन्नू’, ‘जनता’, ‘नयी धारा’, ‘लोक-संग्रह’, ‘तूफान’ और ‘जनवाणी’ प्रमुख हैं।
रामवृक्ष बेनीपुरी की साहित्यिक रचनाएं
रामवृक्ष बेनीपुरी ने हिंदी साहित्य के ‘शुक्लोत्तर युग’ में विभिन्न विधाओं में अनुपम कृतियों का सृजन किया हैं। किंतु गद्य की विविध विधाओं में उनके लेखन को व्यापक प्रतिष्ठा मिली है। नीचे उनकी समग्र साहित्यिक कृतियों की सूची दी जा रही है:
| प्रमुख कृतियां | |
| कहानी संग्रह | चिता के फूल |
शब्दचित्र संग्रह | लाल तारा |
| माटी की मूरतें | |
| गेहूँ और गुलाब | |
उपन्यास | पतितों के देश में |
| क़ैदी की पत्नी | |
नाटक | अम्बपाली |
| सीता की माँ | |
| संघमित्रा | |
| अमर ज्योति | |
| तथागत | |
| सिंहल विजय | |
| शकुंतला | |
| रामराज्य | |
| नेत्रदान | |
| गाँव का देवता | |
| नया समाज | |
| विजेता | |
निबंध | हवा पर |
| नई नारी | |
| वंदे वाणी विनायकौ | |
| अत्र तत्र | |
| ललित निबंध | सतरंगा इन्द्रधनुष |
| स्मृति-चित्र | गांधीनामा |
| कविता-संग्रह | नया आदमी |
राजनीति | लाल चीन |
| लाल रूस | |
| रूसी क्रांति | |
आत्मकथात्मक संस्मरण | मुझे याद है |
| ज़ंजीरें और दीवारें | |
| कुछ मैं कुछ वे | |
टीका | विद्यापति पदावली |
| बिहारी सतसई | |
| यात्रा साहित्य | पैरों में पंख बाँधकर |
| उड़ते चलो उड़ते चलो | |
जीवनी | शिवाजी |
| विद्यापति | |
| लंगट सिंह | |
| गुरु गोविंद सिंह | |
| रोज लग्ज़ेम्बर्ग | |
| जयप्रकाश | |
| कार्ल मार्क्स | |
| अन्य | विद्यापति पदावली, बिहारी सतसई, बाल साहित्य की दर्जनों पुस्तकें। |
रामवृक्ष बेनीपुरी का साहित्यिक योगदान
रामवृक्ष बेनीपुरी हिंदी साहित्य के बहुमुखी रचनाकार, स्वतंत्रता सेनानी और समाजवादी विचारक थे। उनका साहित्य ग्रामीण जीवन, किसान चेतना और राष्ट्रीय आंदोलन की संवेदनाओं से गहराई से जुड़ा है। उनकी प्रमुख कृतियों में ‘माटी की मूरतें’, ‘अमर कहानी’, ‘गेहूँ और गुलाब’, ‘सीता की माँ’ और ‘नेत्रदान’ उल्लेखनीय हैं, जिनमें सामाजिक यथार्थ और मानवीय संवेदना का सशक्त चित्रण देखने को मिलता है। उन्होंने पत्रकारिता के माध्यम से भी स्वतंत्रता संग्राम को वैचारिक बल दिया, विशेषकर ‘जनता’, ‘तरुण भारत’ और ‘युवक’ पत्रों के संपादन द्वारा। वहीं उनका संपूर्ण लेखन गांधीवादी और समाजवादी दृष्टि का संगम प्रस्तुत करता है।
रामवृक्ष बेनीपुरी की भाषा शैली
रामवृक्ष बेनीपुरी ने साहित्यकार और पत्रकार के रूप में विशेष ख्याति अर्जित की। उन्हें हिंदी साहित्य में ‘कलम का जादूगर’ कहा जाता है। उनकी साहित्यिक भाषा सरल, सुबोध, मुहावरेदार, अलंकारिक तथा व्यावहारिक है। वे वर्णन में चित्रात्मकता का समावेश करते हैं, जिससे दृश्य पाठक के सामने सजीव हो उठते हैं। वहीं आवश्यकता के अनुसार उन्होंने भाषा में संस्कृत के तत्सम-तद्भव, देशज, अंग्रेजी, फ़ारसी एवं उर्दू के प्रचलित शब्दों का भी प्रयोग किया है। शैली की दृष्टि से उन्होंने आलोचनात्मक, वर्णनात्मक तथा प्रतीकात्मक शैलियों का प्रमुख रूप से प्रयोग किया है।
सम्मान एवं पुरस्कार
भारत सरकार ने वर्ष 1999 में रामवृक्ष बेनीपुरी जी के सम्मान में एक स्मारक डाक टिकट जारी किया था। उनके सम्मान में बिहार सरकार द्वारा वार्षिक अखिल भारतीय रामवृक्ष बेनीपुरी पुरस्कार भी दिया जाता है।
68 वर्ष की आयु में हुआ निधन
रामवृक्ष बेनीपुरी का लंबी बीमारी के कारण 9 सितंबर, 1968 को बिहार के मुजफ्फरपुर में निधन हुआ था। किंतु अपनी लोकप्रिय साहित्यिक रचनाओं के कारण हिंदी साहित्य जगत में उन्हें आज भी याद किया जाता है।
FAQs
रामवृक्ष बेनीपुरी की प्रमुख रचनाओं में चिता के फूल (कहानी-संग्रह), लाल तारा’, माटी की मूरतें, गेहूँ और गुलाब (शब्दचित्र-संग्रह), पतितों के देश में (उपन्यास), सतरंगा इन्द्रधनुष (ललित निबंध) शामिल हैं।
रामवृक्ष बेनीपुरी की साहित्यिक विशेषतएं उनकी जीवंत, जनपक्षधर और चित्रात्मक भाषा, लोकजीवन के यथार्थ चित्रण तथा सामाजिक-राजनीतिक चेतना से ओत-प्रोत अभिव्यक्ति में निहित हैं।
रामवृक्ष बेनीपुरी ने मुख्यतः ‘बालक’, ‘युवक’, ‘क़ैदी’, ‘लोक-संग्रह’, ‘कर्मवीर’ ‘तरुण भारत’, ‘किसान मित्र’, ‘गोलमाल’, ‘तूफ़ान’ और ‘हिमालय’ पत्रिकाओं का संपादन किया है।
रामवृक्ष बेनीपुरी का जन्म बिहार के मुजफ्फरपुर जिले के बेनीपुर गांव में 23 दिसंबर, 1899 को हुआ था। वहीं, उनका निधन 9 सितंबर, 1968 को 68 वर्ष की आयु में हुआ।
रामवृक्ष बेनीपुरी की साहित्यिक भाषा मुख्यतः खड़ी बोली हिंदी थी, जिसमें लोकभाषा, उर्दू-फ़ारसी और देशज शब्दों का सजीव मिश्रण देखने को मिलता है।
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