पहलवान की ढोलक एनसीइआरटी कक्षा 12

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पहलवान की ढोलक

पहलवान की ढोलक को लिखा है महान लेखक फणीश्वर नाथ रेणु ने। फणीश्वर नाथ रेणु जी ने ऐसी कई रचनाएं लिखी हैं। हम यहां उन्ही के द्वारा पहलवान की ढोलक पाठ से आपके सामने लेखक परिचय, पाठ का सारांश, कठिन शब्द, MCQ और प्रश्न-उत्तर आपके सामने लाएंगे। चलिए, जानते हैं पहलवान की ढोलक को इस ब्लॉग की मदद से।

किताब NCERT
बोर्ड CBSE
कक्षा कक्षा 12
विषय हिंदी आरोह
पाठ संख्या 14
पाठ का नाम पहलवान की ढोलक
मध्यम हिंदी

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लेखक परिचय

पहलवान की ढोलक
Source – Nayiwalistory

हिंदी-साहित्य के लोकप्रिय लेखक फणीश्वर नाथ रेणु का जन्म 4 मार्च 1921 को बिहार के पूर्णिया जिले के औराही हिंगना में हुआ था। इन्होंने 1942 के ‘भारत छोड़ो आंदोलन’ में बढ़-चढ़कर भाग लिया और 1950 में नेपाली जनता को राजशाही दमन से मुक्ति दिलाने के लिए भरपूर योगदान दिया। इन्होंने पहलवान की ढोलक जैसी कई रचनाएं की थी. इनकी साहित्य-साधना व राष्ट्रीय भावना के मद्देनजर भारत सरकार ने इन्हें पदमश्री से नवाजा था। 11 अप्रैल 1977 को 56 वर्ष की उम्र में पटना में इनका निधन हो गया था।

हिंदी कथा-साहित्य में रेणु का प्रमुख स्थान है। इनकी रचनाएँ निम्नलिखित हैं-

उपन्यास-मैला आँचल, परती परिकथा, दीर्घतपा, कितने चौराहे ।
कहानी-संग्रह-ठुमरी, अगिनखोर, आदिम रात्रि की महक, एक श्रावणी दोपहरी की धूप।
संस्मरण-ऋणजल धनजल, वनतुलसी की गंध, श्रुत-अश्रुत पूर्व।
रिपोतज-नेपाली क्रांति कथा। इनकी तमाम रचनाएँ पाँच खंडों में ‘रेणु रचनावली’ के नाम से प्रकाशित हैं।
साहित्यिक विशेषताएँ-हिंदी साहित्य में फणीश्वरनाथ रेणु आंचलिक साहित्यकार के रूप में प्रसिद्ध रहे हैं। इन्होंने विभिन्न राजनैतिक व सामाजिक आंदोलनों में भी सक्रिय भागीदारी की। इनकी यह भागीदारी एक ओर देश के निर्माण में सक्रिय रही तो दूसरी ओर रचनात्मक साहित्य को नया रूप देने में सहायक रही।

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पाठ प्रतिपाद्य

पहलवान की ढोलक’ कहानी व्यवस्था के बदलने के साथ लोक-कला और इसके कलाकार के अप्रासंगिक हो जाने की कहानी है। राजा साहब की जगह नए राजकुमार का आकर जम जाना सिर्फ़ व्यक्तिगत सत्ता-परिवर्तन नहीं, बल्कि जमीनी पुरानी व्यवस्था के पूरी तरह उलट जाने और उस पर सभ्यता के नाम पर एकदम नई व्यवस्था के आरोपित हो जाने का प्रतीक है। यह ‘भारत’ पर ‘इंडिया’ का छा जाना है, जो लुट्टन पहलवान को लोक-कलाकार के आसन से उठाकर पैट-भरने के लिए हाय-तौबा करने वाली नीचता की भूमि पर पटक देती है।

ऐसी स्थिति में गाँव की गरीबी पहलवानी जैसे शौक को क्या पालती? फिर भी, पहलवान जीवट ढोल के बोल में अपने आपको न सिर्फ़ जिलाए रखता है, बल्कि भूख व महामारी से दम तोड़ रहे गाँव को मौत से लड़ने की ताकत भी प्रदान करता है। कहानी के अंत में भूख-महामारी की शक्ल में आई मौत की साजिश जब लुट्टन की भरी-पूरी पहलवानी को फटे ढोल की पोल में बदल देते हैं तो इस करुणा/त्रासदी में लुट्टन हमारे सामने कई सवाल छोड़ जाता है। मनुष्यता की साधना और जीवन-सौंदर्य के लिए लोक-कलाओं को प्रासंगिक बनाए रखने हेतु हमारी क्या भूमिका हो सकती है? यह पाठ ऐसे कई प्रश्न छोड़ जाता है।

सारांश

सर्दी का मौसम था और ऊपर से गाँव में मलेरिया व हैजे का प्रकोप। अमावस्या की रात में आकाश के तारे ही रौशनी चमका रहे थे। सियारों व उल्लुओं की डरावनी आवाज गूँज रही थी। कभी किसी झोपड़ी से कराहने की आवाज तथा कभी-कभी बच्चों के रोने की आवाज आती थी। सायं या रात्रि को सब मिलकर रोते थे। इस सारे माहौल में पहलवान की ढोलक संध्या से प्रात:काल तक एक ही गति से बजती रहती थी। यह आवाज गाँव में उर्जा भरती थी।

  • लुट्टन पहलवान गाँव में प्रसिद्ध था। नौ वर्ष की आयु से वह अनाथ था। शादी हो चुकी थी। विधवा सास ने उसे पाला। वह गाय चराता, ताजा दूध पीता तथा कसरत करता था। गाँव के लोग उसकी सास को तंग किया करते थे इसलिए लुट्टन इनसे बदला लेना चाहता था।
  • कसरत के कारण वह किशोरावस्था में ही पहलवान बन गया। एक बार लुट्टन श्यामनगर मेला में ‘दंगल’ देखने गया। पहलवानों की कुश्ती व दाँव-पेंच देखकर उसने ‘शेर के बच्चे’ को चुनौती दे डाली। ‘शेर के बच्चे’ का असली नाम था-चाँद सिंह। उसका गुरु पहलवान बादल सिंह था। तीन ही दिन में उसने पंजाबी व पठान पहलवानों को हरा दिया था। श्यामनगर के दंगल व शिकार-प्रिय वृद्ध राजा साहब उसे दरबार में रखने की सोच रहे थे कि लुट्टन ने शेर के बच्चे को चुनौती दे दी।
  • चाँद सिंह बाज की तरह लुट्टन पर टूटा, लेकिन वह सफ़ाई से आक्रमण को सँभालकर उठ खड़ा हुआ। राजा ने लुट्टन को कुश्ती से हटने को कहा। सबने उसे समझाया लेकिन लुट्टन बोला कि इजाजत न मिली तो पत्थर पर माथा पटककर मर जाएगा। पंजाबी पहलवान लुट्टन को गालियों दे रहे थे। दर्शक उसे लड़ने की अनुमति देना चाहते थे। राजा साहब ने इजाजत दे दी। लुट्टन का ढोल बजने लगा था। चाँद ने उसे कसकर दबा लिया था। वह उसे चित्त करने की कोशिश में था। लुट्टन के समर्थन में सिर्फ़ ढोल की आवाज थी, जबकि चाँद के पक्ष में राजमत व बहुमत था।
  • लुट्टन की आँखें बाहर निकल रही थीं, तभी ढोल की पतली आवाज सुनाई दी ’धाक-धिना, तिरकट-तिना, धाक-धिना, तिरकट-तिना।’ इसका अर्थ था-दाँव काटो, बाहर हो जाओ। लुट्टन ने दाँव काटी तथा लपक कर चाँद की गर्दन पकड़ ली।
  • ढोल ने आवाज दी-चटाक्-चट्-धा अर्थात उठाकर पटक दे। लुट्टन ने दाँव व जोर लगाकर चाँद को जमीन पर दे मारा। ढोलक ने ‘धिना-धिना, धिक-धिना’ कहा और लुट्टन ने चाँद सिंह को चारों खाने चित्त कर दिया। ढोलक ने ‘वाह बहादुर!” की ध्वनि की तथा जनता ने माँ दुर्गा की, महावीर जी की, राजा की जय-जयकार की। लुट्टन ने सबसे पहले ढोलों को प्रणाम किया और फिर दौड़कर राजा साहब को गोद में उठा लिया और उन्होंने उसे दरबार में रख लिया।
  • चाँद सिंह की हार चौंकाने वाली थी। राजा साहब ने लुट्टन को पुरस्कृत न करके अपने दरबार में सदा के लिए रख लिया। राज पंडित व मैनेजर ने लुट्टन का विरोध किया कि वह क्षत्रिग्र नहीं है। राजा साहब नहीं माने। लुट्टन सिंह देखते-देखते लोकप्रिय होने लगा। उसने सभी नामी पहलवानों को हराया जिसमें ‘काला खाँ’ जैसा प्रसिद्ध पहलवान भी था।
  • लुट्टन सिंह मेलों में घुटने तक लंबा चोंगा पहने, अस्त-व्यस्त पगड़ी बाँधकर मतवाले हाथी की तरह झूमता चलता। हलवाई के आग्रह पर दो सेर रसगुल्ला खाता तथा मुँह में आठ-दस पान एक साथ दूँस लेता। उसके बच्चों वाले शौक थे। उससे दंगल करने वाला कोई न था। इस तरह पंद्रह वर्ष बीत गए और उसके दो पुत्र हुए। उसकी सास मर चुकी थी और पत्नी भी स्वर्ग सिधार गई। दोनों लड़के पहलवान थे। दोनों का भरण-पोषण दरबार से हो रहा था।
  • पहलवान हर रोज सुबह उनसे कसरत करवाता। दिन में उन्हें सांसारिक ज्ञान भी देता। वह बताता कि उसका गुरु ढोल है, और कोई नहीं। अचानक राजा साहब चल बसे। नए राजकुमार ने विलायत से आकर राजकाज अपने हाथ में ले लिया। उसने पहलवानों की छुट्टी कर दी।
  • लुट्टन ढोलक कंधे से लटकाकर अपने पुत्रों के साथ गाँव लौट आया। गाँव वालों ने उसकी झोपड़ी बना दी तथा वह गाँव के नौजवानों व चरवाहों को कुश्ती सिखाने लगा। खाने-पीने का खर्च गाँव वालों पर था। गरीबी से किसानों व मजदूरों के बच्चे स्कूल में आने बंद हो गए। अब वह अपने लड़कों को ही ढोल बजाकर कुश्ती सिखाता।
  • लड़के दिनभर मजदूरी करने लगे थे। गाँव पर अचानक संकट आ गया। सूखे के कारण अन्न की कमी हो गई तथा फिर मलेरिया व हैजा फैला। सभी घर खाली हो गए। प्रतिदिन दो-तीन लाशें उठने लगीं। लोग चुप रहने लगे। ऐसे समय में केवल पहलवान की ढोलक ही बजती थी जो गाँव के अधमरे, दवाई रहित व्यक्तियों में शक्ति भरती थी। एक दिन पहलवान के दोनों बेटे भी चल बसे। पहलवान ने सारी रात ढोल पीटा। दोनों पेट के बल पड़े हुए थे। उसने लंबी साँस लेकर कहा-दोनों बहादुर गिर पड़े। उस दिन उसने राजा श्यामानंद की दी हुई रेशमी जाँघिया पहनी और सारे शरीर पर मिट्टी मलकर थोड़ी कसरत की फिर दोनों पुत्रों को कंधों पर लादकर नदी में बहा आया। इस घटना से सब की हिम्मत टूट गई।
  • रात में फिर पहलवान की ढोलक बजने लगी तो लोगों की हिम्मत दुगुनी बढ़ गई। चार-पाँच दिनों के बाद एक रात ढोलक की आवाज नहीं सुनाई पड़ी। सुबह उसके शिष्यों ने देखा कि पहलवान की लाश ‘चित’ पड़ी है। शिष्यों ने बताया कि उसके गुरु ने कहा था कि उसके शरीर को चिता पर पेट के बल लिटाया जाए क्योंकि वह कभी ‘चित’ नहीं हुआ और चिता सुलगाने के समय ढोल जरूर बजाना।

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कठिन शब्द

पहलवान की ढोलक से संबंधित कठिन शब्द नीचे दिए गए हैं-

अमावस्या अँधेरी रात
प्रात:काल सुबह
अनाथ माँ-बाप का न होना
किशोरावस्था लड़कपन
दंगल कुश्ती
शिकार-प्रिय शिकार का शौक़ीन
राजमत लोगों का समर्थन
पुरस्कृत इनाम देना
क्षत्रिग्र क्षत्रिय
सांसारिक संसार का ज्ञान
विलायत विदेश
चरवाहों पशु चराने वाले
चित हार जाना

पहलवान की ढोलक PDF

पहलवान की ढोलक से संबंधित प्रश्नोत्तर

लुट्टन कौन था? उसका नाम क्यों फैला था?

उत्तर: लुट्टन के माँ-बाप उस समय मर गए थे जब वह मात्र नौ वर्ष का था। उसका पालन-पोषण उसकी विधवा सास ने किया। उसने चाँद सिंह जैसे प्रसिद्ध पहलवान को हराकर राज पहलवान बनने का गौरव प्राप्त किया था। इस कारण उसका नाम फैला था।

कुश्ती के समय ढोल की आवाज़ से लुट्टन पर क्या प्रभाव पड़ा?

उत्तर: ढोल बजते ही लुट्टन की रगों में खून दौड़ने लगता था। उसे हर थाप में नए दाँव-पेंच सुनाई पड़ते थे। ढोल की आवाज उसे साहस प्रदान करती थी। इस वजह से वह दंगल भी जीता।

प्रश्न 3: ढोलक की आवाज़ का पूरे गाँव पर क्या असर होता था? (CBSE-2008, 2012, 2015)

उत्तर: महामारी से ग्रामीणों को ढोलक की आवाज संजीवनी शक्ति की तरह मौत से लड़ने की प्रेरणा देती थी। यह आवाज बूढ़े-बच्चों व जवानों की आँखों के आगे दंगल का दृश्य बना देती थी। उनके अंदर बिजली दौड़ जाती थी।

महामारी फैलने के बाद गाँव में सूर्योदय और सूर्यास्त के दृश्य में क्या अंतर होता था? (CBSE-2008)

उत्तर: महामारी ने सारे गाँव को बुरी तरह से प्रभावित किया था। लोग सुर्योदय होते ही अपने मृत संबंधियों की लाशें उठाकर गाँव के श्मशान की ओर जाते थे ताकि उनका अंतिम संस्कार किया जा सके। सूर्यास्त होते ही सारे गाँव में मातम छा जाता था।

लुट्टन पहलवान की अंतिम इच्छा क्या थी?

उत्तर: पहलवान की अंतिम इच्छा थी कि मरने के बाद उसे चिता पर पेट के बल लिटा दिया जाए क्योंकि वह जीवन में कभी ‘चित’ नहीं हुआ। इसके अलावा चिता सुलगाने के समय ढोलक बजाया जाए।

गाँव किससे पीड़ित है?

गाँव हैजे व मलेरिया की बीमारी से पीड़ित है।

गाँव किसके समान काँप रहा है?

गाँव मलेरिया व हैजे से पीड़ित है तथा वह भयभीत शिशु की तरह थर-थर काँप रहा है।

गाँव में ऐसा क्या हो गया था कि अँधेरी रात चुपचाप आंसू बहा रही थी?

गाँव में हैजे व मलेरिया का प्रकोप था। इसके कारण घर-घर में मौतें हो रही थीं। चारों ओर मौत का सन्नाटा था। इसी कारण अँधेरी रात चुपचाप आँसू बहा रही थी।

‘निस्तब्धता’ किसे कहते हैं? उस रात की निस्तब्धता क्या प्रयत्न कर रही थी और क्यों?

‘निस्तब्धता’ का अर्थ है-मौन या गतिहीनता। रात के अँधेरे में सब कुछ शांत हो जाता है। उस रात की निस्तब्धता करुण सिसकियों व आहों को बलपूर्वक दबाने की कोशिश कर रही थी क्योंकि दिन में मौत का तांडव रहता था तथा हर तरफ चीख-पुकार होती थी।

रात्रि की भीषणता कैसी थी?

लेखक ने रात्रि की भीषणताओं के बारे में बताते हुए कहता है कि जाड़े की अमावस्या की रात थी। मलेरिया व हैजे का प्रकोप था। चारों तरफ निस्तब्धता थी।

ढोलक की कौन – सी आवाज क्या असर दिखाती थी?

ढोलक की आवाज थी-चट्-धा, गिड़-धा यानी आ जा भिड़ जा। बीच-बीच में ‘चटाक्-चट्-धा’ यानी ‘उठाकर पटक दे!’ की आवाज आती थी। यह आवाज मृत गाँव में जीवन-आशा का संचार करती थी।

‘धारोष्ण दूध’ से क्या तात्पर्य है? बचपन में लुट्टन और क्या- क्या काम किया करता था?

इसका अर्थ है-धार का गरम दूध। बचपन में लुट्टन गाय चराता था तथा कसरत करता था।

‘बिजली उत्पन्न होना’ का आशय बताइए। इसका कारण क्या था?

‘बिजली उत्पन्न होना’ का अर्थ है-प्रबल जोश उत्पन्न होना। जवानी की मस्ती व ढोल की ललकारती हुई आवाज ने लुट्टन की नसों में जोश भर दिया।

राजा साहब ने लुट्टन को क्या नसीहत दी?

राजा साहब ने लुट्टन को दस रुपये का नोट दिया, उसकी हिम्मत की प्रशंसा की तथा मेला देखकर घर जाने के की नसीहत दी।

भीड़ की अधीरता का क्या कारण था?

लसिक इंग्लक चुीद थी भी नोक कुश्त देना चाहता थी इसाल वाहअर रही थी।

कौन किसकी आँखें पोंछ रहा था और क्यों?

पंजाबी पहलवानों की जमात चंद्र सिंह की आँखें पोंछ रही थी क्योंकि चंद्र सिंह को लुट्टन ने हरा दिया था। इस हार के कारण उसे राज-पहलवान का दर्जा नहीं मिला। फलत: वह दुखी था।

MCQs

लुट्टन कौन सी चीज़ बजाने का आदी था?
(क) सितार
(ख) हारमोनियम
(ग) ढोलक
(घ) तानपुरा

उत्तर: (ग)

गाँव में कौन सा मौसम था?
(क) ठंड
(ख) गर्मी
(ग) मानसून
(घ) पतझड़

उत्तर: (क)

लुट्टन किस पहलवान से लड़ने की जिद्द कर रहा था?
(क) गब्बर सिंह
(ख) भूरा सिंह
(ग) रणवीर सिंह
(घ) चाँद सिंह

उत्तर: (घ)

लुट्टन रोज़ सुबह क्या करता था?
(क) सोना
(ख) कसरत करना
(ग) खाना पकाना
(घ) झगड़ना

उत्तर: (ख)

लुट्टन के कितने बच्चे थे?
(क) 4
(ख) 1
(ग) 8
(घ) 2

उत्तर: (घ)

राजपुरोहित और मैनेजर लुट्टन का विरोध क्यों कर रहे थे ?

 A. क्योंकि लुट्टन क्षत्रिय नहीं था
 B. क्योंकि लुट्टन ने उनका कहना नहीं माना
 C. क्योंकि लुट्टन कमजोर पहलवान था
 D. क्योंकि लुट्टन ने चांद सिंह को हराया था

उत्तर: A

‘पहलवान की ढोलक’ रचना के लेखक का नाम क्या है?

A. महादेवी वर्मा
B. फणीश्वरनाथ रेणु
C. धर्मवीर भारती
D. विष्णु खरे

उत्तर: B

‘पहलवान की ढोलक’ मुख्य रूप से किसका वर्णन करती है?

A. लुट्टन पहलवान की गरीबी का
B. लुट्टन पहलवान की जिजीविषा और हिम्मत का
C. लुट्टन की त्रासदी का
D. लुट्टन की निराशा का

उत्तर: B

लुट्टन कितनी आयु में अनाथ हो गया था?

 A. 7 वर्ष की आयु में
 B. 8 वर्ष की आयु में
 C. 10 वर्ष की आयु में
 D. 9 वर्ष की आयु में

उत्तर: D

किसने लुट्टन का पालन-पोषण किया?

A. बुआ ने
B. सास ने
C. मौसी ने
D. नानी ने

उत्तर: B

गाँव में कौन-से रोग फैले हुए थे?

A. डेंगू
B. मलेरिया और हैज़ा
C. तपेदिक
D. मधुमेह

उत्तर: B

बचपन में लुट्टन क्या करता था?

A. खेलता था
B. पढ़ता था
C. गायें चराता था
D. खेती करता था

उत्तर: C

लुट्टन ने किसकी अनुमति पाकर चाँद से कुश्ती लड़ी?

A. पंचायत की
B. अपने गुरु की
C. अपनी सास की
D. राजा साहब की

उत्तर: D

लुट्टन ने किसकी प्रेरणा से कुश्ती में विजय प्राप्त की?

A. ढोलक की
B. राजा साहब की
C. लोगों की
D. पंचायत की

उत्तर: A

राजा साहब का नाम क्या था ?

A. कृष्णानंद
B. परमानंद
C. श्यामानंद
D. रामानंद

उत्तर: C

लुट्टन के कितने पुत्र थे?

A. दो
B. तीन
C. एक
D. चार

उत्तर: A

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गद्यांशों को पढ़कर पूछे गए प्रश्नों के उत्तर दीजिए

1. जाड़े का दिन। अमावस्या की रात-ठंडी और काली। मलेरिया और हैजे से पीड़ित गाँव भयात्र्त शिशु की तरह थर-थर काँप रहा था। पुरानी और उजड़ी बाँस-फूस की झोपड़ियों में अंधकार और सन्नाटे का सम्मिलित साम्राज्य! आँधेरा और निस्तब्धता !

प्रश्न

(क) लेखक किस तरह के मौसम का वर्णन कर रहा है?
(ख) गाँव किससे पीड़ित है?
(ग) गाँव किसके समान काँप रहा है?
(घ) गद्यांश के आधार पर गाँव की आर्थिक दशा का चित्रण कीजिए।

उत्तर –

(क) लेखक सर्दी के दिनों का वर्णन कर रहा है। अमावस्या की रात है। भयंकर ठंड है तथा चारों तरफ अँधेरा है।
(ख) गाँव हैजे व मलेरिया की बीमारी से पीड़ित है।
(ग) गाँव मलेरिया व हैजे से पीड़ित है तथा वह भयभीत शिशु की तरह थर-थर काँप रहा है।
(घ) गद्यांश से ज्ञात होता है कि गाँव की आर्थिक दशा दयनीय थी। घर के नाम पर टूटी-फूटी झोपड़ियाँ थीं जिनमें खुशी का नामोनिशान तक नहीं था।

2. अँधेरी रात चुपचाप आँसू बहा रही थी। निस्तब्धता करुण सिसकियों और आहों को बलपूर्वक अपने हृदय में ही दबाने की चेष्टा कर रही थी। आकाश में तारे चमक रहे थे। पृथ्वी पर कहीं प्रकाश का नाम नहीं। आकाश से टूटकर यदि कोई भावुक तारा पृथ्वी पर जाना भी चाहता तो उसकी ज्योति और शक्ति रास्ते में ही शेष हो जाती थी। अन्य तारे उसकी भावुकता अथवा असफलता पर खिलखिलाकर हँस पड़ते थे।

प्रश्न

(क) गाँव में ऐसा क्या हो गया था कि आँधेरी रात चुपचाप असू बहा रही थी?
(ख) कहानी में वातावरण-निमणि के लिए लेखक औधरी रात के स्थान पर चाँदनी रात को चुनता तो क्या अंतर आ जाता? स्पष्ट करें।
(ग) उक्त गद्यांश के आधार पर लेखक की भाषा-शैली पर टिप्पणी कीजिए।
(घ) ‘निस्तब्धता’ किसे कहते हैं? उस रात की निस्तब्धता क्या प्रयत्न कर रही थी और क्यों?

उत्तर –

(क) गाँव में हैजे व मलेरिया का प्रकोप था। इसके कारण घर-घर में मौतें हो रही थीं। चारों ओर मौत का सन्नाटा था। इसी कारण अँधेरी रात चुपचाप आँसू बहा रही थी।
(ख) कहानी में वातावरण निर्माण के लिए लेखक चाँदनी रात को चुनता तो भाव में अंतर आ जाता। चाँदनी रात प्रेम व संयोग को अभिव्यक्ति प्रदान करती है। इससे मनुष्य की व्यथा एवं दयनीय दशा का सफल चित्रण न हो पाता।
(ग) इस गद्यांश में लेखक ने चित्रात्मक व आलंकारिक भाषा का प्रयोग किया है। रात का मानवीकरण किया गया है। वह मानव की तरह शोक प्रकट कर रही है। मिश्रित शब्दावली है। खड़ी बोली में सशक्त अभिव्यक्ति है।
(घ) ‘निस्तब्धता’ का अर्थ है-मौन या गतिहीनता। रात के अँधेरे में सब कुछ शांत हो जाता है। उस रात की निस्तब्धता करुण सिसकियों व आहों को बलपूर्वक दबाने की कोशिश कर रही थी क्योंकि दिन में मौत का तांडव रहता था तथा हर तरफ चीख-पुकार होती थी।

3. रात्रि अपनी भीषणताओं के साथ चलती रहती और उसकी सारी भीषणता को ताल ठोककर ललकारती रहती थी-सिर्फ पहलवान की ढोलक! संध्या से लेकर प्रात:काल तक एक ही गति से बजती रहती-‘चट्-धा, गिड़-धा, ’ चट्-धा, गिड़ धा!’ यानी ‘आ जा भिड़ जा, आ जा, भिड़ जा!” ’ बीच-बीच में-‘चटाक्-चट्-धा, ‘चटाक्-चट्-धा!’ यानी ‘उठाकर पटक दे! उठाकर पटक दे!!’
यही आवाज मृत गाँव में संजीवनी भरती रहती थी।

प्रश्न

(क) रात्रि की भीषणताएँ कैसी  थीं ?
(ख) पहलवान की ढोलक किसको ललकारती थी?
(ग) पहलवान की ढोलक के बजने का क्या समय था?
(घ) ढोलक की कौन – सी आवाज क्या असर दिखाती थी?

उत्तर –

(क) लेखक ने रात्रि की भीषणताओं के बारे में बताते हुए कहता है कि जाड़े की अमावस्या की रात थी। मलेरिया व हैजे का प्रकोप था। चारों तरफ निस्तब्धता थी।
(ख) पहलवान की ढोलक रात्रि की भीषणता को ताल ठोककर ललकारती थी। वह एक ही गति से बजती रहती थी।
(ग) पहलवान की ढोलक बजने का समय संध्या से प्रात:काल तक का था।
(घ) ढोलक की आवाज थी-चट्-धा, गिड़-धा यानी आ जा भिड़ जा। बीच-बीच में ‘चटाक्-चट्-धा’ यानी ‘उठाकर पटक दे!’ की आवाज आती थी। यह आवाज मृत गाँव में जीवन-आशा का संचार करती थी।

4. लुट्टन के माता-पिता उसे नौ वर्ष की उम्र में ही अनाथ बनाकर चल बसे थे। सौभाग्यवश शादी हो चुकी थी, वरना वह भी माँ-बाप का अनुसरण करता। विधवा सास ने पाल-पोसकर बड़ा किया। बचपन में वह गाय चराता, धारोष्ण दूध पीताऔर कसरत किया करता था। गाँव के लोग उसकी सास को तरह-तरह की तकलीफ़ दिया करते थे; लुट्टन के सिर पर कसरत की धुन लोगों से बदला लेने के लिए ही सवार हुई थी।

प्रश्न

(क) लुट्टन कौन था? उसका नाम क्यों फैला था?
(ख) नौ वर्ष की उम्र में विवाह हो जाना लुदृटन का सौभाग्य क्यों था?
(ग) ‘धारोष्ण दूध’ से क्या तात्पर्य है? बचपन में लुदृटन और क्या- क्या काम किया करता था?
(घ) कसरत करके पहलवान बनने की इच्छा उसके मन में क्यों पैदा हुई थी?

उत्तर –

(क) लुट्टन वह बालक था जिसके माँ-बाप उस समय मर गए थे जब वह मात्र नौ बरस का था। उसका पालन-पोषण उसकी विधवा सास ने किया। उसने चाँद सिंह जैसे प्रसिद्ध पहलवान को हराकर राज पहलवान बनने का गौरव प्राप्त किया था। इस कारण उसका नाम फैला था।
(ख) लुट्टन का विवाह नौ वर्ष की आयु में हो गया था। लेखक इसे उसका सौभाग्य कहता है क्योंकि इस आयु में उसके माँ-बाप गुजर चुके थे। उसकी देखभाल करने वाला कोई नहीं था। वह भी मौत के आगोश में समा जाता। विवाह होने के कारण उसकी विधवा सास ने उसे पाला-पोसा।
(ग) इसका अर्थ है-धार का गरम दूध। बचपन में लुट्टन गाय चराता था तथा कसरत करता था।
(घ) लुट्टन की सास को गाँव के लोग तरह-तरह की तकलीफें देते थे। वह उनसे बदला लेना चाहता था इसलिए कसरत करके पहलवान बनने की इच्छा उसके मन में पैदा हुई।

5. एक बार वह ‘दंगल’ देखने श्यामनगर मेला गया। पहलवानों की कुश्ती और दाँव-पेंच देखकर उससे नहीं रहा गया। जवानी की मस्ती और ढोल की ललकारती हुई आवाज ने उसकी नसों में बिजली उत्पन्न कर दी। उसने बिना कुछ सोचे-समझे दंगल में ‘शेर के बच्चे’ को चुनौती दे दी। ‘शेर के बच्चे’ का असल नाम था चाँद सिंह। वह अपने गुरु पहलवान बादल सिंह के साथ पंजाब से पहले-पहल श्यामनगर मेले में आया था। सुंदर जवान, अंग-प्रत्यंग से सुंदरता टपक पड़ती थी। तीन दिनों में ही पंजाबी और पठान पहलवानों के गिरोह के अपनी जोड़ी और उम्र के सभी पट्ठों को पछाड़कर उसने ‘शेर के बच्चे’ की टायटिल प्राप्त कर ली थी। इसलिए वह दंगल के मैदान में लैंगोट लगाकर एक अजीब किलकारी भरकर छोटी दुलकी लगाया करता था। देशी नौजवान पहलवान उससे लड़ने की कल्पना से भी घबराते थे। अपनी टायटिल को सत्य प्रमाणित करने के लिए ही चाँद सिंह बीच-बीच में दहाड़ता फिरता था।

प्रश्न

(क) प्रथम पंक्ति में ‘वह’ कौन है? वह कहाँ गया और उस पर क्या प्रभाव पडा?
(ख) ‘बिजली उत्पन्न होना’ का आशय बताइए। इसका कारण क्या था?
(ग) शेर का बच्चा कौन था? उसने यह टायटल कैसे प्राप्त किया?
(घ) चाँद सिंह अपने टायटिल को सत्य प्रमाणित करने के लिए क्या करता था?

उत्तर –

(क) ‘वह’ लुट्टन पहलवान है। वह श्यामनगर मेले में दंगल देखने गया। वहाँ पहलवानों की कुश्ती व दाँव-पेंच देखकर उसमें जोश भर गया।
(ख) ‘बिजली उत्पन्न होना’ का अर्थ है-प्रबल जोश उत्पन्न होना। जवानी की मस्ती व ढोल की ललकारती हुई आवाज ने लुट्टन की नसों में जोश भर दिया।
(ग) ‘शेर का बच्चा” पहलवान बादल सिंह का शिष्य चाँद सिंह था। वह पंजाब से आया था। उसने तीन दिन में ही पंजाबी व पठान पहलवानों की टोली में अपनी जोड़ी व उम्र के पहलवानों को हराकर यह टायटिल प्राप्त किया।
(घ) चाँद सिंह दंगल के मैदान में लैंगोट बाँधकर अजीब किलकारी भरकर छोटी दुलकी लगाया करता था। वह बीच-बीच में दहाड़ता भी था।

6. शांत दर्शकों की भीड़ में खलबली मच गई-‘पागल है पागल, मरा-ऐं! मरा-मरा !’’ पर वाह रे बहादुर! लुट्टन बड़ी सफाई से आक्रमण को सँभालकर निकलकर उठ खड़ा हुआ और पैंतरा दिखाने लगा। राजा साहब ने कुश्ती बंद करवाकर लुट्टन को अपने पास बुलवाया और समझाया। अंत में, उसकी हिम्मत की प्रशंसा करते हुए, दस रुपये का नोट देकर कहने लगे-‘जाओ, मेला देखकर घर जाओ!’”

प्रश्न

(क) शांत दर्शकों में खलबली मचने का क्या कारण था?
(ख) लुट्टन पर किसने आक्रमण किया? उसने क्या प्रतिक्रिया जताई?
(ग) राजा साहब ने कुश्ती बीच में क्यों रुकवा दी?
(घ) राजा साहब ने लुट्टन को क्या नसीहत दी?

उत्तर –

(क) लुट्टन ने मेले के मशहूर पहलवान चाँद सिंह को चुनौती दी थी। चाँद सिंह को चुनौती देना तथा उससे कुश्ती लड़ना हँसी-खेल न था इसलिए शांत दर्शकों की भीड़ में खलबली मच गई।
(ख) लुट्टन पर चाँद सिंह ने आक्रमण किया। लुट्टन बड़ी सफ़ाई से आक्रमण को सँभालकर उठ खड़ा हुआ और पैंतरा दिखाने लगा।
(ग) राजा साहब चाँद सिंह की कुश्ती के बारे में जानते थे। वह पहले ही ‘शेर के बच्चे’ की उपाधि प्राप्त कर चुका था। लुट्टन पहली बार दंगल लड़ा था, इसलिए राजा साहब ने कुश्ती बीच में रुकवा दी।
(घ) राजा साहब ने लुट्टन को दस रुपये का नोट दिया, उसकी हिम्मत की प्रशंसा की तथा मेला देखकर घर जाने के की नसीहत दी।

7. किंतु उसकी शिक्षा-दीक्षा, सब किए-किराए पर एक दिन पानी फिर गया। वृद्ध राजा स्वर्ग सिधार गए। नए राजकुमार ने विलायत से आते ही राज्य को अपने हाथ में ले लिया। राजा साहब के समय शिथिलता आ गई थी, राजकुमार के आते ही दूर हो गई। बहुत-से परिवर्तन हुए। उन्हीं परिवर्तनों की चपेटाघात में पड़ा पहलवान भी। दंगल का स्थान घोड़े की रेस ने लिया। पहलवान तथा दोनों भावी पहलवानों का दैनिक भोजन-व्यय सुनते ही राजकुमार ने कहा-“टैरिबुल!” नए मैनेजर साहब ने कहा ‘ ” पहलवान को साफ जवाब मिल गया, राज-दरबार में उसकी आवश्यकता नहीं। उसको गिड़गिड़ाने का भी मौका नहीं दिया गया।

प्रश्न

(क) पहलवान के किए-कराए पर पानी क्यों फिरा?
(ख) सस्ता परिवर्तन के क्या परिणाम हुए?
(ग) पहलवान को राज्याश्रय क्यों नहीं मिला?
(घ) मैनेजर ने लुट्टन को कैसे निकाला2

उत्तर –

(क) पुराने राजा ने लुट्टन को राज-पहलवान बनाया था। यहाँ पर लुट्टन पंद्रह वर्ष से अपने लड़कों को शिक्षा-दीक्षा देकर भावी पहलवान बनाना चाहता था, परंतु राजा की मृत्यु होते ही उसकी सारी योजना फेल हो गई। नए राजा ने उसे निकाल दिया।
(ख) सत्ता-परिवर्तन होते ही नए राजकुमार ने विलायती ढंग से शासन शुरू किया। उसने पहलवानी की जगह घोड़े की रेस को बढ़ावा दिया, प्रशासनिक शिथिलता को दूर किया और राज-पहलवान को राज-दरबार से हटा दिया।
(ग) पहलवान व उसके भावी पहलवानों का दैनिक भोजन-व्यय अधिक था। दूसरे, नए राजा की रुचि दंगल में नहीं थी। इसलिए पहलवान को राज्याश्रय नहीं मिला।
(घ) मैनेजर नीच जाति के लुट्टन से पहले ही चिढ़ते थे। नए राजा को पहलवानों का शौक नहीं था। अत: जब उसने पहलवानों के व्यय पर एतराज जताया तो मैनेजर ने उनकी बात का समर्थन तथा उनके खर्च को ‘हौरीबुल’ बताकर पहलवानों को दरबार से हटवा दिया।

8. रात्रि की विभीषिका को सिर्फ पहलवान की ढोलक ही ललकारकर चुनौती देती रहती थी। पहलवान संध्या से सुबह तक, चाहे जिस खयाल से ढोलक बजाता हो, किंतु गाँव के अद्र्धमृत, औषधि-उपचार-पथ्य-विहीन प्राणियों में वह संजीवनी शक्ति ही भरती थी। बूढ़े-बच्चे-जवानों की शक्तिहीन आँखों के आगे दंगल का दृश्य नाचने लगता था। स्पंदन-शक्तिशून्य स्नायुओं में भी बिजली दौड़ जाती थी। अवश्य ही ढोलक की आवाज में न तो बुखार हटाने का कोई गुण था और न महामारी की सर्वनाश शक्ति को रोकने की शक्ति ही, पर इसमें संदेह नहीं कि मरते हुए प्राणियों को आँख मूंदते समय कोई तकलीफ़ नहीं होती थी, मृत्यु से वे डरते नहीं थे।

प्रश्न

(क) गद्यांश में रात्रि की किस विभीषिका की चर्चा की गई है? ढोलक उसको किस प्रकार की चुनौती देती थी।
(ख) किस प्रकार के व्यक्तियों को ढोलक से राहत मिलती थी? यह राहत कैसी थी?
(ग) ‘दंगल के दृश्य’ से लेखक का क्या अभिप्राय है? यह दृश्य लोगों पर किस तरह का प्रभाव डालता था?
(घ) पहलवान को ढोलक की आवाज कैसे लोगों में संजीवनी-शक्ति भरती थी?

उत्तर –

(क) गद्यांश में महामारी की विभीषिका की चर्चा की गई है। ढोलक की आवाज मन में उत्साह पैदा करती थी जिससे मनुष्य महामारी से निपटने को तैयार होता था।
(ख) ढोलक से महामारी के कारण अद्र्धमृत, औषधि और उपचार विहीन लोगों को राहत मिलती थी। उसकी आवाज सुनकर उनके शरीरों में दंगल जीतने का दृश्य साकार हो उठता था।
(ग) लुट्टन ढोलक की आवाज के बल पर ही दंगल जीता था। उस दृश्य को याद करके लोग उत्साह से भर उठते थे। वह उन्हें बीमारी से लड़ने की प्रेरणा देता था।
(घ) पहलवान को ढोलक की आवाज गाँव के अद्र्धमृत औषधि-उपचार-पथ्य-विहीन प्राणियों में संजीवनी शक्ति।

FAQs

पहलवान की ढोलक किसकी रचना है?

हिंदी-साहित्य के लोकप्रिय लेखक फणीश्वर नाथ रेणु का जन्म 4 मार्च 1921 को बिहार के पूर्णिया जिले के औराही हिंगना में हुआ था। उन्होंने 1942 के ‘भारत छोड़ो आंदोलन’ में बढ़-चढ़कर भाग लिया और 1950 में नेपाली जनता को राजशाही दमन से मुक्ति दिलाने के लिए भरपूर योगदान दिया। इन्होंने पहलवान की ढोलक जैसी कई रचनाएं की थी।

पहलवान की ढोलक मुख्य रूप से किसका वर्णन करती है?

पहलवान की ढोलक मुख्य रूप से काला खाँ का वर्णन करती है।

लुट्टन कौन था?

लुट्टन वह बालक था जिसके माँ-बाप उस समय मर गए थे जब वह मात्र नौ बरस का था। उसका पालन-पोषण उसकी विधवा सास ने किया। उसने चाँद सिंह जैसे प्रसिद्ध पहलवान को हराकर राज पहलवान बनने का गौरव प्राप्त किया था। इस कारण उसका नाम फैला था।

राजा ने लुट्टन को क्या कहा?

राजा ने लुट्टन को छाती से लगा लिया और उसे आशीर्वाद देते हुए कहा था- “जीता रह मेरे, बहादुर! तुमने मिट्टी की लाज रख ली।”

पहलवान की ढोलक का बजने का क्या समय था ?

पहलवान की ढोलक बजने का समय संध्या से प्रातःकाल तक का था।

लुट्टन सिंह की कीर्ति दूर-दूर तक कैसे फैल गई?

लुट्टन की कीर्ति राज पहलवान बन जाने के बाद दूर-दूर तक फैल गई। राजा ने उसे दरबार में रखा। पौष्टिक भोजन व राजा की स्नेह दृष्टि से उसने सभी नामी पहलवानों को हरा दिया।

पहलवान की ढोलक की आवाज का पूरे गाँव पर क्या असर होता था? लिखिए।

ढोलक की आवाज़ से रात की विभीषिका और सन्नाटा कम होता था महामारी से पीड़ित लोगों की नसों में बिजली सी दौड़ जाती थी, उनकी आँखों के सामने दंगल का दृश्य साकार हो जाता था और वे अपनी पीड़ा भूल खुशी-खुशी मौत को गले लगा लेते थे।

लुट्टन पहलवान ने ऐसा क्यों कहा होगा कि मेरा गुरु कोई पहलवान नहीं, यही ढोल है?

लुट्टन पहलवान ने ऐसा क्यों कहा होगा कि मेरा गुरु कोई पहलवान नहीं, यही ढोल है? उत्तर:- लुट्टन ने कुश्ती के दाँव-पेंच किसी गुरु से नहीं बल्कि ढोल की आवाज से सीखे थे। ढोल से निकली हुई ध्वनियाँ उसे दाँव-पेच सिखाती हुई और आदेश देती हुई प्रतीत होती थी।

महामारी फैलने के बाद गांव में सूर्योदय और सूर्यास्त के दृश्य में क्या अंतर होता था?

महामारी फैलने के बाद गाँव में सूर्योदय और सूर्यास्त के दृश्य में बड़ा अंतर होता था। सूर्योदय के समय कलरव, हाहाकार तथा हृदय विदारक रुदन के बावजूद भी लोगों के चेहरे पर चमक होती थी लोग एक-दूसरे को सांत्वना बँधाते रहते थे परन्तु सूर्यास्त होते ही सारा परिदृश्य बदल जाता था। लोग अपने घरों में दुबक कर बैठ जाते थे।

आशा करते हैं कि आपको पहलवान की ढोलक के बारे में महत्वपूर्ण जानकारी मिली होगी। यदि आप विदेश में पढ़ाई करना चाहते हैं तो आज ही हमारे Leverage Edu एक्सपर्ट्स को 1800572000 पर कॉल करें और 30 मिनट का फ्री सेशन बुक करें।

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