उत्तर: A, इस प्रश्न का सही उत्तर है। हिंदी में तीन प्रकार के उपसर्ग “तत्सम, तद्भव और आगत” होते हैं।
इस प्रश्न का विस्तृत उत्तर:
हिंदी व्याकरण में “उपसर्ग” एक ऐसा महत्वपूर्ण तत्व है, जो किसी शब्द के प्रारंभ में जुड़कर उसका अर्थ बदल देता है या उसमें नया अर्थ जोड़ देता है। यह शब्दों को नया रूप देने का सरल और प्रभावी माध्यम होता है। उपसर्ग संस्कृत, हिंदी और विदेशी भाषाओं से आए होते हैं। लेकिन अगर हम “उपसर्ग के प्रकार” की बात करें, तो हिंदी में मुख्य रूप से तीन प्रकार के उपसर्ग माने गए हैं – संस्कृत से लिए गए उपसर्ग, हिंदी मूल उपसर्ग, और विदेशी भाषाओं से लिए गए उपसर्ग।
तत्सम उपसर्ग (संस्कृत उपसर्ग)
तत्सम उपसर्ग वे उपसर्ग होते हैं जो संस्कृत से सीधे हिन्दी में आए हैं और जिनका रूप तथा उच्चारण मूल संस्कृत के जैसा ही होता है। इनका प्रयोग मुख्य रूप से क्रियाओं या संज्ञाओं के पहले किया जाता है ताकि शब्द में नया भाव या अर्थ जुड़ सके।
उदाहरण के लिए:
- प्र + गति = प्रगति (अर्थ: आगे बढ़ना)
- वि + ज्ञान = विज्ञान (अर्थ: विशेष ज्ञान)
- सम + भाव = समभाव (अर्थ: समान दृष्टिकोण)
तद्भव उपसर्ग (हिन्दी उपसर्ग)
‘तद्भव’ शब्द का अर्थ है – जो संस्कृत से उत्पन्न होकर समय के साथ रूप बदल चुका हो। इस प्रकार, तद्भव उपसर्ग वे उपसर्ग होते हैं जो मूलतः संस्कृत भाषा से निकले हैं लेकिन लोकभाषाओं से होते हुए हिन्दी में पहुंचे हैं और अब हिन्दी का स्वाभाविक हिस्सा बन चुके हैं। ये उपसर्ग शुद्ध संस्कृत नहीं होते, बल्कि अपभ्रंश या प्राकृत के माध्यम से विकसित होते हैं।
आगत उपसर्ग (उर्दू उपसर्ग)
आगत उपसर्ग वे उपसर्ग होते हैं जो हिंदी में अन्य भाषाओं से आए हैं, विशेषकर उर्दू, फारसी और अरबी से। ये उपसर्ग हिंदी शब्दों के साथ जुड़कर नए शब्द बनाते हैं और उनके अर्थ को विस्तृत या विशिष्ट बनाते हैं।
उदाहरण के तौर पर:
- बेनाम – “बे” उपसर्ग + “नाम” = जिसका नाम न हो।
- नालायक – “ना” उपसर्ग + “लायक” = जो योग्य न हो।
- बदनाम – “बद” उपसर्ग + “नाम” = जिसकी बुरी छवि हो।
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