Galta Loha Class 11 Ncert Solutions

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Galta Loha Class 11 NCERT Solutions

गलता लोहा” शेखर जोशी द्वारा लिखित एक ऐसी कहानी है जिसमें आधुनिक जीवन के यथार्थ का मार्मिक चित्रण है। यहाँ लेखक ने जातीय अभियान को पिघलते और उसे रचनात्मक कार्य में ढलते दिखाया है। यहाँ कहानी के सारांश के साथ-साथ परीक्षा के लिए उपयोगी प्रश्न के उत्तर दिए गए हैं। तो चलिए जानते हैं Galta Loha के बारे में Leverage Edu के साथ।

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लेखक परिचय

जीवन परिचय- शेखर जोशी का जन्म उत्तरांचल के अल्मोड़ा में 1932 ई. में हुआ। इनकी प्रारंभिक शिक्षा अल्मोड़ा में हुई। बीसवीं सदी के छठे दशक में हिंदी कहानी में बड़े परिवर्तन हुए। इस समय एक साथ कई युवा कहानीकारों ने परंपरागत तरीके से हटकर नई तरह की कहानियाँ लिखनी शुरू कीं। इस तरह कहानी की विधा साहित्य-जगत के केंद्र में आ खड़ी हुई। इस नए उठान को नई कहानी आंदोलन नाम दिया। इस आंदोलन में शेखर जोशी का स्थान अन्यतम है। इनकी साहित्यिक उपलब्धियों को देखते हुए इन्हें पहल सम्मान प्राप्त हुआ।

रचनाएँ- इनकी रचनाएँ निम्नलिखित हैं-
कहानी-संग्रह-कोसी का घटवार, साथ के लोग, दाज्यू, हलवाहा, नौरंगी बीमार है।
शब्दचित्र-संग्रह-एक पेड़ की याद।
इनकी कहानियाँ कई भारतीय भाषाओं के अतिरिक्त अंग्रेजी, पोलिश और रूसी में भी अनूदित हो चुकी है। इनकी प्रसिद्ध कहानी दाज्यू पर चिल्ड्स फिल्म सोसाइटी द्वारा फिल्म का निर्माण भी हुआ है।

साहित्यिक परिचय- शेखर जोशी की कहानियाँ नई कहानी आदोलन के प्रगतिशील पक्ष का प्रतिनिधित्व करती हैं। समाज का मेहनतकश और सुविधाहीन तबका इनकी कहानियों में जगह पाता है। निहायत सहज एवं आडंबरहीन भाषा-शैली में वे सामाजिक यथार्थ के बारीक नुक्तों को पकड़ते और प्रस्तुत करते हैं। इनके रचना-संसार से गुजरते हुए समकालीन जनजीवन की बहुविध विडंबनाओं को महसूस किया जा सकता है। ऐसा करने में इनकी प्रगतिशील जीवन-दृष्टि और यथार्थ-बोध का बड़ा योगदान रहा है।

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Galta Loha पाठ का सारांश

गलता लोहा कहानी में समाज के जातिगत विभाजन पर कई कोणों से टिप्पणी की गई है। यह कहानी लेखक के लेखन में अर्थ की गहराई को दर्शाती है। इस पूरी कहानी में लेखक की कोई मुखर टिप्पणी नहीं है। इसमें एक मेधावी, किंतु निर्धन ब्राहमण युवक मोहन किन परिस्थितियों के चलते उस मनोदशा तक पहुँचता है, जहाँ उसके लिए जातीय अभिमान बेमानी हो जाता है। सामाजिक विधि-निषेधों को ताक पर रखकर वह धनराम लोहार के आफर पर बैठता ही नहीं, उसके काम में भी अपनी कुशलता दिखाता है। मोहन का व्यक्तित्व जातिगत आधार पर निर्मित झूठे भाईचारे की जगह मेहनतकशों के सच्चे भाईचारे को प्रस्तावित करता प्रतीत होता है मानो लोहा गलकर नया आकार ले रहा हो।

मोहन के पिता वंशीधर ने जीवनभर पुरोहिती की। अब वृद्धावस्था में उनसे कठिन श्रम व व्रत-उपवास नहीं होता। उन्हें चंद्रदत्त के यहाँ रुद्री पाठ करने जाना था, परंतु जाने की तबियत नहीं है। मोहन उनका आशय समझ गया, लेकिन पिता का अनुष्ठान कर पाने में वह कुशल नहीं है। पिता का भार हलका करने के लिए वह खेतों की ओर चला, लेकिन हँसुवे की धार कुंद हो चुकी थी। उसे अपने दोस्त धनराम की याद आ गई। वह धनराम लोहार की दुकान पर धार लगवाने पहुँचा।

धनराम उसका सहपाठी था। दोनों बचपन की यादों में खो गए। मोहन ने मास्टर त्रिलोक सिंह के बारे में पूछा। धनराम ने बताया कि वे पिछले साल ही गुजरे थे। दोनों हँस-हँसकर उनकी बातें करने लगे। मोहन पढ़ाई व गायन में निपुण था। वह मास्टर का चहेता शिष्य था और उसे पूरे स्कूल का मॉनीटर बना रखा था। वे उसे कमजोर बच्चों को दंड देने का भी अधिकार देते थे। धनराम ने भी मोहन से मास्टर के आदेश पर डडे खाए थे। धनराम उसके प्रति स्नेह व आदरभाव रखता था, क्योंकि जातिगत आधार की हीनता उसके मन में बैठा दी गई थी। उसने मोहन को कभी अपना प्रतिद्वंद्वी नहीं समझा।

धनराम गाँव के खेतिहर या मजदूर परिवारों के लड़कों की तरह तीसरे दर्जे तक ही पढ़ पाया। मास्टर जी उसका विशेष ध्यान रखते थे। धनराम को तेरह का पहाड़ा कभी याद नहीं हुआ। इसकी वजह से उसकी पिटाई होती। मास्टर जी का नियम था कि सजा पाने वाले को अपने लिए हथियार भी जुटाना होता था। धनराम डर या मंदबुद्ध होने के कारण तेरह का पहाड़ा नहीं सुना पाया। मास्टर जी ने व्यंग्य किया-‘तेरे दिमाग में तो लोहा भरा है रे। विद्या का ताप कहाँ लगेगा इसमें?”

इतना कहकर उन्होंने थैले से पाँच-छह दरॉतियाँ निकालकर धनराम को धार लगा लाने के लिए पकड़ा दी। हालाँकि धनराम के पिता ने उसे हथौड़े से लेकर घन चलाने की विद्या सिखा दी। विद्या सीखने के दौरान मास्टर त्रिलोक सिंह उसे अपनी पसंद का बेंत चुनने की छूट देते थे, परंतु गंगाराम इसका चुनाव स्वयं करते थे। एक दिन गंगाराम अचानक चल बसे। धनराम ने सहज भाव से उनकी विरासत सँभाल ली।

इधर मोहन ने छात्रवृत्ति पाई। इससे उसके पिता वंशीधर तिवारी उसे बड़ा आदमी बनाने का स्वप्न देखने लगे। पैतृक धंधे ने उन्हें निराश कर दिया था। वे कभी परिवार का पूरा पेट नहीं भर पाए। अत: उन्होंने गाँव से चार मील दूर स्कूल में उसे भेज दिया। शाम को थकामाँदा मोहन घर लौटता तो पिता पुराण कथाओं से उसे उत्साहित करने की कोशिश करते। वर्षा के दिनों में मोहन नदी पार गाँव के यजमान के घर रहता था। एक दिन नदी में पानी कम था तथा मोहन घसियारों के साथ नदी पार कर घर आ रहा था। पहाड़ों पर भारी वर्षा के कारण अचानक नदी में पानी बढ़ गया। किसी तरह वे घर पहुँचे इस घटना के बाद वंशीधर घबरा गए और फिर मोहन को स्कूल न भेजा।

उन्हीं दिनों बिरादरी का एक संपन्न परिवार का युवक रमेश लखनऊ से गाँव आया हुआ था। उससे वंशीधर ने मोहन की पढ़ाई के संबंध में अपनी चिंता व्यक्त की तो वह उसे अपने साथ लखनऊ ले जाने को तैयार हो गया। उसके घर में एक प्राणी बढ़ने से कोई अंतर नहीं पड़ता। वंशीधर को रमेश के रूप में भगवान मिल गया। मोहन रमेश के साथ लखनऊ पहुँचा। यहाँ से जिंदगी का नया अध्याय शुरू हुआ। घर की महिलाओं के साथ-साथ उसने गली की सभी औरतों के घर का काम करना शुरू कर दिया। रमेश बड़ा बाबू था। वह मोहन को घरेलू नौकर से अधिक हैसियत नहीं देता था। मोहन भी यह बात समझता था। कह सुनकर उसे समीप के सामान्य स्कूल में दाखिल करा दिया गया। कारों के बोझ व नए वातावरण के कारण वह । अपनी कोई पहचान नहीं बना पाया। गर्मियों की छुट्टी में भी वह तभी घर जा पाता जब रमेश या उसके घर का कोई आदमी गाँव जा रहा होता। उसे अगले दरजे की तैयारी के नाम पर शहर में रोक लिया जाता।

मोहन ने परिस्थितियों से समझौता कर लिया था। वह घर वालों को असलियत बताकर दुखी नहीं करना चाहता था। आठवीं कक्षा पास करने के बाद उसे आगे पढ़ने के लिए रमेश का परिवार उत्सुक नहीं था। बेरोज्ग्री का तर्क देकर उसे तकनी स्कूल में दाखिल करा दिया गया। वह पहले की तरह घर व स्कूल के काम में व्यस्त रहता। डेढ़-दो वर्ष के बाद उसे कारखानों के चक्कर काटने पड़े। इधर वंशीधर को अपने बेटे के बड़े अफसर बनने की उम्मीद थी। जब उसे वास्तविकता का पता चला तो उसे गहरा दुख हुआ। धनराम ने भी उससे पूछा तो उसने झूठ बोल दिया। धनराम ने उन्हें यही कहो-मोहन लला बचपन से ही बड़े बुद्धमान थे।

इस तरह मोहन और धनराम जीवन के कई प्रसंगों पर बातें करते रहे। धनराम ने हँसुवे के फाल को बेंत से निकालकर तपाया, फिर उसे धार लगा दी। आमतौर पर ब्राहमण टोले के लोगों का शिल्पकार टोले में उठना-बैठना नहीं होता था। काम-काज के सिलसिले में वे खड़े-खड़े बातचीत निपटा ली जाती थी। ब्राहमण टोले के लोगों को बैठने के लिए कहना भी उनकी मर्यादा के विरुद्ध समझा जाता था। मोहन धनराम की कार्यशाला में बैठकर उसके काम को देखने लगा।

धनराम अपने काम में लगा रहा। वह लोहे की मोटी छड़ को भट्टी में गलाकर गोल बना रहा था, किंतु वह छड़ निहाई पर ठीक से फैंस नहीं पा रही थी। अत: लोहा ठीक ढंग से मुड़ नहीं पा रहा था। मोहन कुछ देर उसे देखता रहा और फिर उसने दूसरी पकड़ से लोहे को स्थिर कर लिया। नपी-तुली चोटों से छड़ को पीटते-पीटते गोले का रूप दे डाला। मोहन के काम में स्फूर्ति देखकर धनराम अवाक् रह गया। वह पुरोहित खानदान के युवक द्वारा लोहार का काम करने पर आश्चर्यचकित था। धनराम के संकोच, धर्मसंकट से उदासीन मोहन लोहे के छल्ले की त्रुटिहीन गोलाई की जाँच कर रहा था। उसकी आँखों में एक सर्जक की चमक थी।

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शब्दार्थ

  1. अनायास-बिना प्रयास के
  2. शिल्पकार-कारीगर
  3.  अनुगूँज-प्रतिध्वनि
  4. निहाई-लोहे का ठोस टुकड़ा जिस पर लोहार लोहे को रखकर पीटते हैं
  5.  ठनकता-कसा हुआ तेज स्वर
  6.  खनक-आवाज
  7.  हँसुवा-घास काटने का औजार
  8. बूते-वश
  9.  पुरोहिताई-पुरोहित का काम करना
  10.  यजमान-पूजा-पाठ कराने वाला
  11.  निष्ठा-लगन
  12. संयम-नियंत्रण
  13.  जर्जर-जो कमजोर एवं बेकार हो, टूटा-फूटा
  14.  उपवास-भूखे रहना
  15. नि:श्वास-गहरी साँस
  16.  रुद्रीपाठ-भगवान शंकर की पूजा के लिए मंत्र पढ़ना
  17. आशय-मतलब
  18. अनुष्ठान-धार्मिक कार्य
  19. अनुत्तरित-बिना उत्तर पाए
  20. कुंद-धारहीन
  21. धौंकनी-लोहे की नली
  22. कनिस्तर-लोहे का चौकोर पीपा
  23. पारखी-परखने की क्षमता रखने वाला
  24. धमाचौकड़ी-उछल-कूद साँप सुंघ जाना-डर जाना
  25. समवेत-सामूहिक
  26. कुशाग्र-तेज
  27. मॉनीटर—प्रमुख
  28. हमजोली-साथी
  29.  हीनता-छोटापन
  30.  प्रतिदवंदवी-दुश्मन
  31.  गुंजाइश-जगह
  32. दूणी-दुगुना
  33. सटाक्-डडा मारने की आवाज़
  34.  संटी-छड़ी
  35. घोटा लगाना-रटना
  36. चाबुक लगाना-चोट करना
  37. ताप-गरमी
  38. सामथ्र्य-शक्ति
  39. घन-बड़ा व भारी हथौड़ा
  40. प्रसाद देना-दंड के रूप में वार
  41. विरासत-पुरखों से प्राप्त ज्ञान, संपत्ति आदि
  42. पैतृक-माँ-बाप का
  43. दारिद्रय-गरीबी
  44. विदयाव्यसनी-विद्या पाने की ललक रखने वाला
  45.  उत्साहित-जोश में लाना
  46. डेरा तय करना-रहने का स्थान निर्धारित करना
  47. पात-पतेल-पत्ते आदि
  48. रेला-समूह
  49. बिरादरी-जाति
  50. साक्षात्-सामने
  51.  हाथ, बँटाना-सहयोग करना
  52. हैसियत-सामथ्र्य, शक्ति
  53. हीला-हवाली-ना-नुकुर
  54. मेधावी-होशियार
  55. लीक पर चलना-परंपरा के आधार पर चलन्
  56.  चारो’ न होना-उपाय न होना
  57. मुद्दा-विषय
  58.  बाबत-के बारे में
  59. स्वप्नभग सपना दृउन! सैक्नेटेरियट-सचिवालयै
  60. फाल-लोहे का हिस्सा
  61.  तत्काल-तुरंत
  62. मर्यादा-मान-सम्मान
  63. असमंजस-दुविधा
  64.  सँड़सी-लोहे को पकड़ने का कैंचीनुमा औज़ार
  65.  अभ्यस्त-अभ्यास से सँवरा
  66. सुघड़-सुंदर आकार वाला
  67. हस्तक्षेप-दखल
  68. आकस्मिक-अचानक
  69. अवाक्-मौन, चकित
  70. हाथ डालना-काम के लिए तैयार होना
  71. शकित-संदेह
  72. धर्मसंकट-दुविधा
  73. उदासीन-हटकर
  74. त्रुटिहीन-निर्दोष
  75. सर्जक–रचनाकार
  76. स्पर्धा-होड्

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Galta Loha Question Answer in Hindi

प्रश्न 1. धनराम मोहन को अपना प्रतिद्वंद्वी क्यों नहीं मानता था? 

उत्तर – धनराम स्वयं को नीची और मोहन को उच्च जाति का मानता था। दूसरा, मोहन उससे पढ़ने में बहुत तेज था। मास्टर त्रिलोक सिंह मोहन को मौनीटर बनाते थे। तीसरे, लोग समझते हैं कि मोहन पढ़ा-लिखा कर एक दिन बड़ा आदमी बनेगा। ये सभी बातें धनराज मोहन से प्रतिस्पर्धा नहीं करती थीं।

प्रश्न 2 धनराम को मोहन के किस बात पर आश्चर्य होता है और क्यों ?

उत्तर – धनराम को मोहन के हथौड़ा चलाने और लोहे को गोल करने की कला पर आश्चर्य हुआ। मोहन के पास एक दम से अभिमान नहीं था। वह ब्रह्मण का लड़का था फिर भी लोहार का काम करने में नाकामपद नहीं था। धनराम को इसी बात पर आश्चर्य हुआ कि ब्रह्मण साथ भी वह लोहे का काम सहज भाव से कर रहा था।

प्रश्न 3: कहानी के उस प्रसंग का उल्लेख करें, जिसमें किताबों की विद्या और घन चलाने की विद्या का जिक्र आया है।

उत्तर :  जब मास्टर जी धनराम को 13 का पहाड़ा याद करने के लिए कहते हैं। वह याद नहीं कर पाता। तब मास्टर जी उसे अपनी पाँच दरातियाँ धार लगवाने के लिए देते हैं। मास्टर जी मानते हैं कि किताबों की विद्या का ताप लगाने का सामर्थ्य धनराम के पिता में नहीं है। धनराम ने जैसे ही हाथ-पैर चलाना सिखा उसके पिता ने उसे धौंकनी फूँकने के काम में लगा दिया। इस तरह वह समय गुजरने के साथ ही हथौड़े से लेकर घन चलाने की विद्या सीखने लगा। इस प्रसंग में किताबों की विद्या और घन चलाने की विद्या का जिक्र आया है।

प्रश्न 4: धनराम मोहन को अपना प्रतिद्वंद्वी क्यों नहीं समझता था?

उत्तर :  धनराम और मोहन दोनों अलग-अलग जाति के थे। धनराम के हृदय में बचपन से ही अपनी छोटी जाति को लेकर हीनभावना समा गई थी। इसके साथ-साथ वह मोहन की बुद्धिमानी को भी बहुत अच्छी तरह समझता था। अतः जब मोहन उसे मास्टर जी के कहने पर मारता या सज़ा देता, तो वह इन दोनों कारणों से उसे अपना प्रतिद्वंद्वी नहीं समझता है। उसे लगता है कि मोहन यह सब करने का अधिकारी है।

प्रश्न 5: धनराम को मोहन के किस व्यवहार पर आश्चर्य होता है और क्यों?

उत्तर : धनराम को तब मोहन के व्यवहार पर आश्चर्य होता है, जब वह धनराम के साथ लोहे को रूप देने में सहयोग देता है। मोहन का संबंध उच्चवंश से है। वह जाति से ब्राह्मण है। उसकी जाति के लोग धनराम के साथ उठना-बैठना नहीं करते हैं। बहुत आवश्यकता होने पर वह उनकी दुकान पर खड़े हो जाते हैं मगर मेलजोल नहीं रखते हैं। मोहन इसके विपरीत धनराम के टोले पर चला जाता है। वहाँ वह धनराम के साथ उसकी दुकान पर बैठता है और जब वह लोहे को सही आकार नहीं दे पाता है, तो उसकी मदद भी करता है। एक ब्राह्मण लड़के को अपने समान काम करते देखकर उसे आश्चर्य होता है। मोहन पढ़ने के लिए गाँव से बाहर गया था मगर मोहन को लोहे को आकार देता देख, उसे समझ नहीं आता।

प्रश्न 6: मोहन के लखनऊ आने के बाद के समय को लेखक ने उसके जीवन का एक नया अध्याय  क्यों कहा है?

उत्तर : मोहन को उसके पिता ने अपने जाति भाई के साथ पढ़ने के लिए लखनऊ भेजा था। पिता-पुत्र के बहुत से स्वप्न थे। उन्हें लगता था कि वहाँ जाकर मोहन अच्छी पढ़ाई करेगा और अफसर बनेगा। मगर स्थिति इसके विपरीत निकली। यह अध्याय मोहन के जीवन की दिशा ही बदल गया। अपने गाँव का होनहार विद्यार्थी माना जाने वाला मोहन वहाँ जाकर गली-मोहल्ले का नौकर बन गया। पढ़ाई के स्थान पर उसे घर के कामों में लगा दिया गया। एक साधारण से विद्यालय में भर्ती कराया गया मगर कोई उसकी पढ़ाई के हक में नहीं था। वहाँ उसकी पढ़ाई बाधित होने लगी और अंतत एक होनहार विद्यार्थी लोगों के स्वार्थ की भेंट चढ़ गया। उसे विवश होकर लोहे के कारखाने में नौकरी करनी पड़ी। यह एक ऐसा नया अध्याय था, जिसने मोहन की जिंदगी बदलकर रख दी।

प्रश्न 7: मास्टर त्रिलोक सिंह के किस कथन को लेखक ने ज़बान के चाबुक  कहा है और क्यों?

उत्तर :  धनराम को तेरह का पहाड़ा मार खाने के बाद भी याद नहीं हुआ तो, मास्टर त्रिलोक सिंह ने उसे कहा कि तेरे दिमाग में तो लोहा भरा है रे! विद्या का ताप कहाँ लगेगा इसमें। अपने इस कथन से उन्होंने धनराम के कोमल दिल में ऐसी चोट की कि वह बात उसके दिल में घर कर गई। यह ज़बान की चाबुक से पड़ी ऐसी मार थी, जिसके निशान शरीर पर नहीं धनराम के दिल पर लगे थे। एक बच्चे के मन ने इस बात को मान लिया कि वह पढ़ने के लायक नहीं है। यही कारण है मास्टर त्रिलोक सिंह के कथन को लेखक ने ज़बान के चाबुक कहा है।

प्रश्न 8: (1) बिरादरी का यही सहारा होता है।
क. किसने किससे कहा?
ख. किस प्रसंग में कहा?
ग. किस आशय से कहा?
घ. क्या कहानी में यह आशय स्पष्ट हुआ है?

(2) उसकी आँखों में एक सर्जक की चमक थी– कहानी का यह वाक्य-
क. किसके लिए कहा गया है?
ख. किस प्रसंग में कहा गया है?
ग. यह पात्र-विशेष के किन चारित्रिक पहलुओं को उजागर करता है?

उत्तर : (1) क. यह कथन पंडित वंशीधर ने गाँव के व्यक्ति से कहा।
ख. जब रमेश ने वंशीधर को शहर ले जाकर अच्छे विद्यालय में पढ़ाने की बात कही, तब वंशीधर ने उससे यह बात कही। उसकी बात सुनकर वे प्रसन्न हो गए। उन्हें मोहन का सुनहरा भविष्य शहर में दिखाई देने लगा।
ग. अपनी जाति की एकता और प्रेम को दिखाने के लिए तथा रमेश के प्रति धन्यवाद व्यक्त करने हेतु कहा गया।
घ. कहानी में इसका आशय स्पष्ट नहीं हुआ बल्कि इसके विपरीत ही दिखाई दिया। रमेश तथा उसके परिवार ने मोहन का भविष्य नष्ट कर दिया और होनहार मोहन के भविष्य को चौपट कर दिया। उन्होंने मोहन को अपने स्वार्थ के लिए प्रयोग किया।

(2) उसकी आँखों में एक सर्जक की चमक थी- कहानी का यह वाक्य-
क. यह कथन मोहन के लिए कहा गया है।
ख. जब मोहन ने धनराम के लोहे को अपनी चोटों से इच्छित आकार दे दिया, तब उसकी आँखों में यह सर्जक की चमक दिखाई दी।
ग. यह पात्र-विशेष के उस चारित्रिक विशेषता का सूचक हैं, जहाँ उसके परिश्रम का पता चलता है और जाति के स्थान पर कार्य के प्रति प्रेम को दर्शाता है।

प्रश्न 9: गाँव और शहर, दोनों जगहों पर चलने वाले मोहन के जीवन-संघर्ष में क्या फर्क है? चर्चा करें लिखें।

उत्तर :  गाँव और शहर दोनों जगहों पर चलने वाले मोहन के जीवन-संघर्ष में बहुत फर्क है। गाँव का मोहन विद्या प्राप्त करने के लिए संघर्ष कर रहा था। गाँव में उसका एक होनहार बालक के रूप में सम्मान था। उसने अपनी एक पहचान बनाई थी। मास्टर, पिताजी तथा स्वयं उसको अपने से उम्मीदें थीं। उसे बस अपने सपनों को पाने के लिए प्रयास करना था। वह प्रयास कर भी रहा था यदि उसके साथ प्राकृतिक आपदा के समय वह दुर्घटना नहीं घट जाती। शायद वह गाँव के दूसरे विद्यालय में जाकर अपनी शिक्षा प्राप्त कर सकता था मगर ऐसा नहीं हुआ। उस एक घटना से उसके जीवन की दिशा बदलकर रख दी। उसके विद्यार्थी संघर्ष को विराम लग गया और वह गाँव से निकलकर शहर आ गया। शहर में जो संघर्ष था, वह चारों ओर से था। अपनी पढ़ाई के लिए संघर्ष दूसरों के घरों में दिए जाने वाले काम को करने का संघर्ष, अपने अस्तित्व को बचाए रखने का संघर्ष, दूसरे लोगों के घर में रहकर उनके द्वारा किए जाने वाले खराब व्यवहार से संघर्ष, नौकरी प्राप्त करने का संघर्ष। इन संघर्षों ने होनहार बालक मोहन का अंत कर दिया। जो बालक निकला, वह एक परिपक्व और दूसरी सोच का बालक था। भविष्य के सुनहरे सपने कहीं हवा हो चुके थे। जीवन की परिभाषा बदल चुकी थी।

प्रश्न 10: एक अध्यापक के रूप में त्रिलोकसिंह का व्यक्तित्व आपको कैसा लगता है? अपनी समझ में उनकी खूबियों और खामियों पर विचार करें।

उत्तर :  एक अध्यापक के रूप में हमें त्रिलोकसिंह का व्यक्तित्व प्रभावी नहीं लगा। वे एक अच्छे अध्यापक थे। बच्चों को प्रोत्साहित करते हैं। उनके भविष्य के लिए उन्हें चिंता होती है। बच्चों के माता-पिता के पास जाकर उन्हें बच्चों के विषय में जानकारी देते हैं। इन बातों से हम उन्हें अच्छा बोल सकते हैं। बच्चों के प्रति उनकी ज़िम्मेदारी मात्र ऐसे विद्यार्थियों की तरफ़ थीं, जो होनहार हैं। होनहार विद्यार्थियों को वे आगे बढ़ाते थे तथा उनका प्रोत्साहन करते थे। मोहन ऐसे बालकों में से एक था। धनराम जैसे बालकों को वे प्रोत्साहित नहीं करते। अपनी चाबुक की समान बातों से उन्हें तोड़ डालते हैं। एक अध्यापक की यह ज़िम्मेदारी बनती है कि वह प्रत्येक विद्यार्थी के विकास के लिए कार्य करे। एक बुद्धिमान विद्यार्थी के स्थान पर ऐसे बालकों पर काम करें, जो कम बुद्धिमान हैं। शिक्षा देना उनका कार्य है। अतः वह शिक्षा का गलत बँटवारा नहीं कर सकते हैं। उन्हें चाहिए था कि जैसा व्यवहार तथा प्रेम वे मोहन से किया करते थे, वैसा ही धनराम के साथ भी करना चाहिए था। मोहन से अधिक प्रोत्साहन और ध्यान की आवश्यकता धनराम को थी। मास्टर जी ने ऐसा नहीं किया। उनके कथनों ने धनराम को शिक्षा के प्रति उपेक्षित बना दिया और वह पिता की दुकान पर जा बैठा।

प्रश्न 11: ‘गलता लोहा’ कहानी का अंत एक खास तरीके से होता है। क्या इस कहानी का कोई अन्य अंत हो सकता है? चर्चा करें।

उत्तर :  इस कहानी का अंत लेखक ने बहुत सुंदर तरीके से किया है। जहाँ पर धनराम के मुख पर उसने हैरानी के भाव छोड़े हैं, वहीं उसने समाज में मोहन के भविष्य की ओर संकेत भी किया है। इस कहानी का अन्य कोई अंत मुझे दिखाई नहीं पड़ता है। यदि पीछे की ओर देखते हैं, तो मोहन के पास अब वह विकल्प नहीं बचे हैं, जो उसे सुनहरे भविष्य की ओर ले जाएँ। मोहन लोहे पर हथौड़ा मारकर उसे जो आकार देता है, वह बताता है कि उसके कदम भविष्य की नई दिशा की ओर चल पड़े हैं। अब वह जाति भेदभाव से अलग हो चुका है और काम को अपना जीवन मानता है। उसकी आँखों में सृजन की चमक बताती है कि उसके अंदर वह आत्मविश्वास और कुछ कर दिखाने की चाह समाप्त नहीं हुई है। उसने अपने लिए नया रास्ता चुन लिया है। यह रास्ता हर बंधनों से अलग है। यह रास्ता उसे कर्म की ओर ले जाता है, ऐसा कर्म जिसने समाज को एक कर दिया है।
यह अंत हो सकता था कि हताश मोहन धनराम के कार्य को देखकर आत्मग्लानि के भाव से भर जाता है और उदास अपने घर की ओर चल पड़ता है। मगर यह अंत कहानी को सुखांत नहीं दुखांत बना देता। हम समाज में ऐसा अंत देकर उसे पथभ्रष्ट नहीं कर सकते हैं। अतः लेखक का दिया अंत ही अच्छा है।

प्रश्न 12: पाठ में काट-छाँटकर जैसे कई संयुक्त क्रिया शब्दों का प्रयोग हुआ है। कोई पाँच शब्द पाठ में से चुनकर लिखिए और अपने वाक्यों में प्रयोग कीजिए।

उत्तर : संयुक्त क्रिया शब्द इस प्रकार हैं-
(क) घूम-फिरकरः मैं घूम-फिरकर फिर यहीं आ गया।
(ख) उठा-पटक करः बच्चे पूरे दिन घर में उठा-पटक कर अब सोए हैं।
(ग) सहमते-सहमतेः मैं सहमते-सहमते घर के अंदर आई।
(घ) घूर-घूरकरः अध्यापक मुझे घूर-घूरकर देख रहे थे।
(ङ) पहुँचते-पहुँचतेः मुझे पहुँचते-पहुँचते देर हो गई।

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Galta Loha Class 11 MCQs

1.’गलता लोहा’ शीर्षक कहानी के लेखक हैं-
A. प्रेमचंद
B. शेखर जोशी
C. यशपाल
D. मन्नू भंडारी

Ans- B. शेखर जोशी

2. ‘गलता लोहा’ शीर्षक कहानी में किस प्रमुख समस्या को उजागर किया गया है?
A. शोषण की समस्या
B. भ्रष्टाचार की समस्या
C. जातिगत भेदभाव की समस्या
D. महँगाई की समस्या

Ans- C. जातिगत भेदभाव की समस्या

3- खेत में जाते समय मोहन के हाथ में क्या था?
A. तलवार
B. हँसुवा
C. गंडासी
D. लाठी

Ans- B. हँसुवा

4. मोहन हँसुवा लेकर किस उद्देश्य से निकला था?
A. लड़ाई करने
B. खेत में उगी झाड़ियाँ काटने
C. हँसुवे की धार लगवाने
D. धनराम से मिलने

Ans- B. खेत में उगी झाड़ियाँ काटने

5. वंशीधर का मुख्य व्यवसाय क्या था?
A. खेतीबाड़ी
B. अध्यापन
C. शिल्पकारी
D. पुरोहिताई

Ans. D. पुरोहिताई

6.वंशीधर ने चंद्रदत्त के घर जाकर किस पाठ के करने के लिए मोहन से कहा था?
A. माँ काली का पाठ
B. रामचरितमानस पाठ
C. रुद्रीपाठ
D. गरुढ़पुराण पाठ

Ans- C. रुद्रीपाठ

7. मोहन के अध्यापक का नाम था-
A. सोहन सिंह
B. वंशीधर
C. गोपाल दास
D. त्रिलोक सिंह

Ans- D. त्रिलोक सिंह

8. कहानी में गोपाल सिंह कौन है?
A. दुकानदार
B. सब्जीवाला
C. गीतकार
D. अध्यापक

Ans- A. दुकानदार

9. ‘साँप सूंघ जाना’ का अर्थ है
A. साँप का काटना
B. साँप का चाटना
C. चुप हो जाना
D. खो जाना

Ans- C. चुप हो जाना

10. धनराम का संबंध किस जाति से है?
A. पुरोहित
B. ब्राह्मण
C. लोहार
D. हरिजन

Ans- C. लोहार

Source: Enrich Minds

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