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‘संगतकार’ कविता में कवि बताता है कि जब मुख्य गायक गीत गाते-गाते अपने स्वर को ऊँचाई पर ले जाता है, तो कभी-कभी उसका स्वर कमजोर या टूटने लगता है। ऐसे में गायक अपने कंठ से ध्वनि का विस्तार नहीं कर पाता और उसका उत्साह कम हो जाता है। इस स्थिति में संगतकार उसकी सहायता करता है, उसके स्वर के साथ सामंजस्य बनाता है और उसे संभालता है। इस तरह वह गायक के स्वर में जो खालीपन आता है, उसे अपने स्वरों से भरता है और अपनी विशिष्ट भूमिका निभाता है।
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