दिल्ली यूनिवर्सिटी में एडमिशन कैसे होता है: CUET, CSAS और पूरा प्रोसेस

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Delhi University me Admission Kaise Hota Hai

दिल्ली यूनिवर्सिटी (DU) में अंडरग्रेजुएट एडमिशन का सिस्टम पिछले कुछ वर्षों में पूरी तरह बदल चुका है। आज अगर कोई छात्र यह जानना चाहता है कि दिल्ली यूनिवर्सिटी में एडमिशन कैसे होता है (Delhi University me Admission Kaise Hota Hai), तो जवाब सिर्फ 12वीं के अंकों तक सीमित नहीं रह गया है। अब एडमिशन की पूरी प्रक्रिया CUET-UG स्कोर और DU के कॉमन सीट एलोकेशन सिस्टम (CSAS) के ज़रिए पूरी होती है। इसके बावजूद कई छात्र यह मान लेते हैं कि CUET में अच्छा स्कोर ही एडमिशन की गारंटी है, जबकि असल में DU एडमिशन एक मल्टी-स्टेप, नियम-आधारित और समय-संवेदनशील प्रक्रिया है, जिसमें छोटी-सी गलती भी सीट मिलने की संभावना को प्रभावित कर सकती है।

इस लेख में 2026 के अनुसार विस्तार से समझाया गया है कि CUET के बाद दिल्ली यूनिवर्सिटी में एडमिशन कैसे होता है, CSAS के अलग-अलग चरण क्या हैं, सीट अलॉटमेंट का लॉजिक कैसे काम करता है, कोर्स-वाइज़ एलिजिबिलिटी क्या होती है और वे आम गलतियाँ कौन-सी हैं, जिनकी वजह से अच्छे स्कोर के बावजूद कई छात्रों को DU में सीट नहीं मिल पाती। यह गाइड उन छात्रों के लिए है जो CUET के बाद DU एडमिशन प्रक्रिया को सही तरीके से समझकर लागू करना चाहते हैं।

This Blog Includes:
  1. दिल्ली यूनिवर्सिटी में एडमिशन ओवरव्यू
  2. CUET क्या है?
  3. CSAS क्या है?
  4. दिल्ली यूनिवर्सिटी में एडमिशन कैसे होते हैं: स्टेप-बाय-स्टेप गाइड
    1. स्टेप 0: कोर्स की एलिजिबिलिटी और CUET विषय पहले जांचें
    2. स्टेप 1: CUET-UG परीक्षा देना अनिवार्य है
    3. स्टेप 2: CUET रिजल्ट और स्कोर की भूमिका
    4. स्टेप 3: DU का CSAS पोर्टल क्या है और क्यों ज़रूरी है?
    5. स्टेप 4: CSAS फेज-1 – प्रोफाइल रजिस्ट्रेशन
    6. स्टेप 5: CSAS फेज-2 – कोर्स और कॉलेज की प्राथमिकताएँ भरना
    7. स्टेप 6: सीट अलॉटमेंट कैसे होती है?
    8. स्टेप 7: सीट स्वीकार करना, अपग्रेड और फ्रीज़ का विकल्प
    9. स्टेप 8: फीस भुगतान और दस्तावेज़ सत्यापन
  5. CSAS प्रेफरेंस फिलिंग स्ट्रैटेजी
  6. दिल्ली यूनिवर्सिटी में एलिजिबिलिटी एंड सेलेक्शन
    1. बीए (BA) प्रोग्राम और बीए ऑनर्स
    2. बीकॉम (B.Com) और बीकॉम ऑनर्स
    3. बीएससी (B.Sc) लाइफ साइंस और फिजिकल साइंस
    4. बीएससी ऑनर्स (मैथ्स, फिजिक्स, केमिस्ट्री, बायोलॉजी)
    5. बीए एलएलबी / बीबीए एलएलबी और अन्य प्रोफेशनल कोर्सेस
    6. बीएमएस (BMS – Bachelor of Management Studies)
    7. बीबीई (BBE – Bachelor of Business Economics)
    8. लैंग्वेज ऑनर्स कोर्सेस (हिंदी, संस्कृत, इंग्लिश आदि)
  7. दिल्ली यूनिवर्सिटी में सीट अलॉटमेंट कैसे होती है?
  8. दिल्ली यूनिवर्सिटी में आरक्षण नीति
  9. दिल्ली यूनिवर्सिटी का फीस स्ट्रक्चर
    1. आर्ट्स (BA) कोर्स की फीस
    2. साइंस (BSc) कोर्स की फीस
    3. कॉमर्स (BCom) कोर्स की फीस
    4. प्रोफेशनल और स्किल-बेस्ड कोर्स की फीस
  10. दिल्ली यूनिवर्सिटी में CUET कट-ऑफ कैसे और कब जारी होती है? (2026 के अनुसार)
    1. DU CUET कट-ऑफ और सीट अलॉटमेंट: संभावित टाइमलाइन (2026)
  11. FAQs

दिल्ली यूनिवर्सिटी में एडमिशन ओवरव्यू

नीचे दी गई तालिका दिल्ली यूनिवर्सिटी में अंडरग्रेजुएट एडमिशन की मौजूदा (CUET आधारित) प्रक्रिया का संक्षिप्त और तथ्यात्मक ओवरव्यू देती है, जिससे छात्र पूरे सिस्टम को एक नज़र में समझ सकें।

एडमिशन से जुड़ा बिंदुसंक्षिप्त जानकारी
एडमिशन का आधारदिल्ली यूनिवर्सिटी में UG कोर्सेज़ में एडमिशन CUET-UG के नॉर्मलाइज़्ड स्कोर के आधार पर किया जाता है। इसके बाद सीट अलॉटमेंट DU के CSAS पोर्टल के माध्यम से होती है।
प्रवेश परीक्षा (CUET-UG)CUET-UG का आयोजन नेशनल टेस्टिंग एजेंसी (NTA) द्वारा किया जाता है। DU अपने सभी रेगुलर कॉलेजों में इसी स्कोर को मान्यता देता है।
आवेदन प्रक्रियाCUET परीक्षा के बाद उम्मीदवार को दिल्ली यूनिवर्सिटी के CSAS पोर्टल पर अलग से रजिस्ट्रेशन करना अनिवार्य होता है।
CSAS सिस्टमCSAS (Common Seat Allocation System) दिल्ली यूनिवर्सिटी द्वारा संचालित एक सेंट्रलाइज्ड ऑनलाइन सीट अलॉटमेंट सिस्टम है।
CSAS के चरणप्रक्रिया तीन चरणों में पूरी होती है: (1) प्रोफाइल रजिस्ट्रेशन, (2) कोर्स और कॉलेज प्रेफरेंस भरना, (3) सीट अलॉटमेंट और एडमिशन कन्फर्मेशन।
सीट अलॉटमेंट का आधारसीट अलॉटमेंट CUET स्कोर, कोर्स एलिजिबिलिटी, आरक्षण श्रेणी और छात्र द्वारा भरी गई प्रेफरेंस के क्रम पर निर्भर करता है।
कट-ऑफ सिस्टमअब 12वीं बोर्ड प्रतिशत पर आधारित पारंपरिक कट-ऑफ जारी नहीं होती। CSAS राउंड्स में स्कोर-आधारित मेरिट के अनुसार सीट दी जाती है।
आरक्षण नीतिSC, ST, OBC-NCL, EWS, PwBD आदि श्रेणियों के लिए केंद्र सरकार के नियमों के अनुसार आरक्षण लागू होता है।
एडमिशन कन्फर्मेशनसीट अलॉट होने के बाद तय समय-सीमा में फीस भुगतान और दस्तावेज़ सत्यापन करना अनिवार्य होता है।

CUET क्या है?

CUET यानी कॉमन यूनिवर्सिटी एंट्रेंस टेस्ट एक नेशनल लेवल की प्रवेश परीक्षा है, जिसे नेशनल टेस्टिंग एजेंसी (NTA) कराती है। दिल्ली यूनिवर्सिटी सहित देश की ज़्यादातर सेंट्रल यूनिवर्सिटीज़ में अब अंडरग्रेजुएट कोर्सेज़ में एडमिशन इसी परीक्षा के ज़रिए होता है। पहले एडमिशन 12वीं के अंकों के आधार पर होता था, लेकिन अब CUET लागू होने से सभी छात्रों के लिए एक जैसा सिस्टम बन गया है।

CUET में भाषा विषय, डोमेन विषय और कुछ कोर्सेज़ के लिए जनरल टेस्ट होता है। दिल्ली यूनिवर्सिटी एडमिशन के समय पूरे CUET के टोटल मार्क्स नहीं देखती, बल्कि उस कोर्स के लिए तय किए गए ज़रूरी विषयों के बेस्ट स्कोर को ही गिनती है। इसलिए यह बहुत ज़रूरी है कि CUET में वही विषय चुने जाएँ जो आपने 12वीं में पढ़े हों और जो आपके चुने हुए कोर्स से मेल खाते हों।

ध्यान रखने वाली बात: दिल्ली यूनिवर्सिटी के ज़्यादातर UG कोर्सेज़ में जनरल टेस्ट की ज़रूरत नहीं होती। जनरल टेस्ट आमतौर पर कुछ ही प्रोफेशनल या स्किल-बेस्ड कोर्सेज़ के लिए लिया जाता है। इसी वजह से CUET फॉर्म भरते समय विषयों का सही चुनाव करना एडमिशन के लिए सबसे अहम स्टेप माना जाता है।

CSAS क्या है?

CSAS (कॉमन सीट एलोकेशन सिस्टम) दिल्ली यूनिवर्सिटी द्वारा बनाया गया एक ऑनलाइन एडमिशन सिस्टम है, जिसके ज़रिए CUET-UG स्कोर के आधार पर अंडरग्रेजुएट कोर्सेज़ में सीटें अलॉट की जाती हैं। CUET परीक्षा देने के बाद हर छात्र को DU के CSAS पोर्टल पर रजिस्ट्रेशन करना होता है। इसी पोर्टल पर छात्र अपनी प्रोफाइल पूरी करते हैं, कोर्स और कॉलेज की प्राथमिकताएँ भरते हैं और सीट अलॉटमेंट राउंड्स में हिस्सा लेते हैं।

CSAS प्रक्रिया को दिल्ली यूनिवर्सिटी तीन फेज़ में पूरा करती है – फेज़-1 में प्रोफाइल रजिस्ट्रेशन, फेज़-2 में कोर्स और कॉलेज की प्रेफरेंसेज़ भरना, और फेज़-3 में सीट अलॉटमेंट व एडमिशन कन्फर्मेशन।

CSAS के तहत सीट अलॉटमेंट केवल CUET स्कोर पर नहीं, बल्कि कोर्स की एलिजिबिलिटी, CUET में चुने गए विषयों का सही संयोजन, आरक्षण श्रेणी और उस समय उपलब्ध सीटों के आधार पर किया जाता है। इसलिए सिर्फ CUET में अच्छा स्कोर होना ही काफी नहीं होता। अगर चुने गए विषय कोर्स की एलिजिबिलिटी से मेल नहीं खाते, तो अच्छे स्कोर के बावजूद सीट नहीं मिल पाती।

इसके अलावा, CSAS पोर्टल पर रजिस्ट्रेशन और प्रेफरेंसेज़ भरने की एक तय समय-सीमा होती है। इस समय-सीमा को मिस करने पर CUET स्कोर होने के बावजूद छात्र सीट अलॉटमेंट प्रक्रिया से बाहर हो सकता है।

दिल्ली यूनिवर्सिटी में एडमिशन कैसे होते हैं: स्टेप-बाय-स्टेप गाइड

दिल्ली यूनिवर्सिटी में एडमिशन की प्रक्रिया कई चरणों में पूरी होती है। CUET देने से लेकर सीट अलॉटमेंट और फीस भुगतान तक हर स्टेप का सही समय पर और सही तरीके से पूरा होना ज़रूरी होता है। नीचे पूरी प्रक्रिया क्रमवार समझाई गई है।

स्टेप 0: कोर्स की एलिजिबिलिटी और CUET विषय पहले जांचें

एडमिशन प्रक्रिया शुरू करने से पहले यह देखना ज़रूरी है कि जिस कोर्स में आप एडमिशन लेना चाहते हैं, उसकी एलिजिबिलिटी क्या है और CUET में चुने गए विषय उस कोर्स से मेल खाते हैं या नहीं। कई बार छात्र CUET पास कर लेते हैं, लेकिन विषयों का संयोजन सही न होने के कारण वे किसी कोर्स के लिए पात्र नहीं माने जाते। यह शुरुआती जाँच आगे होने वाली बड़ी गलतियों से बचाती है।

कोर्स चुनते समय यह देखना भी ज़रूरी है कि दिल्ली यूनिवर्सिटी में आपके इंटरेस्ट से जुड़े कौन-कौन से कोर्स उपलब्ध हैं, ताकि आप CSAS में सही प्रेफरेंस भर सकें। इसके लिए आप DU के सभी प्रमुख कोर्सेज़ की जानकारी यहाँ देख सकते हैं।

स्टेप 1: CUET-UG परीक्षा देना अनिवार्य है

दिल्ली यूनिवर्सिटी में स्नातक (UG) कोर्स में एडमिशन के लिए CUET-UG परीक्षा देना ज़रूरी है। यह परीक्षा NTA द्वारा आयोजित की जाती है और पूरे देश के छात्रों के लिए समान होती है। DU अब 12वीं के प्रतिशत के आधार पर एडमिशन नहीं देता। छात्र को CUET में वही विषय चुनने होते हैं जो उसने 12वीं में पढ़े हों और जो चुने गए कोर्स की योग्यता से मेल खाते हों। विषयों का गलत चयन आगे चलकर एडमिशन में समस्या पैदा कर सकता है।

स्टेप 2: CUET रिजल्ट और स्कोर की भूमिका

CUET परीक्षा का रिजल्ट आने के बाद छात्रों को अपना स्कोरकार्ड संभालकर रखना चाहिए। दिल्ली यूनिवर्सिटी एडमिशन के समय इसी स्कोर का इस्तेमाल करती है। यह समझना ज़रूरी है कि CUET में प्राप्त अंक सीधे कॉलेज नहीं दिलाते, बल्कि यह एडमिशन प्रक्रिया का पहला आधार होते हैं। DU अलग-अलग कोर्स के लिए अलग विषयों के स्कोर को जोड़कर मेरिट बनाता है। इसलिए सिर्फ कुल अंक नहीं, बल्कि विषय-वार स्कोर भी अहम होता है।

स्टेप 3: DU का CSAS पोर्टल क्या है और क्यों ज़रूरी है?

CUET रिजल्ट के बाद दिल्ली यूनिवर्सिटी अपना CSAS पोर्टल खोलती है। इसी पोर्टल के माध्यम से सभी कॉलेज और कोर्स में एडमिशन होता है। CUET पास करने के बावजूद अगर छात्र CSAS पोर्टल पर रजिस्ट्रेशन नहीं करता, तो उसे किसी भी कॉलेज में सीट नहीं मिलेगी। यह पोर्टल पूरी एडमिशन प्रक्रिया का केंद्र है, इसलिए इसकी हर स्टेज को ध्यान से पूरा करना ज़रूरी होता है।

स्टेप 4: CSAS फेज-1 – प्रोफाइल रजिस्ट्रेशन

CSAS के पहले फेज में छात्र को अपनी प्रोफाइल बनानी होती है। इसमें व्यक्तिगत जानकारी, शैक्षणिक विवरण, 10वीं-12वीं की जानकारी, CUET आवेदन संख्या और श्रेणी से जुड़ी जानकारी भरनी होती है। इसी चरण में जाति प्रमाण पत्र, EWS या PwD से जुड़े दस्तावेज भी अपलोड किए जाते हैं। यहाँ की गई किसी भी गलती का असर आगे की सीट अलॉटमेंट पर पड़ सकता है, इसलिए यह चरण बहुत सावधानी से पूरा करना चाहिए।

स्टेप 5: CSAS फेज-2 – कोर्स और कॉलेज की प्राथमिकताएँ भरना

CSAS का दूसरा चरण सबसे अहम माना जाता है। इस चरण में छात्र को उन सभी कोर्स और कॉलेज की सूची दिखाई जाती है, जिनके लिए वह पात्र होता है। अब छात्र को अपनी पसंद के अनुसार कोर्स और कॉलेज की प्राथमिकताएँ भरनी होती हैं। प्राथमिकता क्रम बहुत मायने रखता है, क्योंकि सीट अलॉटमेंट इसी क्रम के आधार पर होती है। गलत या बिना सोचे-समझे भरी गई प्राथमिकताएँ अच्छे मौके को खराब कर सकती हैं।

स्टेप 6: सीट अलॉटमेंट कैसे होती है?

दिल्ली यूनिवर्सिटी सीट अलॉटमेंट के लिए CUET स्कोर, श्रेणी, कोर्स की उपलब्ध सीटें और छात्र की प्राथमिकताओं को ध्यान में रखती है। यह प्रक्रिया पूरी तरह कंप्यूटराइज्ड होती है। एक से अधिक राउंड में सीटें जारी की जाती हैं। अगर किसी छात्र को पहले राउंड में सीट नहीं मिलती, तो उसे निराश होने की ज़रूरत नहीं होती। आगे के राउंड में सीट मिलने की संभावना बनी रहती है, बशर्ते उसने सही प्राथमिकताएँ भरी हों।

स्टेप 7: सीट स्वीकार करना, अपग्रेड और फ्रीज़ का विकल्प

जब किसी छात्र को सीट अलॉट होती है, तो उसे तय समय-सीमा के भीतर उस सीट को स्वीकार (Accept) करना होता है। इसके बाद छात्र के पास तीन विकल्प होते हैं – फ्रीज़, अपग्रेड या रिजेक्ट/विथड्रॉ।

अगर छात्र अपग्रेड का विकल्प चुनता है, तो उसकी मौजूदा अलॉट हुई सीट तुरंत रद्द नहीं होती। वह सीट अगले राउंड तक प्रोविजनल (अस्थायी) रूप में बनी रहती है। अगर अगले राउंड में छात्र को उसकी भरी हुई प्राथमिकताओं के अनुसार कोई बेहतर कॉलेज या कोर्स मिल जाता है, तो नई सीट अलॉट हो जाती है और पुरानी सीट अपने-आप छूट जाती है। लेकिन अगर अपग्रेड नहीं होता, तो पहले से मिली सीट सुरक्षित रहती है।

कुछ राउंड्स में ऐसा भी हो सकता है कि अगर छात्र की सभी ऊँची प्राथमिकताएँ खत्म हो चुकी हों, तो सिस्टम सीट को ऑटो-फ्रीज़ कर दे। ऐसे में आगे अपग्रेड का विकल्प नहीं मिलता और वही सीट फाइनल मानी जाती है। इसलिए फ्रीज या अपग्रेड चुनते समय अपनी प्रेफरेंसेज़ और राउंड की स्थिति को ध्यान में रखकर फैसला लेना ज़रूरी होता है। अगर तय समय के भीतर कोई भी विकल्प नहीं चुना गया, तो सीट रद्द भी हो सकती है।

स्टेप 8: फीस भुगतान और दस्तावेज़ सत्यापन

सीट स्वीकार करने के बाद छात्र को ऑनलाइन फीस जमा करनी होती है। इसके बाद कॉलेज स्तर पर दस्तावेज़ों का सत्यापन किया जाता है। इसमें 10वीं-12वीं की मार्कशीट, CUET स्कोरकार्ड, पहचान पत्र और श्रेणी प्रमाण पत्र शामिल होते हैं। अगर कोई दस्तावेज़ गलत या अपूर्ण पाया जाता है, तो एडमिशन रद्द भी हो सकता है। इसलिए सभी दस्तावेज़ पहले से सही और अपडेट रखना बेहद ज़रूरी है।

CSAS प्रेफरेंस फिलिंग स्ट्रैटेजी

CSAS में प्रेफरेंस भरते समय छोटी-सी गलती भी सही कॉलेज या कोर्स मिलने से रोक सकती है। नीचे आसान भाषा में बताया गया है कि प्रेफरेंस किस क्रम में और किन बातों का ध्यान रखते हुए भरनी चाहिए, ताकि सीट मिलने की संभावना बेहतर रहे।

  • CSAS में प्रेफरेंस भरते समय की गई छोटी-सी गलती भी सही कॉलेज या कोर्स मिलने से रोक सकती है। नीचे आसान भाषा में बताया गया है कि प्रेफरेंस किस क्रम में और किन बातों का ध्यान रखते हुए भरनी चाहिए, ताकि सीट मिलने की संभावना बेहतर रहे।
  • CSAS पोर्टल पर प्रेफरेंस फिलिंग दिल्ली यूनिवर्सिटी एडमिशन का सबसे अहम चरण होता है, क्योंकि सीट अलॉटमेंट पूरी तरह इसी क्रम के आधार पर तय की जाती है।
  • प्रेफरेंस भरते समय सबसे पहले यह साफ़ होना चाहिए कि आप कौन-सा कोर्स पढ़ना चाहते हैं, क्योंकि कोर्स आपकी पढ़ाई और आगे के विकल्प तय करता है। इसी वजह से सिर्फ कॉलेज के नाम के आधार पर कम पसंदीदा कोर्स चुनना सही रणनीति नहीं मानी जाती।
  • CSAS में जिन कोर्स और कॉलेज के लिए आप पात्र होते हैं, उन्हें प्रेफरेंस में शामिल करना ज़्यादा सुरक्षित रहता है, क्योंकि कम विकल्प भरने से सीट मिलने की संभावनाएँ अपने-आप सीमित हो जाती हैं।
  • सीट अलॉटमेंट हमेशा ऊपर से नीचे भरी गई प्रेफरेंसेज़ के अनुसार होती है, इसलिए जो विकल्प आपको सबसे ज़्यादा चाहिए, उसे सबसे ऊपर रखना ज़रूरी होता है। अनुमानित कट-ऑफ के आधार पर अच्छे विकल्प छोड़ना सही नहीं होता, क्योंकि CUET सिस्टम में कोई तय कट-ऑफ नहीं होती और हर राउंड में स्थिति बदल सकती है।
  • ऑनर्स और प्रोग्राम कोर्स को अलग-अलग विकल्प मानकर चलना समझदारी होती है, क्योंकि ऑनर्स में प्रतिस्पर्धा ज़्यादा होती है और प्रोग्राम कोर्स कई बार बेहतर बैक-अप बन जाते हैं।
  • पहले राउंड में सीट न मिलना सामान्य बात है और कई छात्रों को बाद के राउंड्स में बेहतर विकल्प मिलते हैं, इसलिए हर राउंड में धैर्य रखना ज़रूरी होता है।
  • प्रेफरेंस लॉक करने से पहले कोर्स का नाम, कॉलेज और उनका क्रम एक बार ध्यान से जाँच लेना चाहिए, क्योंकि लॉक होने के बाद बदलाव संभव नहीं होता।
  • अंत में यह समझना ज़रूरी है कि CSAS में सीट सिर्फ स्कोर से नहीं, बल्कि सही विषय चयन और सही तरीके से भरी गई प्रेफरेंसेज़ से मिलती है।

दिल्ली यूनिवर्सिटी में एलिजिबिलिटी एंड सेलेक्शन

दिल्ली यूनिवर्सिटी में अंडरग्रेजुएट एडमिशन की प्रक्रिया CUET-UG और CSAS सिस्टम पर आधारित होती है। हर कोर्स के लिए एलिजिबिलिटी अलग होती है, इसलिए CUET में चुने गए विषयों का सही होना बेहद ज़रूरी है। नीचे प्रमुख UG कोर्सेस के अनुसार एलिजिबिलिटी और सेलेक्शन से जुड़ी ज़रूरी बातें दी गई हैं।

बीए (BA) प्रोग्राम और बीए ऑनर्स

  • एडमिशन CUET-UG स्कोर के आधार पर किया जाता है
  • BA ऑनर्स में एक ही विषय पर गहराई से पढ़ाई होती है
  • BA प्रोग्राम में दो विषयों का कॉम्बिनेशन होता है
  • BA ऑनर्स के लिए उसी विषय का CUET डोमेन पेपर अनिवार्य होता है
  • BA प्रोग्राम में एक भाषा विषय के साथ संबंधित डोमेन विषयों के स्कोर देखे जाते हैं
  • सीट अलॉटमेंट CSAS पोर्टल पर भरी गई कॉलेज-कोर्स प्रेफरेंसेज़ पर निर्भर करती है

बीकॉम (B.Com) और बीकॉम ऑनर्स

  • 12वीं में मैथ्स या एप्लाइड मैथ्स पास होना ज़रूरी होता है
  • CUET में भाषा विषय के साथ मैथ्स/एप्लाइड मैथ्स शामिल होता है
  • अकाउंटेंसी या इकोनॉमिक्स जैसे डोमेन विषय स्वीकार किए जाते हैं
  • B.Com (Honours) में विषयों की गहराई ज़्यादा होती है
  • सीटें सीमित होने के कारण B.Com (Honours) की कट-ऑफ आमतौर पर ऊँची रहती है
  • सेलेक्शन CSAS के ज़रिए प्रेफरेंसेज़ के आधार पर होता है

बीएससी (B.Sc) लाइफ साइंस और फिजिकल साइंस

  • इन कोर्सेस के लिए 12वीं में साइंस स्ट्रीम होना ज़रूरी है
  • CUET में वही साइंस विषय देने होते हैं जो 12वीं में पढ़े गए हों
  • लाइफ साइंस के लिए बायोलॉजी अनिवार्य मानी जाती है
  • फिजिकल साइंस कोर्सेज़ में फिजिक्स और मैथ्स की आवश्यकता होती है
  • सीट अलॉटमेंट CUET स्कोर और उपलब्ध सीटों के आधार पर होती है
  • एक से ज़्यादा पात्र कोर्स होने पर सभी को प्रेफरेंसेज़ में शामिल करना फायदेमंद रहता है

बीएससी ऑनर्स (मैथ्स, फिजिक्स, केमिस्ट्री, बायोलॉजी)

  • ऑनर्स कोर्सेज़ पूरी तरह विषय-आधारित होते हैं
  • 12वीं और CUET दोनों में संबंधित विषय अनिवार्य होता है
  • मैथ्स ऑनर्स के लिए मैथ्स, फिजिक्स ऑनर्स के लिए फिजिक्स जरूरी होता है
  • मेरिट CUET के नॉर्मलाइज़्ड स्कोर से बनाई जाती है
  • सीट अलॉटमेंट CSAS के ज़रिए कई राउंड्स में होती है
  • विषय चयन और प्रेफरेंस ऑर्डर का सीधा असर एडमिशन पर पड़ता है

बीए एलएलबी / बीबीए एलएलबी और अन्य प्रोफेशनल कोर्सेस

  • इन कोर्सेस की एलिजिबिलिटी सामान्य UG कोर्सेस से अलग होती है
  • CUET-UG देना अनिवार्य होता है
  • कुछ कोर्सेस में विशेष विषय संयोजन या General Test की आवश्यकता हो सकती है
  • 12वीं में न्यूनतम पासिंग मार्क्स पूरे होने चाहिए
  • सेलेक्शन CSAS पोर्टल के ज़रिए मेरिट और कैटेगरी के आधार पर होता है
  • एलिजिबिलिटी शर्तें नोटिफिकेशन के अनुसार बदल सकती हैं

बीएमएस (BMS – Bachelor of Management Studies)

  • 12वीं में मैथ्स या एप्लाइड मैथ्स अनिवार्य होता है
  • CUET में भाषा विषय और मैथ्स/एप्लाइड मैथ्स के स्कोर देखे जाते हैं
  • यह कोर्स सीमित कॉलेजों में उपलब्ध होता है
  • सही कॉलेज-कोर्स प्रेफरेंस भरना यहाँ खास तौर पर ज़रूरी होता है

बीबीई (BBE – Bachelor of Business Economics)

  • यह कोर्स इकोनॉमिक्स और बिज़नेस में रुचि रखने वाले छात्रों के लिए होता है
  • 12वीं में मैथ्स या एप्लाइड मैथ्स अनिवार्य है
  • CUET में भाषा विषय और मैथ्स/एप्लाइड मैथ्स शामिल होता है
  • सीमित सीटों के कारण कट-ऑफ आमतौर पर ज़्यादा रहती है
  • प्रेफरेंस ऑर्डर एडमिशन में अहम भूमिका निभाता है

लैंग्वेज ऑनर्स कोर्सेस (हिंदी, संस्कृत, इंग्लिश आदि)

  • 12वीं में वही भाषा पढ़ी होना ज़रूरी है, जिसमें ऑनर्स करना चाहते हैं
  • CUET में संबंधित भाषा का डोमेन पेपर अनिवार्य होता है
  • मेरिट CUET स्कोर के आधार पर CSAS पोर्टल से बनती है
  • सही भाषा चयन और कॉलेज प्रेफरेंस दोनों ज़रूरी होते हैं

दिल्ली यूनिवर्सिटी में सीट अलॉटमेंट कैसे होती है?

दिल्ली यूनिवर्सिटी में सीट आवंटन की प्रक्रिया पूरी तरह सीयूईटी-यूजी स्कोर और सीएसएएस प्रणाली पर आधारित होती है। यह एक स्वचालित और नियम-आधारित प्रक्रिया है, जिसमें किसी भी स्तर पर मैन्युअल हस्तक्षेप नहीं किया जाता। नीचे दी गई तालिका के माध्यम से दिल्ली यूनिवर्सिटी की सीट आवंटन प्रक्रिया को एक नज़र में आसानी से समझा जा सकता है।

प्रक्रिया / चरणइसका अर्थछात्रों के लिए ज़रूरी बातें
मेरिट सूची का आधारमेरिट सूची सीयूईटी के नॉर्मलाइज़्ड स्कोर और श्रेणी के आधार पर तैयार होती हैअब 12वीं के प्रतिशत से मेरिट तय नहीं होती
सीट आवंटन राउंडसीटें उपलब्धता और मेरिट के अनुसार कई राउंड में आवंटित की जाती हैंएक से अधिक राउंड हो सकते हैं
कोर्स की पात्रतायूनिवर्सिटी यह जांचती है कि छात्र चुने गए कोर्स के लिए पात्र है या नहीं12वीं और सीयूईटी विषयों का मेल होना ज़रूरी है
सीयूईटी विषय संयोजनहर कोर्स के लिए तय विषयों के अंक ही जोड़े जाते हैंगलत विषय होने पर अच्छे अंक के बावजूद सीट नहीं मिलती
कॉलेज–कोर्स प्राथमिकतासीएसएएस में भरी गई प्राथमिकताओं का क्रम सीधे सीट तय करता हैप्राथमिकता क्रम सोच-समझकर भरना चाहिए
सीट स्वीकार करनातय समय में आवंटित सीट को स्वीकार करना होता हैसमय पर स्वीकार न करने पर सीट रद्द हो सकती है
अपग्रेड / फ्रीज़ विकल्पछात्र बेहतर विकल्प के लिए अपग्रेड या सीट सुरक्षित रखने के लिए फ्रीज़ चुन सकता हैअपग्रेड पर सीट अस्थायी रूप से सुरक्षित रहती है
स्वतः फ्रीज़ स्थितिजब आगे कोई बेहतर प्राथमिकता उपलब्ध नहीं होतीऐसी स्थिति में वही सीट अंतिम मानी जाती है
फीस भुगतानसीट स्वीकार करने के बाद ऑनलाइन फीस जमा करनी होती हैफीस न भरने पर प्रक्रिया आगे नहीं बढ़ती
दस्तावेज़ सत्यापनकॉलेज द्वारा दस्तावेज़ों की जांच की जाती हैगलत या अधूरे दस्तावेज़ पर सीट रद्द हो सकती है

दिल्ली यूनिवर्सिटी में आरक्षण नीति

दिल्ली यूनिवर्सिटी (DU) में अंडरग्रेजुएट एडमिशन भारत सरकार की आरक्षण नीति के अनुसार किया जाता है। CUET-UG लागू होने के बाद भी रिज़र्वेशन फ्रेमवर्क वही है, लेकिन इसका इम्प्लीमेंटेशन CSAS पोर्टल के ज़रिए होता है। यह जानना ज़रूरी है कि DU अपनी तरफ से कोई अलग आरक्षण नीति नहीं बनाता, बल्कि केंद्र सरकार द्वारा तय नियमों का पालन करता है।

श्रेणी (कैटेगरी)आरक्षण प्रतिशतकिन छात्रों को लाभजरूरी शर्तें
SC (अनुसूचित जाति)15%भारत सरकार द्वारा मान्यता प्राप्त SC समुदायवैध SC प्रमाणपत्र
ST (अनुसूचित जनजाति)7.50%अधिसूचित ST समुदायवैध ST प्रमाणपत्र
OBC-NCL27%OBC वर्ग (नॉन-क्रीमी लेयर)केंद्र सरकार का OBC-NCL सर्टिफिकेट
EWS10%आर्थिक रूप से कमजोर सामान्य वर्गआय व संपत्ति सीमा के भीतर
PwBD5% (horizontal)40% या अधिक दिव्यांगता वाले छात्रमेडिकल प्रमाणपत्र अनिवार्य
UR (जनरल)शेष सीटेंजिन पर कोई आरक्षण लागू नहींकोई विशेष सर्टिफिकेट नहीं

नोट: PwBD आरक्षण हॉरिज़ॉन्टल होता है, यानी यह हर कैटेगरी (SC/ST/OBC/UR) के अंदर लागू होता है।

महत्वपूर्ण: सभी आरक्षण श्रेणियों से जुड़े प्रमाणपत्र केंद्र सरकार द्वारा निर्धारित फॉर्मेट में होने चाहिए और उनकी वैधता तिथि एडमिशन प्रक्रिया के समय मान्य होनी चाहिए। पुराने, गलत या अमान्य प्रमाणपत्र होने पर सीट अलॉटमेंट रद्द भी हो सकता है।

दिल्ली यूनिवर्सिटी का फीस स्ट्रक्चर

दिल्ली यूनिवर्सिटी में अंडरग्रेजुएट कोर्सेज़ की फीस कॉलेज और कोर्स के प्रकार के अनुसार अलग-अलग हो सकती है। सरकारी विश्वविद्यालय होने के कारण DU की फीस संरचना अन्य निजी संस्थानों की तुलना में अपेक्षाकृत नियंत्रित रहती है। नीचे प्रमुख UG कोर्सेज़ की अनुमानित फीस रेंज दी गई है, जिससे छात्रों को एक सामान्य आइडिया मिल सके। फीस में हर साल मामूली बदलाव संभव है और अंतिम फीस कॉलेज द्वारा तय की जाती है।

आर्ट्स (BA) कोर्स की फीस

BA कोर्स DU में सबसे लोकप्रिय कोर्स में से एक है और इसकी फीस अपेक्षाकृत कम रहती है। इसके फीस स्ट्रक्चर को आप नीचे दी टेबल के माध्यम से समझ सकते हैं –

कोर्स का नामअनुमानित सालाना फीस (INR)
BA (प्रोग्राम)INR 8,000 – INR 15,000
BA (ऑनर्स)INR 10,000 – INR 18,000
BA इंग्लिश (ऑनर्स)INR 12,000 – INR 20,000
BA पॉलिटिकल साइंस (ऑनर्स)INR 12,000 – INR 20,000
BA हिस्ट्री (ऑनर्स)INR 12,000 – INR 20,000

साइंस (BSc) कोर्स की फीस

साइंस (BSc) कोर्स की फीस में प्रैक्टिकल और लैब फीस अलग से ली जाती है, जो कॉलेज के अनुसार बदल सकती है। इसके फीस स्ट्रक्चर को आप नीचे दी टेबल के माध्यम से समझ सकते हैं –

कोर्स का नामअनुमानित वार्षिक फीस (INR)
बीएससी फिजिकल साइंसINR 18,000 – INR 30,000
बीएससी लाइफ साइंसINR 18,000 – INR 30,000
बीएससी फिजिक्स (ऑनर्स)INR 25,000 – INR 45,000
बीएससी केमिस्ट्री (ऑनर्स)INR 25,000 – INR 45,000
बीएससी मैथ्स (ऑनर्स)INR 20,000 – INR 35,000

कॉमर्स (BCom) कोर्स की फीस

कॉमर्स (BCom) कोर्स की फीस आर्ट्स कोर्स की तुलना में थोड़ी ज़्यादा हो सकती है। इसके फीस स्ट्रक्चर को आप नीचे दी टेबल के माध्यम से समझ सकते हैं –

कोर्स का नामअनुमानित वार्षिक फीस (INR)
बीकॉम (प्रोग्राम)INR 10,000 – INR 18,000
बीकॉम (ऑनर्स)INR 12,000 – INR 25,000

प्रोफेशनल और स्किल-बेस्ड कोर्स की फीस

ये कोर्स पारंपरिक कोर्सेज़ से अलग होते हैं और इनमें इंडस्ट्री-ओरिएंटेड पढ़ाई के कारण फीस थोड़ी अधिक होती है। इसके फीस स्ट्रक्चर को आप नीचे दी दे टेबल के माध्यम से समझ सकते हैं –

कोर्स का नामअनुमानित वार्षिक फीस (INR)
बीएमएस (बैचलर ऑफ मैनेजमेंट स्टडीज़)INR 20,000 – INR 40,000
बीबीए (एफआईए)INR 25,000 – INR 45,000
बीए जर्नलिज़्मINR 20,000 – INR 35,000

दिल्ली यूनिवर्सिटी में CUET कट-ऑफ कैसे और कब जारी होती है? (2026 के अनुसार)

दिल्ली यूनिवर्सिटी में अब पहले की तरह 12वीं बोर्ड प्रतिशत पर आधारित पारंपरिक कट-ऑफ लिस्ट जारी नहीं की जाती। CUET लागू होने के बाद DU की अंडरग्रेजुएट एडमिशन प्रक्रिया CSAS (Common Seat Allocation System) के ज़रिए होती है और इसी प्रक्रिया के दौरान राउंड-वाइज कॉलेज और कोर्स के अनुसार कट-ऑफ/मेरिट डेटा सामने आता है।

यहाँ “कट-ऑफ” से मतलब किसी तय प्रतिशत से नहीं, बल्कि उस न्यूनतम CUET नॉर्मलाइज़्ड स्कोर से होता है, जिस पर किसी विशेष राउंड में किसी कॉलेज और कोर्स की सीट अलॉट की जाती है। आम तौर पर छात्र इसी स्कोर को “DU कट-ऑफ” कहकर समझते हैं। यह कट-ऑफ पहले से तय नहीं होती और हर राउंड में बदल सकती है।

कट-ऑफ कई बातों पर निर्भर करती है जैसे उस साल CUET में छात्रों का कुल प्रदर्शन, किसी कोर्स या कॉलेज की मांग, उपलब्ध सीटों की संख्या और छात्र की कैटेगरी। इसी वजह से किसी साल या राउंड की कट-ऑफ को “सेफ स्कोर” मानकर चलना सही नहीं होता। इसे सिर्फ एक रेफेरेंस की तरह देखना चाहिए, जिससे यह समझ आए कि किस राउंड में किस स्तर पर सीट अलॉट हुई। सही विषय संयोजन, CSAS में भरी गई प्राथमिकताएँ और हर राउंड में सीटों की स्थिति मिलकर ही अंतिम परिणाम तय करती हैं।

DU CUET कट-ऑफ और सीट अलॉटमेंट: संभावित टाइमलाइन (2026)

चरणसंभावित समय
CUET-UG परीक्षा का रिज़ल्टजून 2026
CSAS पोर्टल पर रजिस्ट्रेशन और प्रोफाइल भरनाजून के अंत से जुलाई की शुरुआत
CSAS फेज-2 (कोर्स और कॉलेज प्रेफरेंसेज़)जुलाई 2026 (शुरुआती सप्ताह)
पहला सीट अलॉटमेंट / कट-ऑफ राउंडजुलाई 2026 (पहला या दूसरा सप्ताह)
दूसरा और आगे के सीट अलॉटमेंट राउंडजुलाई 2026 (मध्य से अंत तक)
स्पॉट/विशेष राउंड (यदि हों)जुलाई के अंत या अगस्त 2026

नोट: यह टाइमलाइन पिछले वर्षों के पैटर्न पर आधारित है। सटीक तारीखें DU द्वारा CSAS पोर्टल पर आधिकारिक नोटिफिकेशन के माध्यम से जारी की जाती हैं।

FAQs

क्या सिर्फ CUET स्कोर से DU में एडमिशन मिल जाता है?

नहीं, CUET स्कोर ज़रूरी है, लेकिन अकेला CUET स्कोर ही एडमिशन तय नहीं करता। दिल्ली यूनिवर्सिटी में सीट अलॉटमेंट CSAS पोर्टल पर भरी गई कॉलेज और कोर्स की प्रेफरेंसेज़, कैटेगरी और उपलब्ध सीटों के आधार पर होता है। कई बार अच्छा स्कोर होने के बावजूद गलत या बिना सोचे-समझे भरी गई प्रेफरेंस के कारण सीट नहीं मिल पाती।

क्या एक से ज़्यादा कॉलेज या कोर्स की सीट एक साथ मिल सकती है?

नहीं, हर राउंड में छात्र को केवल एक ही कॉलेज और एक ही कोर्स की सीट अलॉट होती है। एक साथ कई सीटें नहीं मिलतीं। अगर छात्र बेहतर विकल्प के लिए अपग्रेड चुनता है, तो पहले अलॉट हुई सीट अगले राउंड तक प्रोविजनल रहती है और उसी के आधार पर अगला राउंड प्रोसेस होता है।

DU में कॉलेज ज़्यादा महत्वपूर्ण है या कोर्स?

दिल्ली यूनिवर्सिटी में एडमिशन आमतौर पर कोर्स-आधारित माना जाता है। कई बार एक अच्छा और उपयोगी कोर्स औसत कॉलेज में, किसी कम पसंदीदा कोर्स से बेहतर विकल्प साबित होता है। इसलिए प्रेफरेंस भरते समय केवल कॉलेज के नाम पर नहीं, बल्कि कोर्स की उपयोगिता और भविष्य की संभावनाओं पर भी ध्यान देना ज़रूरी होता है।

क्या गैप ईयर लेकर DU में एडमिशन लिया जा सकता है?

हाँ, दिल्ली यूनिवर्सिटी में आमतौर पर गैप ईयर स्वीकार किया जाता है, बशर्ते छात्र का CUET स्कोर वैध हो और वह संबंधित कोर्स की एलिजिबिलिटी पूरी करता हो। एक या अधिक साल का गैप अपने-आप एडमिशन में बाधा नहीं बनता, लेकिन CSAS फॉर्म में सभी जानकारी सही तरीके से भरनी चाहिए।

क्या बेहतर CUET स्कोर होने पर सीट पक्की मानी जा सकती है?

नहीं, CUET स्कोर अच्छा होना फायदेमंद ज़रूर है, लेकिन इससे सीट पक्की नहीं मानी जाती। सीट अलॉटमेंट स्कोर, कैटेगरी, प्रेफरेंसेज़ और उपलब्ध सीटों के संयुक्त प्रभाव से तय होती है। इसलिए केवल स्कोर पर निर्भर रहने के बजाय पूरी प्रक्रिया को सही तरीके से पूरा करना ज़रूरी होता है।

दिल्ली यूनिवर्सिटी में एडमिशन किस आधार पर होता है?

दिल्ली यूनिवर्सिटी में अंडरग्रेजुएट एडमिशन अब पूरी तरह CUET-UG के नॉर्मलाइज़्ड स्कोर पर आधारित होता है। 12वीं कक्षा के प्रतिशत से सीधे एडमिशन नहीं होता। CUET परीक्षा के बाद छात्रों को DU के CSAS पोर्टल पर रजिस्ट्रेशन करना होता है, जिसके ज़रिए पूरी सीट अलॉटमेंट प्रक्रिया आगे बढ़ती है।

DU में कॉलेज और कोर्स कैसे अलॉट होते हैं?

कॉलेज और कोर्स का अलॉटमेंट CSAS सीट अलॉटमेंट राउंड्स के ज़रिए किया जाता है। इसमें CUET स्कोर, छात्र की कैटेगरी, कोर्स एलिजिबिलिटी, भरी गई कॉलेज-कोर्स प्रेफरेंसेज़ का क्रम और उस समय उपलब्ध सीटें—ये सभी फैक्टर एक साथ काम करते हैं। इसलिए सही प्रेफरेंस भरना बेहद अहम होता है।

DU एडमिशन के दौरान सबसे आम गलतियाँ क्या होती हैं?

अच्छा CUET स्कोर होने के बावजूद कई छात्र छोटी-छोटी गलतियों के कारण सीट खो देते हैं। आम गलतियों में CSAS पोर्टल पर देर से रजिस्ट्रेशन करना, गलत कैटेगरी चुनना या दस्तावेज़ सही फॉर्मेट में अपलोड न करना, बिना रणनीति के प्रेफरेंसेज़ भरना और अनुमानित कट-ऑफ पर ज़्यादा भरोसा करना शामिल है।

CUET में कितना स्कोर “safe” माना जाता है?

CUET में कोई तय “safe score” नहीं होता। हर साल कोर्स, कॉलेज, कैटेगरी और सीटों की संख्या के अनुसार स्थिति बदलती रहती है। एक ही स्कोर पर किसी छात्र को एक कोर्स मिल सकता है, जबकि दूसरे को नहीं। इसलिए स्कोर के साथ-साथ सही विषय संयोजन और समझदारी से भरी गई प्रेफरेंसेज़ ज़्यादा मायने रखती हैं।

हमें उम्मीद है कि इस लेख से आपको दिल्ली यूनिवर्सिटी में एडमिशन की पूरी प्रक्रिया को लेकर स्पष्ट समझ मिली होगी। एडमिशन से जुड़ा कोई भी अंतिम निर्णय लेने से पहले यह ज़रूरी है कि आप दिल्ली यूनिवर्सिटी की आधिकारिक वेबसाइट और CSAS पोर्टल पर उपलब्ध लेटेस्ट जानकारी ज़रूर जांच लें, क्योंकि नियम और समय-सीमा में समय-समय पर बदलाव हो सकते हैं।

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