अनुनासिक शब्द की पहचान कैसे करें?

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अनुनासिक हिन्दी के अपने स्वर हैं। हिंदी की पूर्ववर्ती भाषाओं- संस्कृत, पाली, प्राकृत आदि में अनुनासिक स्वर नहीं हैं। इसलिए इन भाषाओं में अनुनासिक शब्द नहीं लिखे जाते हैं। चूँकि संस्कृत में अनुनासिक स्वर नहीं हैं; इसीलिए देवनागरी की वर्णमाला में अनुनासिक स्वरों को लिखने के लिए अलग से वर्ण नहीं हैं। हिन्दी में वर्णों के ऊपर चंद्रबिंदु (ँ) लगा कर अनुनासिक स्वर लिखे जाते हैं। 

परिभाषा

जिन स्वरों के उच्चारण में मुख के साथ-साथ नासिका की भी सहायता लेनी पड़ती है। अर्थात् जिन स्वरों का उच्चारण मुख और नासिका दोनों से किया जाता है वे अनुनासिक कहलाते हैं। अनुनासिक का चिह्न चन्द्रबिन्दु (ँ) है।

अनुनासिक का प्रयोग

जिस प्रकार anunasik की परिभाषा में बताया गया है कि जिन स्वरों का उच्चारण मुख और नासिका दोनों से किया जाता है, वे अनुनासिक कहलाते हैं और इन्हीं स्वरों को लिखते समय इनके ऊपर anunasik के चिह्न चन्द्रबिन्दु (ँ) का प्रयोग किया जाता है। यह ध्वनि (अनुनासिक) वास्तव में स्वरों का गुण होती है। अ, आ, उ, ऊ, तथा ऋ स्वर वाले शब्दों में अनुनासिक लगता है। जैसे – कुआँ, चाँद, अँधेरा आदि।

 अनुनासिक के स्थान पर अनुस्वार (बिंदु) का प्रयोग

anunasik के प्रयोग में आपने देखा कि हमने बताया अनुनासिक स्वरों का गुण होता है और अ, आ, उ, ऊ, तथा ऋ स्वर वाले शब्दों में अनुनासिक लगता है। यहाँ आपके मन में संदेह उत्पन्न हो सकता है कि स्वरों में तो इ, ई, ए, ऐ, ओ और औ भी आते हैं तो anunasik इन स्वरों वाले शब्दों में क्यों प्रयुक्त नहीं होता।

इसका एक कारण है और वह यह है कि जिन स्वरों में शिरोरेखा (शब्द के ऊपर खींची जाने वाली लाइन) के ऊपर मात्रा-चिह्न आते हैं, वहाँ अनुनासिक के लिए जगह की कमी के कारण अनुस्वार (बिंदु) लगाया जाता है।

अनुनासिक और अनुस्वार :इस नियम को उदाहरणों के माध्यम से समझेंगे

इन सभी शब्दों में जैसा कि हम देख रहे हैं कि शिरोरेखा से ऊपर मात्रा-चिह्न लगे हुए हैं – जैसे ‘नहीं’में ई, ‘मैं’में ऐ तथा ‘गोंद’में ओ की मात्रा का चिह्न है। इन शब्दों पर जब हम अनुनासिक (ँ) का चिह्न लगा रहे हैं, तो पाते हैं कि उसके लिए पर्याप्त स्थान नहीं है, इसलिए इन सभी मात्राओं (इ, ई, ए, ऐ, ओ और औ) के साथ अनुनासिक (ँ) के स्थान पर अनुस्वार (ं) लगाया गया है। यहाँ ध्यान रखने योग्य बात यह है कि anunasik (ँ) के स्थान पर अनुस्वार (ं) का प्रयोग करने पर भी इन शब्दों के उच्चारण में किसी प्रकार का अंतर नहीं आता।

अनुनासिक और अनुस्वार में अंतर

anunasik और अनुस्वार में अंतर निम्नलिखित है :-

  1.  अनुनासिक स्वर है जबकि अनुस्वार मूलत: व्यंजन। इनके प्रयोग के कारण कुछ शब्दों के अर्थ में अंतर आ जाता है।जैसे –
    • हंस (एक जल पक्षी), हँस (हँसने की क्रिया)।
    • अंगना (सुंदर अंगों वाली स्त्री), अँगना (घर के बाहर खुला बरामदा)
    • स्वांग (स्व+अंग)(अपने अंग), स्वाँग (ढोंग)
  2. अनुनासिका (चंद्रबिंदु) को परिवर्तित नहीं किया जा सकता, जबकि अनुस्वार को वर्ण में बदला जा सकता है।
  3. अनुनासिका का प्रयोग केवल उन शब्दों में ही किया जा सकता है, जिनकी मात्राएँ शिरोरेखा से ऊपर न लगी हों। जैसे– अ, आ, उ, ऊ, ऋ
    उदाहरण के रूप में – हँस, चाँद, पूँछ
  4. शिरोरेखा से ऊपर लगी मात्राओं वाले शब्दों में अनुनासिका के स्थान पर अनुस्वार अर्थात बिंदु का प्रयोग ही होता है। जैसे – गोंद, कोंपल, जबकि अनुस्वार हर तरह की मात्राओं वाले शब्दों पर लगाया जा सकता है।

अनुनासिक शब्द

  • धूल- गाँव, मुँह, धुँधले, कुआँ, चाँद, भाँति, काँच।
  • दुःख का अधिकार- बाँट, अँधेर, माँ, फूँकना, आँखें।
  • एवरेस्ट- मेरी  शिखर यात्रा- बाँधकर, पहुँच, ऊँचाई, टाँग, पाँच, दाँते, साँस।
  • तुम कब जाओगे, अतिथि- धुआँ, चाँद, काँप, मँहगाई, जाऊँगा।
  • वैज्ञानिक चेतना के वाहक चंद्रशेखर वेंकट रामन्- ढूँढने, ऊँचे, भाँति।
  • कीचड़ का काव्य- रँगी, अँगूठा, बाँधकर।
  • धर्म की आड़- मियाँ, अजाँ।
  • शुक्रतारे के समान- जालियाँवाला, ऊँगली, ठूँस, गूँथ।

पाठ्य-पुस्तक ‘संचयन-I’ में प्रयुक्त anunasik शब्द

  • गिल्लू – काँव-काँव, उँगली, काँच, बूँदें, रोएँ, पूँछ, काँच, झाँकते।
  • स्मृति- बूँदा-बाँदी, गाँव, आँगन, कँप-कँपी, बाँध, साँप, कुएँ, पाँच, फुँकार, फूँ-फूँ, दाँत।
  • कल्लू कुम्हार की उनाकोटी- झाँका, मुँहजोर, उँड़ेल, बाँस, सँभाले,  धँसकर।
  • अब आप कोई भी अनुस्वार लगा शब्द देखें…..जैसे ..गंगा , कंबल , झंडा , मंजूषा, धंधा
Source: हिंदी पाठशाला

FAQs

अनुनासिक किसे कहते हैं ? उदाहरण सहित बताइए।

जिन स्वरों के उच्चारण में मुख के साथ-साथ नासिका (नाक) की भी सहायता लेनी पड़ती है,अर्थात् जिन स्वरों का उच्चारण मुख और नासिका दोनों से किया जाता है वे अनुनासिक कहलाते हैं। हँसना, आँख, ऊँट, मैं, हैं, सरसों, परसों आदि में चन्द्रबिन्दु या केवल बिन्दु आया है वह अनुनासिक है।

अनुनासिक वर्णों की संख्या कितनी है ?

हिंदी में अनुनासिक वर्णों की कुल संख्या 5 हैं। जो कि ङ, ञ, ण, म, न हैं। अनुनासिक वर्ण वे वर्ण या व्यंजन होते है जिनका उच्चारण करने में नासिक्य स्वर का प्रयोग होता है। इसी कारण इन्हे नासिक्य व्यंजन भी कहा जाता है।

अनुस्वार के 10 शब्द।

गिल्लू – काँव-काँव, उँगली, काँच, बूँदें, रोएँ, पूँछ, काँच, झाँकते। स्मृति- बूँदा-बाँदी, गाँव, आँगन, कँप-कँपी, बाँध, साँप, कुएँ, पाँच, फुँकार, फूँ-फूँ, दाँत। कल्लू कुम्हार की उनाकोटी- झाँका, मुँहजोर, उँड़ेल, बाँस, सँभाले, धँसकर।

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